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चौपालः संकट की खेती

सरकार किसानों के लिए कई योजनाएं चला रही है लेकिन वे उनका लाभ प्राप्त नहीं कर पाते हैं। किसान अशिक्षित होने के कारण बैंक के नियमों को नहीं समझ पाता और बैंक से ऋण लेने में असमर्थता महसूस करता है।
Author August 26, 2017 03:06 am
तस्वीर का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया गय है। (File Photo)

पिछले सात दशक से किसानों को इंतजार है ऐसी सरकार का जो उनके मर्ज का इलाज करे, लक्षणों का नहीं। देशभर में जो लोग किसानों के विरोध की लहर को खारिज करते हैं उन्हें सबसे पहले भारतीय किसानों के जटिल अर्थशास्त्र को समझना चाहिए। भारत में अधिकतर किसान आपदा के एक ऐसे अशांत समुद्र में तैरते हैं, जहां उन्हें कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। भारत में आये दिन किसानों की आत्महत्याओं पर चर्चा होती है। किसान हताशा में नया नेता खोज रहे हैं जिस पर भरोसा कर सकें। उनकी कर्ज माफी की मांग भी उचित है। उनकी फसल केवल सूखे या बाढ़ से ही प्रभावित नहीं होती है बल्कि बेमौसम वर्षा भी खड़ी फसल को नष्ट कर देती है। इसमें सिंचाई कुछ राहत प्रदान कर सकती है। यह भी कृषि पैदावार से जुड़े जोखिमों से पूरी तरह निजात नहीं दिला सकती है। दूसरा संकट उपज की कीमतों को लेकर है। यदि पैदावार अधिक होती है तो थोक बाजारों में अनाज की कीमतें गिर जाती हैं। किसान इस संकट के जाल में फंस जाता है और आत्महत्या का रास्ता अपनाता है।

सरकार किसानों के लिए कई योजनाएं चला रही है लेकिन वे उनका लाभ प्राप्त नहीं कर पाते हैं। किसान अशिक्षित होने के कारण बैंक के नियमों को नहीं समझ पाता और बैंक से ऋण लेने में असमर्थता महसूस करता है। वह साहूकार से ऋण लेता है और उसका भुगतान अधिक ब्याज दर पर करता है। इस तरह उस पर ऋण का बोझ बढ़ता जाता है। सरकार और विशेषज्ञ कहते हैं कि कम उत्पादकता के कारण किसानों की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। लेकिन किसान अच्छी तरह जानता है कि दिक्कत क्या है। न्यूनतम समर्थन मूल्य को मूल रूप से गारंटीकृत कीमतों के जरिए जोखिम को कम करने का एक तरीका माना गया था। अब यह किसानों का राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने का जरिया बन गया है और किसानों की आत्महत्या एक राजनीतिक मुद्दा हो गई है। संसद में कई बार नेता किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा उठाते हैं, उस पर चर्चा भी होती है लेकिन समाधान कुछ नहीं होता है।

सरकार ने 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की थी लेकिन किसानों को उसका लाभ समय पर नहीं मिलता। उन्हें अगली बुवाई के लिए धन की आवश्यकता होती है। इस तरह किसान और कर्ज के संकट में फंस जाता है। 2016 में बढ़ती कीमतों और प्रोटीन की आवश्यकता के मद्देनजर सरकार ने किसानों को दालों की पैदावार के लिए प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप अत्यधिक पैदावार होने से दालों की कीमतें गिर गर्इं और उनका बाजार मूल्य समर्थन मूल्य से भी नीचे चला गया। किसानों को इसका फायदा नहीं हुआ। किसानों के इस संकट को दूर करने के लिए एक मजबूत तंत्र की आवश्यकता है। सरकार को विभिन्न योजनाओं की शुरुआत कर उनका सही तरह से क्रियान्वयन करते हुए किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करनी चाहिए।
’दिनेश देवासी, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

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