December 09, 2016

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दुनिया मेरे आगेः पहनना और झमकाना

भिन्न-भिन्न परिस्थितियोें में मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार के पीढ़ियों के गहरे अध्ययन के बाद कोई-कोई उक्ति निकल जाती होगी, वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुखरित होते हुए कहावत बनती गई।

Author November 5, 2016 01:59 am

मृदुला सिन्हा

भिन्न-भिन्न परिस्थितियोें में मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार के पीढ़ियों के गहरे अध्ययन के बाद कोई-कोई उक्ति निकल जाती होगी, वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुखरित होते हुए कहावत बनती गई। युग बीतने के बाद भी वे कहावतें अर्थहीन नहीं होतीं। बिहार में एक कहावत लोक संसार में बड़ी प्रसिद्ध थी- ‘पेन्हइअ सब कोई, झमकवइअ कोई-कोई।’ यानी वस्त्र हर कोई पहनता है, पर झमकाता कोई-कोई ही है। यह कहावत मेरे मन में गड़ गई थी। सन 1977 में जब दिल्ली आई, यहां बसे बिहारी परिवारों से मिलना हुआ। अधिकतर स्त्री-पुरुषों ने हर स्थान पर मेरे द्वारा बिहारी होने का परिचय देते सुन कर मुझे आत्मीयता से भरे सुझाव दिए-‘आप सबको क्योें बताती हैं कि आप बिहारी हैं?’ मैंने उन्हें सुझाव देना शुरू किया- ‘आप लोग भी खुद को बिहारी ही बताइए और बिहार के रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार, विवाह आदि के संबंध में अपने तरीके से सबको को अवगत करवाइए। अपने उन मित्रों को जरूर आमंत्रित करिए, जो बिहार से इतर राज्य से आते हैं। आप लोग भी उनके उत्सवों में जाइए। आपके अंदर से बिहारी होने का हीनभाव भी समाप्त होगा और आप भी दूसरे राज्यों की लोक संस्कृति के बारे में जानेंगे।’ बार-बार कहने से उनके जेहन में मेरा सुझाव उतरने लगा था।

 


पिछले पंद्रह वर्षों से परिवार सहित दिल्ली में रहने वाले एक सज्जन मुझसे मिलने आए। बातों-बातों में उन्होंने बताया- ‘मेरा परिवार और अधिकतर बिहारी परिवार छठ पूजा के समय गांव लौट जाते हैं। छठ पूजा संपन्न करके ही फिर दिल्ली लौटते हैं।’ मैंने जब कारण पूछा तो वे बोले- ‘यहां के लोग छठ पूजा नहीं मनाते। पूजा है भी कठिन और विचित्र। पूजा की सामग्रियां भी बिहार की तरह यहां सुविधा से नहीं मिलतीं। हम उन सामग्रियों को दिल्ली में खोजें तो गैरबिहारी दुकानदार हमारा मजाक उड़ाएंगे।’ मुझे सुन कर दुख हुआ। मैंने कहा- ‘आप ऐसा मत सोचिए। दिल्ली में सभी राज्यों के लोग रहते हैं। वे अपने यहां के त्योहार यहां भी मनाते हैं बिहार में मनाए जाने वाले ‘छठ व्रत’ में पूरा समाज सम्मिलित होता है। पचासों प्रकार की सामग्रियां सूर्य को अर्ध्य के रूप में चढ़ाई जाती हैं। चार दिनों तक व्रत चलता है। शरीर, मन की शुद्धि के साथ चारों ओर स्वच्छता पर ध्यान दिया जाता है। प्रसाद भी स्वादिष्ट होता है।’
उन्होंने मेरी बात से जब सहमति जताई तो मैंने कहा कि तो फिर आप अपने त्योहार को दिल्ली में झमकाते क्यों नहीं? वे ‘झमकाने’ शब्द पर थोड़ा असमंजस में पड़े तो मैंने पूछा- ‘आपने अपने गांव में यह कहावत सुनी है- ‘पेन्हइअ सबकोई, झमकवईअ कोई-कोई?’ उन्होंने तुरंत कहा- ‘हां-हां, मेरी दादी बार-बार बोलती थी।’ तब मैंने कहा- ‘फिर दादी की बात का गूढ़ अर्थ व्यवहार में लाइए। अपने यहां मनाए जाने वाले छठ व्रत को भी दिल्ली में झमकाइए। कहने का मतलब यह है कि दिल्ली वालों को दिखाइए। मुझे विश्वास है कि सभी राज्यों के लोगों को पसंद आएगा यह त्योहार।’
बहरहाल, वे दो महीने बाद फिर मेरे पास आए और बोले- ‘आपकी बात मैंने अपने आॅफिस में कई लोगों को बताई। उनमें से चार परिवार इस वर्ष छठ व्रत करने के लिए तैयार हैं। हम चाहते हैं कि आप भी आएं।’ मैं उस शाम यमुना किनारे गई। घाट पर बैठ कर गीत भी गाए। कई वर्षों तक छठ की सामग्रियां यहां मंगवाने, घाट की सफाई करवाने, जैसे कार्य समिति के जरिए करवाती रही थी। 1978 में जहां पांच परिवारों ने यमुना किनारे छठ व्रत किया था, वहीं हर वर्ष परिवारों की संख्या बढ़ती गई।
एक दिन वे सज्जन फिर मिले और इस बार उन्होंने कहा- ‘अब तो सचमुच दिल्ली में झमक गया छठ व्रत। इधर हम बिहारियों का भी सम्मान बढ़ा है।’ मैंने कहा- ‘छठ का प्रसाद ठेकुआ का स्वाद दिल्लीवासियों को अच्छा लगता है। लिट्ठी-चोखा, चूड़ा-दही, दाल-पूड़ी भी खाने लगे लोग।’ उन्होंने सहमति में सिर हिलाया। इधर जब वे आए तो काफी बुजुर्ग हो गए लगे। उन्होंने इस बार फिर आने का न्योता दिया तो मैंने कहा- ‘अब वहां मेरे जाने की जरूरत नहीं है। अब तो पूरी तरह से झमक गया है यह त्योहार। दूसरे राज्यों के लोग भी छठ व्रत करने लगे हैं। मुंबई, अमदाबाद, अमृतसर, गुवाहाटी, कोलकाता से लेकर हर राज्य में क्या, विदेशों में भी बिहारियों ने छठ पूजा को झमका दिया। अब मेरे किसी एक घाट पर जाने की जरूरत नहीं। छठ के गीत दूसरे भाषा-भाषी भी गुनगुनाने लगे हैं- ‘उजे हाजी, हटिया बजरिया, उहां केलवा बिकाए…!’ वे ठहाका मार कर हंसे और बोले- ‘आप ठीक कहती हैं। बिहार के गांव और बाजारों के भी नाम लिए जाते हैं। तो अब बिहार के गांव-बाजार भी झमक जाएंगे…!’ मैं सोच रही थी कि परंपराएं कैसे विकसित होती हैं और संस्कृतियों का विस्तार कैसे होता है!

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First Published on November 5, 2016 1:58 am

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