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दुनिया मेरे आगेः जड़ चेतना

मेरा खयाल है कि इस अंधविश्वास में जहां दबंगों का हाथ है, वहीं घर वालों ने भी डर के मारे अंधविश्वास को मानते हुए घर की बुजुर्ग महिला को बीस दिनों तक काल कोठरी में बंद कर दिया।
Author August 26, 2017 03:03 am
(express Photo)

बृृमोहन आचार्य

महिलाओं की चोटी काटने की घटनाएं और उससे जुड़ी अफवाहों की वजह से भीड़ के हाथों दो महिलाओं के मारे जाने की खबर अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई है कि एक और अंधविश्वास ने एक बुजुर्ग की जिंदगी में त्रासदी घोल दी। मेरा खयाल है कि इस अंधविश्वास में जहां दबंगों का हाथ है, वहीं घर वालों ने भी डर के मारे अंधविश्वास को मानते हुए घर की बुजुर्ग महिला को बीस दिनों तक काल कोठरी में बंद कर दिया। मामला उस राज्य यानी राजस्थान का है जहां की मुख्यमंत्री भी महिला हैं। भीलवाड़ा जिले के भौली गांव की निवासी रामकन्या को डायन बता कर बीस दिनों तक एक कमरे में दो तालों में बंद रखा गया।
वजह यह कि जिस जगह महिला का घर है, उस रास्ते से गांव के एक दबंग परिवार की बेटी स्कूल जाती है। एक दिन वह स्कूल जाने के वक्त बीमार हो गई थी। परिवार वालों ने यह सोच लिया कि रामकन्या ने उसकी बेटी को नजर लगा दी है। इस वजह से वह बीमार हो गई। यह बात दबंगों को नागवार गुजरी और उन्होंने महिला और उसके परिवार को गांव से बाहर निकालने का हुक्म दे दिया। लेकिन बात यहां आकर टिकी कि उस महिला के डरे हुए परिजनों ने दबंगों के दबाव में बुजुर्ग महिला को चार फुट की अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया। साथ ही उसी कोठरी में खाना-पीना और शौच करने का हुक्म दे दिया गया। बीस दिनों के बाद जब किसी ने इस घटना के बारे में प्रशासन को बताया तो पुलिस की सहायता से उस महिला को बाहर निकाला गया। लेकिन इस बीच बीस दिनों तक उस कोठरी में रोटियों का ढेर लग गया।

यानी बुजुर्ग महिला शायद बहुत थोड़ा खाकर किसी तरह जिंदा थीं। उनके सदमे और दुख का अंदाजा लगाना संभव नहीं है। इस प्रकार की यह पहली घटना नहीं है। देश के कई हिस्सों में जहां का समाज पूर्ण शिक्षित हो चुका है और अपने बच्चों को चांद तक ले जाने का सपना देख रहा है, वहां भी अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी बैठी हैं कि मट्ठा पिलाने के बाद भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि आज तक यह देखने में नहीं आया है कि जिस महिला को डायन बता कर उसका डर फैलाया जाता है, उसकी वजह से किसी को कोई नुकसान पहुंचा है। हां, ऐसी अफवाहों की वजह से यह जरूर हुआ कि न जाने कितनी महिलाओं को मार डाला गया, कितनी को भयानक यातनाएं दी गर्इं।
हम जब छोटे थे तो हमारे घर वाले भी कहते थे रात के समय उस रास्ते पर मत जाना क्योंकि वहां भूत रहते हैं या फिर बुरी आत्माएं भटकती रहती हैं। इस डर की वजह से उधर जाने की हिम्मत भी नहीं जुटाई थी। यह अंधविश्वास ही है कि अगर बिल्ली रास्ता काट जाए तो चाहे कितने ही जरूरी काम हों, एकबारगी तो रुक ही जाते हैं। इसके अलावा, रात के समय गर्दन आसमान की तरफ करके अगर कुत्ते भौंकते हैं तो यह भय सताता रहता है कि मोहल्ले में किसी की तबीयत खराब है और उसे यमराज लेने आ गए हैं। रात बारह बजे अगर कहीं से घुंघरू की आवाज आती है तो शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि पग-पग पर अंधविश्वास है। राजस्थान में अगर कोई अंधविश्वास से बीमार हो जाता है तो उसे चिकित्सक के पास ले जाने के बजाय सबसे पहले टोना-टोटकों, भोपा और झाड़फूंक करने वाले तांत्रिकों के पास ले जाया जाता है। ऐसे में यह लगता है कि लाखों रुपए खर्च कर रात-रात भर जाग कर चिकित्सक की पढ़ाई करने वालों ने अपना समय क्यों बर्बाद किया!

हालांकि मानसिक रोग विशेषज्ञ कहते भी हैं कि अंधविश्वास आमतौर पर किसी भ्रम का नतीजा होता है। यह लोगों का भ्रम है कि बुरी आत्माएं भटकती रहती हैं और किसी न किसी को अपने चंगुल में फंसा लेती हैं। सवाल है कि अंधविश्वास को हमारे समाज में इतना क्यों महत्त्व दिया जा रहा है। झाड़-फूंक या टोना-टोटका करने वाले साधारण लोगों से मोटी रकम ऐंठने के लिए नित नए कारण बताते रहते हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं होता। वे महज अनुमानों और तुक्के के आधार पर किसी रोग का झाड़-फूंक से शर्तिया इलाज करने का दावा करते हैं। विडंबना यह है कि चेतना का विकास नहीं होने की वजह से साधारण लोग ऐसे ठगों के चक्कर में फंस जाते हैं।

इस तरह अंधविश्वास की दुनिया मजबूत होती रहती है। देखने में यह लगता है कि अब शिक्षा के प्रसार के साथ चीजें बदल रही हैं। लेकिन हर हाथ में मोबाइल और सोशल मीडिया के बोलबाले के युग में अंधविश्वास का दम कमजोर नहीं हुआ है। इस समय होना यह चाहिए कि स्कूली शिक्षा से ही बच्चों को अंधविश्वास को कोरी बकवास बताया जाए। साथ ही अभिभावकों को शिक्षित करने और अंधविश्वासों से दूर रह कर वैज्ञानिक चेतना का वाहक बनने का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए।

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