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दुनिया मेरे आगेः अमूर्तन की सीमा

आधुनिक चित्रकला के लिए परंपरा शुरू से ही खतरा बन कर सामने आई है। इस जोखिम से बचने के लिए नए चित्रकारों ने मूर्त-अमूर्त संरचनाओं के जरिए जिस लोक को जनम दिया, वह बेहद ऊहापोह और व्यर्थ की जटिलताओं से भरा रहा है।
(Express File Pic)

आधुनिक चित्रकला के लिए परंपरा शुरू से ही खतरा बन कर सामने आई है। इस जोखिम से बचने के लिए नए चित्रकारों ने मूर्त-अमूर्त संरचनाओं के जरिए जिस लोक को जनम दिया, वह बेहद ऊहापोह और व्यर्थ की जटिलताओं से भरा रहा है। यह सच है कि नई चित्रकला का भी आज एक इतिहास-दर्शन और व्याकरण बन गया है। लेकिन वह इतना समर्थ किसी मायने में आज भी नहीं है जितना पारंपरिक चित्रों की सुघड़ता और भाव संप्रेषण की तुलना करके देखा जाए तो! मोटे तौर पर आधुनिक चित्रकला आम आदमी की राय में आड़ी-तिरछी रेखाओं और रंगों का वैविध्य रूपी वह जाल है, जिससे मानस को न तो संतोष मिल पाता है और न उसे देखने की प्रबल ललक जग पाती है। हालांकि आधुनिक चित्रकला के पक्षधरों की राय में यह कला अपने दर्शन में सर्वोत्कृष्ट और परिवेशगत सच्चाइयों का आईना है, लेकिन असलियत यह है कि नई चित्रकला में नीरसता और ऊब का प्रतिशत नए चितेरों की संख्या की तरह निरंतर बढ़ता जा रहा है।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि आधुनिक चित्रकारों ने कला दृष्टि का परिचय न दिया हो या वे आधुनिक चित्रांकन परंपरा में जीवनगत सच्चाइयों को साक्षात न कर पाए हों! लेकिन यह सौ फीसद सच है कि यह उतनी समझ विकसित करने में असमर्थ रहा है, जो इस कला की लोकप्रियता के लिए अपेक्षित है। अगर नई कला को आमजन की पकड़ तक नहीं पहुंचाना है तो फिर उसकी सृजनात्मकता का अर्थ हम सामाजिक संदर्भ में किस रूप में, कहां तक समझें? नई कला में अमूर्त कल्पना को चित्रकार साकार करता है। अब इसकी दलील में कहा जाएगा कि आधुनिक चित्रकला ऐसी जनवादी नहीं है कि आम आदमी की समझ में भी आने लगे। इसका अर्थ तो यही मानें कि यह रचना चित्रकार के सुख और अभिजात वर्ग के शौक का अव्यावहारिक रूप है।

खानों, चौखानों, गोलाकारों और तिकोनों में भरे हल्के, चटख रंगों का एक कैनवास कोई खास आकृति नहीं उभारता या कि स्याह-सफेद के जरिए रेखाएं एक विचित्र अंकन करती हैं और फकत आंखों को भली लग रही हैं। इसी आधार पर उसकी संपूर्ण सार्थकता को मापना समुचित नहीं है। हर कला, साहित्य, संस्कृति का अपना एक लक्ष्य होता है। चाहे ज्ञान के स्तर पर हो या मनोरंजन के स्तर पर, किसी न किसी रस की उत्पत्ति उसे देखने-पढ़ने के बाद होती है। गहराई से नई चित्रकला के नए संदर्भों की बात करें तो इतनी विविधता चारों ओर बिखरी पड़ी है कि पारंपरिक चित्रों के मुकाबले में यह कला कहीं ज्यादा जनप्रियता के करीब पहुंच सकती है। आधुनिक चित्र दीर्घाओं को देखिए, वहां लगने वाली चित्र प्रदर्शनियां एक ही तरह के काम रंग और आकारों से भरी पड़ी हैं। एकाध प्रदर्शनों को छोड़ कर कहीं कोई नवीनता और ताजगी नहीं दिखती। नए चित्रकारों की चित्रकृतियां जो एंपोरियमों में बिकती हैं, उनसे इसका व्यावसायिक पक्ष तो थोड़ी उज्ज्वलता ग्रहण कर पाया है, लेकिन उनमें वे तमाम चित्रकार शरीक नहीं हो सके हैं जो इस काल को वर्षों से तहेदिल से अपनाए हुए हैं। उन्हें आमतौर पर घरों में चित्रों का ढेर लगाते या मित्रों को भेंट करते या फिर अकादमियों में बिक्री की जुगाड़ करते देखा जा सकता है। नई चित्रकला के लिए यह जो खतरा बना है, इसके लिए जिम्मेदार कौन है? दरअसल, पारंपरिक समाज और लोगों के बीच जिस अनूठे अमूर्त को सृजन की संज्ञा दी जा रही है, वे कई बार समझ से परे होती हैं। हमारे समाज, राष्ट्र और जीवन में सौ हादसे, अनहोनी, विलक्षणताएं, क्रूरताएं, हिंसा, सौहार्द, सुख-दुख के क्षण विविध रंगी बन कर आते हैं और हम फकत केवल कल्पना में उस निराकार की तलाश में भटक रहे हैं, जिसकी स्थापना साकार और सगुणोपासकों के बीच करना सहज नहीं है।

हम इतने संवेदनशून्य भी नहीं हैं कि परिवेशगत सच्चाइयां हमें तनिक भी विचलित नहीं कर पाती हों। जब यह सच है तो उस साकार को आकार देना कहां पारंपरिक हुआ! वह तो सर्वथा नवीन यथार्थवादी प्रयोग ही माना जाएगा। इस अर्थ में परंपरा और आधुनिकता का निर्वाह पूरी तरह हो सकता है। जिस मूल्य की स्थापना का लक्ष्य है, उसके करीब भी हम पहुंच सकते हैं। समकालीन कला के चित्रकारों ने समय की जिम्मेदारी को समझा है, उसे स्पष्ट किया है और उस ओर दूर तक इशारा भी किया है। इसकी जरूरत है। लेकिन जिस मात्रा और गति से आधुनिक चित्रफलक रंगे जा रहे हैं, वे सार्थक और शक्तिवान नहीं बन सके हैं। प्रयोगधर्मिता को बतौर शोक ऊल-जलूल ढंग से निराकार परम ब्रह्म में विलीन करना नई चित्रकला के लिए किसी कीमत पर लाभकारी नहीं हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि कला में वे भाव निरूपित किए जाएं, जिनसे उसका स्वरूप जन-जन तक विराटता से पहुंच सकें और उन खतरों से बच सकें, जो परिवेश से कटने के बाद समकालीन कला के सामने आ खड़े हुए हैं।

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