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दुनिया मेरे आगेः छोटे-छोटे झूठ

सुबह-सुबह सबको जल्दी होती है। कोई बस के पीछे भागता है तो कोई अपने बच्चों के साथ स्कूल छोड़ने की जल्दी में दौड़ रहा होता है।
Author May 5, 2017 03:15 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अजीत कुमार ‘यश’

सुबह-सुबह सबको जल्दी होती है। कोई बस के पीछे भागता है तो कोई अपने बच्चों के साथ स्कूल छोड़ने की जल्दी में दौड़ रहा होता है। मैं भी उस दिन अन्य लोगों की ही तरह बहुत जल्दी में था। बेटे को स्कूल छोड़ने के लिए मोटर साइकिल पर तो बैठ गया, पर हेलमेट नहीं पहना। बेटा भी लपक कर मेरे पीछे सीट पर बैठ गया। घर से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्कूल था, जिसमें तीन ट्रैफिक सिग्नल पड़ते हैं। उस दिन दो तो हरे निकल गए, लेकिन तीसरा लाल था। अपनी गर्दन को दाएं-बाएं घुमा कर देखा और रोज की तरह जैसे ही यह सुनिश्चित हुआ कि कोई पुलिस वाला दूर-दूर तक मुझे नहीं देख रहा है, मैं आगे बढ़ गया।

जैसे ही मैं आगे बढ़ा, पीछे से ट्रैफिक पुलिस की बाइक पता नहीं कहां से आ गई। मैंने घबरा कर अपनी बाइक सड़क किनारे लगाई। पुलिस वालों ने जब मुझसे पूछा कि सिग्नल क्यों तोड़ा तो मैं साफ-साफ मुकर गया कि मैंने सिग्नल देखा ही नहीं, गलती हो गई; और एक झूठ बोल कर कि बेटे की परीक्षा है, मुझे देर हो रही है, मैं आगे बढ़ गया। पुलिस वालों ने मुझे जाने दिया। रोज की तरह उस दिन भी बेटे को स्कूल पहुंचा कर मैं घर आ गया। दोपहर में मेरा बेटा जब स्कूल से लौट कर आया तो थोड़ा उदास दिखाई दे रहा था। किताब निकाल कर न जाने क्या देख रहा था। शाम होते-होते उसने अपनी खामोशी तोड़ी और बोला कि कल से स्कूल जाना बंद।

मैंने पूछा- ‘स्कूल जाना क्यों बंद!’ बेटे ने कहा- ‘क्या फायदा स्कूल जाने का? स्कूल में मैडम जो पढ़ाती हैं, वह सब गलत है! क्या हम स्कूल में पढ़ने से कुछ सीखते हैं?’ मैंने तपाक से बोला- ‘हां, हम स्कूल से ही तो सब कुछ सीखते हैं। अच्छा नागरिक बनते हैं, अच्छे-बुरे की पहचान होती है। लेकिन तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो आज?’ उसने पूछा- ‘आप रोज-रोज सिग्नल क्यों तोड़ते हैं। जब आपको मालूम है कि रेड लाइट पर हमें रुकना चाहिए तो आप रुकते क्यों नहीं!’ मुझे तुरंत समझ में आ गया कि माजरा क्या है। उस दिन देर रात मैं खुद पर शर्म महसूस कर रहा था। सोच रहा था कि आज बेटे ने मेरे पढ़े हुए और व्यावहारिक ज्ञान का अंतर बता दिया।

मैं सोचने पर विवश हो गया कि क्या सच में हम अपने पढ़े-लिखे होने के दायित्वों का निर्वाह करते हैं! हम जानते हैं कि झूठ बोलना गलत है और अपने बच्चों से उम्मीद रखते हैं कि वे हमसे झूठ न बोलें। लेकिन हम अपने बच्चों से और उनके सामने बाहर वालों से छोटी-छोटी बातों पर भी झूठ बोलते हैं। दरअसल, हमारे समय की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि हम पुस्तकीय ज्ञान को महज पुस्तकों तक सीमित कर देते हैं। स्थिति यह है कि अगर कोई हमसे अच्छी बातें कहता है तो हम उन्हें किताबी बातें कह कह खिल्ली उड़ा देते हैं। दरअसल, हमें सोचना चाहिए कि पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान को किस तरह अपने जीवन में लागू करें। पढ़-लिख कर बड़ी-बड़ी डिग्री हासिल कर लेने से हमें नौकरी तो मिल जाती है पर उस नौकरी में सफलता पाने के लिए हमें व्यावहारिक जीवन में सच्चाई और अनुशासन का पालन करना पड़ता है।

क्या हमें नहीं पता कि नियम-कानून के पालन से ही किसी समाज का संतुलित और सहज विकास होता है? जानते हुए भी हम ऐसे ज्ञान को अपने व्यावहारिक जीवन में क्यों नहीं उतार पाते? वर्तमान समय में हम लगातार देख रहे हैं कि सड़क सुरक्षा को लेकर सरकार नए-नए नियम बना रही है और न्यायालय का रुख भी सख्त है। लेकिन इन नियमों के पालन के बजाय हम इन्हें तोड़ने के लिए अपना दिमाग लगाने लगते हैं। शराब पीकर गाड़ी चलाने पर प्रतिबंध का मामला हो या राष्ट्रीय राजमार्गों से शराब की दुकानें बंद करने का विषय, हम देख रहे हैं कि हमारा रवैया इन नियमों के पालन के लिए नहीं, बल्कि इन्हें तोड़ने और अपने लिए एक सरल रास्ता खोज लेने पर अधिक केंद्रित है। सड़क दुर्घटना में मरने वालों के आंकड़ों पर ध्यान दें तो इन सभी दुर्घटनाओं में शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के कारण अधिक लोगों की जानें गई हैं।

पढ़े-लिखे होने के बावजूद अगर हम मूलभूत शिक्षा को अपने व्यवहार में नहीं लाते तो हमारा पढ़ना-लिखना किस काम का! इसी तरह, झूठ नहीं बोलना चाहिए, यह रटते-रटाते हम चाहे-अनचाहे झूठ बोलते हैं। हमें यह भी फिक्र नहीं होती कि अपने बच्चों के सामने ही झूठ बोलते हैं और कानून तोड़ कर उनका भी दीर्घकालीन नुकसान कर रहे होते हैं। वास्तविक शिक्षा के मूल अर्थ से कटा हुआ हमारा दैनिक जीवन बेशक छोटी और क्षणिक सफलताएं पा सकता है, लेकिन बृहद और दीर्घकालीन सफलता के लिए हमें पुस्तकीय ज्ञान को अपने जीवन में उतारना होगा।

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First Published on May 5, 2017 3:15 am

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