December 05, 2016

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दुनिया मेरे आगेः सूक्तियों के पाठ

ऐसे कई मौके आए जब किसी स्कूल का अध्ययन करने गई तो जो एक बात कई जगहों पर दिखी वह थी दीवारों पर लिखे उपदेश या सूक्तियां।

Author October 20, 2016 01:56 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

 प्रेरणा मालवीय

ऐसे कई मौके आए जब किसी स्कूल का अध्ययन करने गई तो जो एक बात कई जगहों पर दिखी वह थी दीवारों पर लिखे उपदेश या सूक्तियां। मसलन, शिक्षक एक मोमबत्ती के समान है जो खुद जल कर समाज को रोशनी देता है; बिना ज्ञान के मनुष्य पशु के समान है; क्रोध को जीतो; मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है; समय ही अनुशासन है आदि। ये दीवारों पर तब तक दिखते हैं, जब तक अगली बार पुताई का समय न आ जाए। पुताई के बाद फिर से नए रंग से उन्हें लिख दिया जाता है। मगर ये क्यों लिखे जाते हैं या इसके पीछे के शैक्षिक उद्देश्य क्या है, इसकी व्यावहारिकता कितनी कारगर है, इन सब पर शायद ही कभी विचार किया जाता है। मैंने इस बारे में जब बच्चों से बात की तो उनमें से कइयों ने बताया कि हमें नहीं मालूम। वे पहले जिस स्कूल में पढ़ते थे, उसमें भी इस तरह के उपदेश लिखे थे। मैंने कुछ बच्चों से पूछा कि क्या वे पढ़ कर इसका अर्थ समझा सकते हैं! बच्चों ने प्रयास तो किया, मगर उसका अर्थ बता पाने में नाकाम रहे। यानी उन्हें उन सूक्तियों के अर्थ नहीं मालूम थे और न ही अब तक उन्हें शिक्षकों ने समझाया था। मुझे लगता है कि स्कूल परिसर के भीतर मौजूद हर वस्तु के एक खास मायने हैं। सवाल है कि इस तरह के उपदेश स्कूल की दीवारों पर अगर लगाए जाते हैं तो मकसद के बरक्स उनकी व्यावहारिकता को कितना सुनिश्चित किया जाता है। दूसरे, बच्चे अपनी ओर से इन सूक्तियों को लेकर जिज्ञासु हों, इसके लिए क्या किसी स्कूल में कुछ ठोस किया जाता है? क्या इसके माध्यम से हम बच्चों में कुछ खास कौशलों का विकास करना चाहते हैं?


यह सभी जानते हैं कि प्राथमिक स्कूलों में बच्चे पढ़ने-लिखने और उससे भी ज्यादा सीखने की प्रक्रियाओं से ही जूझ रहे होते हैं। वहां जटिल और उलझी हुई उपदेशात्मक और दार्शनिक बातों की कितनी उपयोगिता है! क्या इस तरह के उपदेश बच्चों के सीखने में कुछ मदद भी कर सकते हैं? छोटी उम्र में बच्चों के लिए इनके गहरे अर्थ समझना बहुत कठिन है। वह भी वैसी बातों से, जिनसे उनके जीवन और गतिविधियों का कोई सीधा जुड़ाव नहीं होता है।
मुझे लगता है कि क्या उस स्थान को हम और ज्यादा बेहतर, जीवंत और रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, बच्चों के अपने खेल गीत, लोक-पर्वों से जुड़े गीत या फसलों के दौरान गाए जाने वाले गीतों को पोस्टर पर लिख कर दीवार पर लगा दिया जाए। या फिर कार्यशाला के माध्यम से बच्चों के अपने दैनिक अनुभवों को उन्हीं से सूत्रबद्ध करा कक्षा में चस्पां कर दिया जाए। इससे पाठ्य-पुस्तकों से इतर भी कुछ लिखित सामग्री इनके लिए उपलब्ध होगी। दूसरी बात यह कि अपनी कही गई बातों को स्कूल के अंदर दीवारों पर लगा देख कर बच्चों को बहुत खुशी होगी। इसका उपयोग कक्षा में भाषा सिखाने या अन्य विषयों को सिखाने में भी मदद करेगा और बच्चों के लिए यह एक सार्थक सामग्री साबित हो सकती है। सार्थक यानी जिसका बच्चों के लिए उनके स्तर और नजरिए से महत्त्व हो। वे उससे अपने आपको जोड़ सकते हैं और उन्हें इससे एक अपनापन भी लगेगा, क्योंकि वे उसे अपने परिवार, परिवेश और समुदाय से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे।
पाठ्य-पुस्तकों की एक सीमा है, जिन्हें ऐसी सामग्रियों से साथ पूरक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हम किताबों में बच्चों को अन्य देशों के नक्शे बताते हैं। लेकिन क्या इसकी शुरुआत उनके अपने गांव के नक्शे से नहीं की जा सकती जो उनके आसपास की परिचित जगह लगेगी? हां, इस दौरान शिक्षक को थोड़ा सजग रहने की जरूरत है कि कोई भी बच्चा खुद को छूटा हुआ महसूस न करे। मसलन, हर बच्चे से बात करके उनसे कुछ न कुछ ऐसा निकाला जाए जिन्हें बारी-बारी से दीवार पर जगह मिले। कई बार कुछ बच्चों की रचनाओं को स्थान दिया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि सिर्फ दीवारों पर लगा देने से ही कुछ नहीं होगा। इस दौरान शिक्षक को इन रचनाओं पर बच्चों से बात भी करनी होगी। बात क्या होगी, कैसे होगी, कैसे आगे बढ़ेगी, यह शिक्षक की प्रारंभिक तैयारी का हिस्सा होना चाहिए। इससे बच्चे यह भी समझ पाएंगे कि जो बोला जाता है, वह लिखा भी जाता है। हमारी बात भी महत्त्व की है, सिर्फ किताबों में जो लिखा है, उसे ही नहीं पढ़ना है। इन रचनाओं को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए और उन्हें संभाल कर रखा जाना चाहिए, ताकि बच्चों के सतत विकास को भी एक समय के अंतराल के बाद देखा जा सके। ये बदलाव के बिंदु हैं। लेकिन अगर हमें मौजूदा व्यवस्था में कुछ कमी नजर आती है, बदलाव की जरूरत महसूस होती है तो यह सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है कि उसका विकल्प क्या हो!

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First Published on October 20, 2016 1:54 am

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