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दुनिया मेरे आगेः स्वच्छता के सवाल

आधुनिक काल में इस देश में स्वच्छता की ओर सबसे अधिक ध्यान महात्मा गांधी ने दिलाया था और बाकायदा इसका आग्रह आजीवन बनाए रखा था।
Author September 23, 2017 02:54 am

प्रयाग शुक्ल 

आधुनिक काल में इस देश में स्वच्छता की ओर सबसे अधिक ध्यान महात्मा गांधी ने दिलाया था और बाकायदा इसका आग्रह आजीवन बनाए रखा था। यह अभियान उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के दिनों से ही शुरू कर दिया था, जब वे ‘महात्मा’ नहीं बने थे। निजी पारिवारिक जीवन से लेकर टाल्सटॉय फार्म से जो आग्रह उन्होंने आरंभ किया था, वह खुद उनके साथ भी बना रहा। वर्धा के आमुम में भी यह प्रस्फुटित हुआ, जहां से कई वर्षों तक उन्होंने देशवासियों के साथ मिल कर आजादी की लड़ाई लड़ी थी। पर जितने जोर-शोर से वह यह अभियान चलाना चाहते थे, उतनी जोर-शोर से शायद वह चल नहीं सका था। इसका एक बड़ा कारण तो यही था कि ब्रितानी हुकूमत से लड़ने की विधियों में, उसमें खर्च होती शक्ति में, ‘स्वच्छता’ पर उनके लगातार के आग्रह को अगर धूमिल नहीं पड़ना था तो कुछ ‘अलक्षित’ तो होना था। हालांकि उनकी यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी कि उनके कर्म और उनके विचारों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने उनके इस आग्रह को पूरी तरह स्वीकारा था और अपने जीवन में इसे सचमुच सादगी और स्वच्छता के साथ उतारा था।

वे कार्यकर्ता साफ धुली खादी पहनते थे, चरखा चलाते थे, बहुत कम चीजों से अपना काम चलाते थे, नैतिक रूप से भी स्वच्छ होने का एक आग्रह बनाए रखते थे। यही कारण है कि ‘गांधीवादी कार्यकर्ता’ अलग से पहचाने जाते रहे हैं सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, अकादमिक क्षेत्रों में और कला और साहित्य की दुनिया में भी। ऐसे कार्यकर्ता समूचे देश में फैले रहे हैं गांव-शहर में और दिख जाते हैं कहीं-कहीं और मन में एक पुलक-सी उपजाते हैं। यह अकारण नहीं है कि जब सर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ में वे कार्यकर्ता दिखाई पड़े तो समूची दुनिया के करोड़ों लोगों को उन्होंने अपनी नैतिकता, आत्मबल, अहिंसा और स्वच्छता से भी प्रभावित किया।

दरअसल, स्वच्छता के आज के आग्रह और मूल्य की बात को हमने अपने भीतर-बाहर ठीक से उतारा नहीं है। स्वच्छता की किसी बहस में इस बात का उदाहरण ठीक ही दिया जाता हैं कि देश के जो लोग बाहर दूसरे देशों में जाते हैं तो वे उस देश के स्वच्छता के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं, लेकिन वही लोग यहां कहीं केले का छिलका उछाल देने में, कागज का टुकड़ा या खाने-पीने का बचा-खुचा सामान सड़क किनारे ही कहीं डाल देने में बिल्कुल संकोच नहीं करते। भला किसने नहीं देखी होंगी शिमला से दिल्ली के रास्ते में बाहर फेंकी गई कूड़े वाली चीजें।
लेकिन धीरे-धीरे निजी या सरकारी, सभी स्कूलों में स्वच्छता का आग्रह बहुत बढ़ा है। कई स्कूलों के परिसर तो बहुत सुंदर लगते हैं। लेकिन भला कौन नहीं जानता कि रोजमर्रा के शहरी और ग्रामीण जीवन में स्वच्छता और शौचालयों के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सरकारी विज्ञापनों से लेकर कॉरपोरेट जगत के विज्ञापनों तक से जागरूकता बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं। महात्मा गांधी का चश्मा इस अभियान में हमें कहीं न कहीं से झांकता हुआ मिल जाता है।

लेकिन हमारी भारतीय रेल जो अपने जीवन के शुरुआती वर्षों से क्रमश: हमें ‘भारत दर्शन’ भी कराती आ रही है, उससे दिल्ली से मुंबई, चेन्नई या कोलकाता के लिए की गई कोई भी यात्रा आज भी कूड़े के ढेरों से हमारा सामना कराती है। हमें गंदी बस्तियां और गंदले पानी के तालाबों, गड्ढों से मुखातिब करती है। यह दृश्य कब और कैसे बदलेगा, कौन कह सकता है? मगर इसमें क्या शक कि बिना मानसिकता बदले सिर्फ विज्ञापनों या आग्रहों के आधार पर इसे नहीं बदला जा सकता। जिसे हम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कहते हैं, उसके दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव में अभी ये दृश्य सामान्य हैं कि किसी बड़े होटल, रेस्तरां, बाजार, सुपर स्टोर और यहां तक कि किसी फैशन स्टोर तक के सामने की खुली हुई नाली मिल जाती है या फेंका हुआ कूड़ा। हां, सूरत शहर जैसे उदाहरण जरूर हमारे सामने हैं जहां एक कमिश्नर के आग्रह और अभियान पर लोगों के इसमें स्वत: स्फूर्त ढंग से शामिल होते चले जाने से एक शहर का कायापलट हो गया। लेकिन दूसरी ओर जब तक स्लम बस्तियों सहित किसी भी इलाके की खुली हुई नालियां या गंदे तालाब हैं, कूड़े के ढेर हैं, तब तक देश मंजिल से अभी दूर है।

कैसे बदले हमारी मानसिकता, कैसे पैदा हो वह ‘स्वच्छ’ नैतिकता जो घूसखोरी, भ्रष्टाचार, मिलावट से हमें दूर रखे! दूर रखे उस क्रूरता से जो बलात्कार, स्त्री प्रताड़ना, घरेलू कर्मचारियों के साथ बरती जाने वाली हिंसा और बच्चों को मिड-डे मील के नाम पर जहर देने वाली मनोवृत्ति से छुटकारा दिलाए। समस्याएं और उनका निदान हमें पता है, लेकिन निदान पर अमल करने वाली दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव लगता है, वह पैदा हो जाए तो चाहे बाहर कूड़े का ढेर हो या मन के भीतर के, उन्हें हटने में देर न लगे! हां, गांधी ही हो सकते हैं, आज भी प्रेरणा। पर हम उन्हें याद रखें तब न!

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