December 08, 2016

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दुनिया मेरे आगेः रचनाकार का मानस

मेरी स्नातकोत्तर की पढ़ाई जब अंतिम चरण में थी, तब मुझे अलग कुछ पढ़ने का जुनून सवार हुआ। एक बार कुछ दिनों के लिए एक दोस्त के साथ रुका था।

Author November 12, 2016 02:38 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

आलोक रंजन

मेरी स्नातकोत्तर की पढ़ाई जब अंतिम चरण में थी, तब मुझे अलग कुछ पढ़ने का जुनून सवार हुआ। एक बार कुछ दिनों के लिए एक दोस्त के साथ रुका था। उसने कॉलेज में आयोजित कई प्रतियोगिताओं में पहला स्थान प्राप्त किया था, जिसके पुरस्कारों के रूप में उसे कई बेहतरीन किताबें मिली थीं। पता चला कि उसने उनमें से दस प्रतिशत किताबें भी नहीं पढ़ी हैं। तभी यह तय हो गया कि हम दोनों मिल कर इन किताबों को पढ़ डालेंगे। हमने बड़े-बड़े नामी रचनाकारों की किताबें पढ़ डालीं। आपसी बातचीत में हम उनकी समीक्षा भी कर देते।
इस दौरान एक रचनाकार के निर्माण में झांकने या उसके विकास को समझने के प्रश्न को और हवा मिली। वे पढ़ने वाले दिन बीते, लेकिन पढ़ने की एक आदत जो लग गई, उसने हिंदी से अंग्रेजी की या अंग्रेजी में उपलब्ध किताबों की ओर बढ़ने के लिए उत्साहित किया। उन दिनों यह बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगने लगी थी कि चिनुआ एचबे ने कम उम्र में उतनी बेहतरीन किताब लिख दी या फिर मार्क्वेज ‘हंड्रेड ईयर्स आॅफ सोलीट्यूड’ में अस्सी फीसद किताब केवल ब्योरा देने में खर्च कर रहे हैं, क्यों चेखव का ‘तीन’ इतना महत्त्वपूर्ण है! ओरहान पामुक को एक लेखक के बजाय चचा ग़ालिब की तर्ज पर हम ‘पामुक अंकल’ कहने लगे थे। यही हाल मारियो वरगोस लोसा का था।

यह खेल भी इसी दौर में शुरू हुआ, जब यह एक काल्पनिक-सा दृश्य लगने लगा कि कोई व्यक्ति सो रहा हो और उसके सिरहाने कोई किताब रखी हो या फिर सो रहे इंसान की छाती पर कोई किताब औंधी पड़ी हो। दूसरों की बात बाद में, लेकिन जब मैं खुद को देखता हूं तो पाता हूं कि तकनीक ने किताबें पढ़ने की मेरी आदत को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसा नहीं कि मैं आज किताबें नहीं खरीदता हूं, लेकिन पढ़ने की गति धीमी पड़ गई है।

हाल ही में एक दोस्त ने दिल्ली से किताब खरीद कर भेजी- ‘मोरीला’। इस किताब ने अचानक एमए के दौर के उस प्रश्न को जिंदा कर दिया, जिसमें मैं लेखक के बनने की प्रक्रिया और कारणों को खोजता रहता था। यह ऐसी पहली किताब थी, जिसके लेखक को मैं जानता था। हमने साथ में एमए किया था और हाल तक साथ में रात-रात भर यायावरी की थी। जो लोग प्रेमचंद या कि ओरहान पामुक या फिर शरतचंद्र के साथ रहे होंगे, वे जानते होंगे कि कौन-सी बातें थीं, जो इन बड़े नामों को लेखक बनाने के लिए कारण बन रही थीं। ‘मोरीला’ के मिलने के बाद मैंने फिर ठीक से सोचना शुरू किया। मैंने इस किताब के लेखक और हमारे बीच के प्रसंगों और उन दृश्यों को छितरा दिया जो जेहन में थे। ये सब उतने ही सामान्य थे, जो किसी की भी जिंदगी में हो सकते हैं। रात को विश्वविद्यालय में आंवले तोड़ता और एक प्यारे-से पिल्ले को घर ले जाने की जुगत करता दोस्त कतई इस संभावना से नहीं भर पा रहा था कि पुस्तकालय के पीछे के जंगल में से आने वाली मोरों की आवाज, जिसे हम उन दिनों ‘मिसकॉल’ कहा करते थे, पूरी की पूरी किताब की शक्ल ले लेगी। इस बीच हमने कई शामें दिल्ली के कुछ पार्कों में बिताई थीं, जहां हम अपने-अपने दावे करते थे, अपने-अपने सपनों के धुएं उड़ाया करते।

लेकिन यह भी सामान्य ही था, असामान्य कुछ भी नहीं लग रहा था।
जब मैं अपने प्रश्न को अनुत्तरित मान कर मन के अंधेरे दराज में फिर से ठूंसने ही वाला था, तभी ‘मोरीला’ के एक प्रसंग ने मेरी सहायता कर दी। उसमें लिखा था- ‘पौधे बहुत बदमाश चीज हैं जो खुली आंखों के सामने तो कोई हरकत नहीं करते, लेकिन जैसे ही हम पलक झपकाते हैं, वे उन नन्हें क्षणों का फायदा उठा कर उनमें विकास कर जाते हैं।’ यह वह बिंदु था, जहां आकर मुझे लगा कि लेखक या कवि भी तो ऐसे ही होते हैं। पौधे की तरह विकसित होते तो हैं, लेकिन यह प्रक्रिया किसी खास दिन कहां हुई रहती है। लेखक या कवि में जो भर रहा होता है, वह धान में भर रहे दूध के समान होता है जो लगातार भरता है, अचानक नहीं। हम देखते हैं तो बस चावल, बल्कि उससे भी आगे पका हुआ चावल। किताब लेखक का वही पका हुआ चावल है। हो सकता है कुछ लोग यह उत्तर पहले पा गए हों, लेकिन उनके उत्तर तक पहुंचने का सूत्र भी मेरी तरह ही बहुत करीब से गुजरा होगा! ये बहुत प्रभावशाली तरीके से उन सभी गुत्थियों को खोलते हैं जो लंबे समय से बनी हुए हों। वरना बाहर तो तमाशे होते ही रहते हैं और हमारे अंतस की उलझनों से उनका अलगाव बना ही रहता है।

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First Published on November 12, 2016 2:33 am

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