December 07, 2016

ताज़ा खबर

 

दुनिया मेरे आगेः वंचित सपने

दुनिया में कितना कुछ होता रहता है एक ही समय पर! कितने विचार, कितनी ही निराशा और आशाएं, कितने ही द्वंद्व इस दुनिया में एक साथ विचरण कर रहे हैं। क्या हम कभी सोचते हैं कि दुनिया की भीड़ में हमसे इतर कोई भी एक किसी एक पल में क्या सोचता होगा? शायद कभी कभी! […]

Author November 4, 2016 02:08 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

दुनिया में कितना कुछ होता रहता है एक ही समय पर! कितने विचार, कितनी ही निराशा और आशाएं, कितने ही द्वंद्व इस दुनिया में एक साथ विचरण कर रहे हैं। क्या हम कभी सोचते हैं कि दुनिया की भीड़ में हमसे इतर कोई भी एक किसी एक पल में क्या सोचता होगा? शायद कभी कभी! जब हम खुद में सिमटते हैं, शायद तब, या फिर तब जब हम खुद के साथ होते हैं, उस समय दुनिया के साथ अपने रिश्ते के बारे में सबसे अधिक सोचते हैं। जब हम सबके साथ हैं, तब शायद सबसे अकेले होते हैं और जब खुद के साथ होते हैं, तब हम दुनिया के साथ। मैं अकेली ही थी जब सड़क पर चलते उस नन्हे सपने से लदे एक बच्चे पर मेरी नजर गई। ढीली-सी पैंट से कमीज का एक कोना बाहर लटका था। कसे हुए जूतों के फीते अस्त-व्यस्त से लटक रहे थे। कमर पर लटकी हुई गठरी, जिसमें बहुत-से सपने किताबों में अक्षरों की तरह बंद हैं… बोझिल-से! बस्ते को संभालता चलता जा रहा था। किसी अनजानी दौड़ में भागती सड़क को अपनी मासूम आंखों से देखता और सड़क के रुकने का इंतजार करता। सड़क कुछ क्षण के लिए रुकती है, वह चल पड़ता है। फिर नहीं दिखता दोबारा। मगर उसके जैसी छवि उस जैसे सभी में है। मैं उसकी छवि लिए स्कूल पहुंची, जहां अब से दो साल पहले पढ़ाया था। दिल्ली का सरकारी स्कूल, जिसमें सुबह की पाली में लड़कियां पढ़ने आती हैं। बच्चियों की खिलती मुस्कान को देख कर लगता है कि दुनिया कितनी खुबसूरत है! कई तरह की उलझनों से गुजरती मैं उस दिन स्कूल पहुंची थी और हमेशा की तरह बच्चियों की मुस्कराहटों को देख कर और उनकी तरह-तरह की बातों को सुन कर अपनी उलझनों को थोड़ा ढीला होता महसूस कर पाई।


बच्चों ने मुझे बताया कि पिछले दिनों उनके साथ क्या-क्या घटित हुआ। जैसे किसी की नई ड्रेस सिल गई थी, किसी ने परीक्षा में अच्छे नंबर पा लिए थे, कोई पहले से ज्यादा लंबी हो गई थी, किसी को हिंदी पढ़नी आ गई थी, किसी को लिखना आ गया था, वगैरह। इसी बातचीत में एक बच्ची ने बताया कि हमारी क्लास को होशियार बच्चों का सेक्शन बना दिया गया है और जो बच्चे कमजोर थे, उन्हें अलग सेक्शन में डाल दिया गया है। मैंने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों किया गया है तो बच्चियों ने बताया,‘मैडम ने कहा है कि अब से होशियार बच्चे अलग बैठेंगे और कमजोर बच्चे अलग।’ मैं यह सुन कर थोड़ा परेशान हो गई और इस मुद्दे पर स्कूल शिक्षिकाओं से बात करने के बारे में सोचा। इस बीच पुष्पा दिखी। मैंने उसका और उसकी बहन लक्ष्मी का हाल पूछा। लक्ष्मी इस समय कक्षा में दिख नहीं रही थी। पुष्पा ने बताया कि उसकी बहन ने स्कूल छोड़ दिया है। तभी एक अन्य बच्ची ने कहा कि ‘मैडम, इसकी बहन तो कोठियों में सफाई का काम करने लगी है।’ फिर पुष्पा ने सकुचाते हुए बताया कि ‘उसे पढ़ना नहीं आता था तो उसने स्कूल छोड़ दिया। उसे स्कूल में अच्छा नहीं लगता था।’
यह सुन कर मैंने फिर वही तनाव महसूस किया, जिसे कुछ देर पहले ढीला होता महसूस कर रही थी। मैं वहां से निकली और अन्य शिक्षिकाओं से सेक्शन वाले मुद्दे पर पूछा तो पता चला कि प्रशासन की ओर से निर्देश आए हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने और पढ़ाई में कमजोर बच्चों पर अधिक ध्यान देने के लिए शैक्षिक रूप से कमतर बच्चों को अलग बैठाया जाए। यह जानने के बाद मन खासा खिन्न-सा हो गया और लगा कि भारत के कल्याणकारी राष्ट्र होने की संवैधानिक संकल्पना को किस प्रकार हमारा प्रशासन गुणवत्ता और परिवर्तन के नाम पर खोखला कर रहा है।

स्कूल की कक्षा में जहां बच्चे एक दूसरे के साथ सहयोग से संसार में व्याप्त ज्ञान सीखते हैं, वहां अब वे अपने ही मित्रों से कमतर और उच्चतर होने के भेद को मजबूत करेंगे। जो भेद बचपन से ही समाजीकरण की प्रक्रियाओं के चलते पैदा हो जाता है, उस भेद को स्कूल अब और मजबूती से फैलाएंगे और पोषित करेंगे।
भेदभाव की यह क्रूर व्यवस्था न जाने कितनी ही लक्ष्मियों को स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर देगी। न जाने कितनी लक्ष्मी पढ़ने, सीखने और खेलने के उन्मुक्त बचपन को छोड़ कर काम करने के बोझ को अपने कंधों पर ढोने के लिए मजबूर हो जाएंगी। क्या सरकार और प्रशासन की गुणवत्ता की संकल्पनाओं में बचपन से होते इस पलायन को रोकने के लिए कोई विचार या निर्देश है? गुणवत्ता के नाम पर बचपन और स्कूल से यह पलायन आखिर कब तक चलता रहेगा? आखिर कब तक बच्चों के सपने उनके लिए केवल किताबों के अक्षर बने रहेंगे? अक्षर जो दिखते तो हैं, पर समझ में नहीं आते। सवालों के इस जाल में सड़क पर चलते उस बच्चे और लक्ष्मी की छवि आमने-सामने नजर आने लगती है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 4, 2016 2:03 am

सबरंग