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परंपरा की आधुनिकता

आधुनिकता की समझ के लिए परंपरा का ज्ञान होना उतना ही जरूरी है, जितना किसी प्यासे व्यक्ति के लिए पानी।
Author नई दिल्ली | July 8, 2016 09:28 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

आधुनिकता की समझ के लिए परंपरा का ज्ञान होना उतना ही जरूरी है, जितना किसी प्यासे व्यक्ति के लिए पानी। जबकि ‘परंपरा का सिर्फ ज्ञान रखना परंपरावादी होना नहीं है’ तो आधुनिकता की संपूर्णता को परंपरा से अलग रख कर देखना कहां तक संभव है! कोई प्रक्रिया कड़े और लगातार प्रयोगों से गुजरने के बाद परंपरा का रूप ले पाती है तो वह संगत परिवर्तन की गुंजाइश भी साथ लेकर चलती है। समय सापेक्ष उसके मूल्यांकन के अभाव में अगर कोई परंपरा जड़ हो जाए तो वह अपने किसी भी रूप में परंपरा नहीं रहती, प्रथा या रूढ़ि बन जाती है।

साहित्य की विशाल परंपरा में ऐतिहासिक चेतना के सहारे किसी कृति के कालजीवी और कालजयी होने के फर्क को समझा जा सकता है। वहां कालजीवी रचना किसी समय विशेष में गंभीर योगदान देते हुए प्रासंगिक होती है, वहीं कालजयी कृति अपने युग से इतर दूसरे युग में अतिक्रमण करती है। फिर भी साहित्य के लिए दोनों का अपना महत्त्व है। आधुनिक संदर्भों में भक्तिकाल का काव्य और कवि साहित्य की परंपरा में कितने आधुनिक हैं? यह किसी से छिपा नहीं है। फिर भी तत्कालीन समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा था, क्या आज हजार साल बाद भी समाज में वे समस्याएं किसी न किसी रूप में बनी हुई हैं?

परिवर्तन की प्रक्रिया परंपरा का ही हिस्सा है जो कि नवीनता को जन्म देती है, क्योंकि नवीनता की शुरुआत शून्य से नहीं हो सकती। परिवर्तन की प्रक्रिया द्वारा किसी परंपरा के आधुनिक रूप लेने में निरंतरता रूपी कड़ी का विशेष महत्त्व है। तभी ‘परंपरा से हमें समूचा अतीत नहीं प्राप्त होता, बल्कि उसका निरंतर बिखरता छंटता बदलता रूप प्राप्त होता है, जिसके आधार पर हम आगे की जीवन पद्धति को रूप देते हैं।’ परिवर्तन और निरंतरता परंपरा को मांजते हैं, जिससे परंपरा अपनी अर्थवत्ता को बनाए रखती है और अपने वास्तविक संदर्भों में आधुनिकता के गुणों को समाहित कर आगे बढ़ती है।

किसी भी परंपरा की तार्किक प्रवृत्ति उसे जीवंत बनाए रखने में मदद करती है। अन्यथा परंपरा को सूख कर जड़ होने में समय नहीं लगता। साहित्य की बेहतर जांच या परख के लिए ‘पाने-पेचकस’ परंपरा से ही आते हैं। इसके बाद आलोचना जिन मूल्यों का सृजन करती है, परंपरा उन मूल्यों की वाहक बनती है और पीढ़ी दर पीढ़ी मूल्यों का हस्तांतरण करती चलती है।

जब हम अपनी परंपराओं को जानने का प्रयास करते हैं तो हमारा युगबोध सुदृढ़ होता जाता है। इसके बाद आधुनिकता को भी सही मानकों के जरिए मापने का काम संभव है। अन्यथा आधुनिकता के नाम पर सही और गलत को बिना समझे आगे बढ़ना, समस्याओं को बुलावा देना है जो पीढ़ी दर पीढ़ी परिलक्षित होती हैं। लेकिन आमतौर पर लोग इस पहलू को एक गैरजरूरी बात मान कर चलते हैं। सच यह है कि आधुनिकता के आईने में सब वैसा नहीं होता, जैसा दिखाई देता है। आधुनिकता के वास्तविक दर्शन के लिए परंपरा की प्रामाणिकता आवश्यक है। तभी एक ठोस निष्कर्ष तक पहुंचना संभव हो पाता है।

किसी परंपरा की नई व्याख्या करना भी दरअसल सृजन करना है। दुनिया भर के साहित्य में मिथकों का अपना विशेष महत्त्व होता है। इतिहास के किसी कालखंड से घटनाक्रम दिखाते हुए रचनाकार अनेक अद्भुत पात्रों की कल्पना कर उन्हें रचनात्मक जमीन प्रदान करता है और कालांतर में इन्हीं पात्रों को लेकर अलग-अलग तरह की रचनाएं साहित्यिक कर्म का हिस्सा बनती हैं। वहीं पुराने साहित्यकारों की कृतियों पर नए दृष्टिकोण से सोच कर पुनर्सृजन करना रचनात्मकता को नए आयाम देना है। इससे एक ओर साहित्य की परंपरा पुष्ट होती है, वहीं ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को वैचारिक आधार मिलता है। यह पहले भी होता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में किसी बहुत पुरानी कृति में मौजूद पात्रों या मिथकों की नए सिरे से व्याख्या हो रही है, रचनाओं का पुनर्पाठ किया जा रहा है। जाहिर है, किसी खास रचना में मौजूद प्रसंगों से निर्मित धारणाएं भी बदल रही हैं।

साहित्य लेखन हो या आलोचना कर्म, किसी भी तरह के वैचारिक लेखन में अगर परंपरा से ‘खाद-पानी’ लिया जाता है तो आगे की रचनात्मक फसल भी उतनी ही अच्छी होती है। यों अपने अतीत को छूते हुए आज से गुजरना सहृदय पाठक के लिए भी अनूठा अनुभव होता है। आखिरकार परंपरा एक गतिशील प्रक्रिया है जो सतत मूल्यांकन के चलते कभी भी आधुनिकता की विरोधी नहीं होकर उसकी पूरक होती है।

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