December 05, 2016

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दुनिया मेरे आगेः ढलती सांझ में

देश के महानगरों के सामने असंख्य चुनौतियां हैं। इक्कीसवीं सदी में मनुष्यता का संकट सबसे विकट है। परिवार नाम की परंपरागत संस्था विखंडित हो रही है। संयुक्त परिवार अब इतिहास में दर्ज होने की ओर बढ़ रहा है। दो

Author October 28, 2016 02:03 am

मनीष के चौधरी 

देश के महानगरों के सामने असंख्य चुनौतियां हैं। इक्कीसवीं सदी में मनुष्यता का संकट सबसे विकट है। परिवार नाम की परंपरागत संस्था विखंडित हो रही है। संयुक्त परिवार अब इतिहास में दर्ज होने की ओर बढ़ रहा है। दो पीढ़ियों के बीच विकास की गति इतनी तेज है कि हम उसे पुरातन और आधुनिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं। रोजगार के अवसर का कमतर होना युवा वर्ग को हतोत्साहित करता है। वह लगातार खुद को रोजगारोन्मुख बनाना चाहता है। इस क्रम में वह अपने परिवार और माता-पिता को उपेक्षित छोड़ने से भी गुरेज नहीं करता। दरअसल, महानगरीय संस्कृति में संबंधों की संवेदना का सिकुड़न लगातार जारी है। हर घटना पहले की घटना को पराजित कर देता है। दरअसल, हम सब आज जिस समाज में जी रहे हैं, वहां संबंध नहीं, समीकरण हावी है। वृद्ध जीवन की अपनी समस्याएं हैं। शरीरिक शक्ति का ह्रास, आर्थिक उपार्जन की शून्यता विचार और व्यवहार की नैतिक प्रतिबद्धता, सक्रिय जीवन से अलगाव। ये सब चीजें मिल कर आज उन वृद्धों को अप्रासंगिक बना देती हैं। घर की चारदिवारी में कैद जीवन, बहू और बेटों के सामने मौन और मूक जीवन की त्रासदी से मुठभेड़ करते वे आखिर किन उम्मीदों को अपना सहारा बनाएं?


जापान में वृद्धजन छोटे-छोटे बच्चों को चॉकलेट, खिलौने और कपड़े आदि उपहारस्वरूप देते हैं और उन बच्चों के साथ बातचीत करते हैं, क्योंकि मानवीय संवदेना और संवाद का कोई विकल्प नहीं है। यह अफसोसजनक संस्कृति भारतीय महानगरों में भी तेजी से फैल रही है। दो पीढ़ियों के बीच जितनी संवादहीनता होगी, संबंधों में दूरियां भी उतनी ही होगी। दौड़ता और हांफता जीवन अंदर से हमेशा थका होता है। महानगरीय जीवन में उस थकावट को साफ-साफ महसूस किया जा सकता है, क्योंकि यहां ग्राम्य जीवन की तरह मध्यवर्ग या निम्न मध्यवर्ग के सभी लोगों के पास आवास की सुविधा नहीं होती। बहुत सारे लोग सीमित कमरों में रहने को आदी होते हैं। अगर दो कमरों का मकान है तो एक कमरे में पति-पत्नी और दूसरे में बच्चे। फिर घर के बुजुर्ग कहां जाएं? अगर परिवार में संबंधों के निवर्हन का संस्कार है तो आपसी समझ से इस समस्या का समाधन ढूंढ़ लिया जाता है। नहीं तो उन बुजुर्गों को रोज-रोज ताने सुनने को विवश होना पड़ता है।
‘ओल्ड एज होम’ यानी वृद्धाश्रम कभी भी वृद्ध जीवन का सुरक्षित परिवेश नहीं हो सकता, क्योंकि वृद्धावस्था में जीवन जीने लायक संसाधन तो होते हैं, लेकिन जीवन का उमंग और संबंधों का राग गायब होता है। आखिर वृद्ध जन अपने परिवार और संबंधियों की याद के विरासत को कब तक संभाल पाएंगे। इसके अलावा, भारतीय समाज में बेटों की तुलना में बेटियों में अपने माता-पिता को लेकर चिंता और सेवा का भाव ज्यादा होता है। अच्छे-अच्छे घरों में पढ़े-लिखे तथाकथित बुद्धिजीवी-पुत्र अपने माता-पिता को अपमानित करने में गर्व महसूस करते हैं।
महानगरों की तुलना में गांवों में अभी भी लोक-लाज की परंपरा जीवित है और इसीलिए तुलनात्मक रूप से बुजुर्गों का जीवन वहां बेहतर है। लेकिन महानगर का यह संक्रमण गावों की ओर भी तेजी से फैल रहा है। आखिरकार वृद्धों की उपेक्षा करने वाली पीढ़ी यह क्यों नहीं सोचती कि उसकी भी अगली पीढ़ी उसके साथ वैसा ही बर्ताव कर सकती है। अगर हम ऐसा सोचें तो शायद व्यवहार की कटुता पर अंकुश रख सकें, क्योंकि डर जीवन को अनुशासित बनाता है। नई पीढ़ी के पास एक लोकप्रिय तर्क है कि वह बूढ़ों का वर्तमान देखें या अपना भविष्य। महत्त्वाकांक्षा की इस अंधी दौड़ में भविष्य की सुरक्षा प्राथमिक है, भले ही वर्तमान कुरूप और डरावना बन जाए। कवि जयश्ांकर प्रसाद ने ठीक ही कहा है कि ‘महत्त्वाकांक्षा की शर्त पर मनुष्यता सदैव हारती रही है।’
वृद्धजनों को लेकर सरकार की नीतियों में उदारता है, लेकिन व्यवहार की दरिद्रता ने उन नीतियों को बेमानी कर दिया है। क्या यह सच नहीं है कि आज हम बुजुर्गों के प्रति असहिष्णु और संवेदनहीन ढंग से पेश आते हैं? उनके प्रति हमारा व्यवहार संकुचित होता जा रहा है। भाव, शब्द और संबोधन में उस बुजुर्गियत के प्रति एक दूरी का रिश्ता बनता जा रहा है। बुजुर्गों को सम्मान, सुविधा और सुरक्षा की अपेक्षा अपने परिवार से ही रहती है, जो उम्र ढलने की आवश्यकता भी है। जिस परिवार को जीवन भर उन्होंने अपने अथक परिश्रम से सींचा है, आखिर में वह उसी परिवार पर बोझ सदृश हो जाते हैं। शायद उनके दुख का सबसे बड़ा कारण भी यही होता है।
महानगरों में बुजुर्गों की हत्या, लूट आदि के समाचार दैनिक जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। इसके लिए हम सब जिम्मेदार हैं। परिवार, समाज और सरकार की संयुक्त भागीदारी और सजगता के द्वारा ही हम अपने बुजुर्गों के अहसास को जीवंत कर सकते हैं। यह याद रखना चाहिए कि जीवनचक्र एक दिन हमें भी उस बुर्जुगयित की पंक्ति में खड़ा करेगा। आज अगर हम उनका वर्तमान बेहतर बनाते हैं तो निस्संदेह हमारा भविष्य बेहतर बनेगा।

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First Published on October 28, 2016 2:01 am

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