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दुनिया मेरे आगे : भाई बनोगे क्या

क्यों हमारी मानसिकता इस तरह की है, जिसमें घर से बाहर भाई या बहन बनना अपमानजनक माना जाता है?
Author नई दिल्ली | August 9, 2016 04:54 am
दिल्ली में सजी राखियों की दुकान (PTI File Photo)

इस बात का संदर्भ तो समाज के रोजमर्रा के बर्ताव में घुला-मिला है, लेकिन मेरे हिस्से से थोड़ा पुराना है। यही सावन का मौसम था, चारों तरफ हरियाली बिखरी पड़ी थी। हलकी बूंदा-बांदी से मौसम खुशगवार था। रक्षाबंधन का त्योहार भी पास आ रहा था। जगह-जगह दुकानें खूबसूरत राखियों से सजी हुई थीं और राखी से जुड़े फिल्मी गीत भी बज रहे थे। तब मैं एमए में थी। एक दिन क्लास में लेक्चर खत्म होने के बाद भी हम तीन विद्यार्थी बैठे रह गए थे, क्योंकि पिछले लेक्चर के नोट्स हमें एक-दूसरे से लेने थे। एक सहपाठी से मेरी थोड़ी अच्छे से बातचीत होने लगी थी। उसे देख कर मेरे मन में एक खयाल आया और मैंने झट से उससे पूछ दिया- ‘सुनो, क्या तुम मेरे भाई बनोगे?’ मैंने बड़े उत्साह से यह सवाल पूछा था, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया से सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। उसने जैसे घबरा कर पूछा- ‘क्या कहा, भाई? तुम्हारा कोई भाई नहीं है क्या?’ मैंने थोड़ा बुझे स्वर में कहा कि भाई है, लेकिन यह पहला साल है जब मैं रक्षाबंधन में घर से बाहर हूं। इसलिए मैंने सोचा कि किसी को राखी बांध कर रक्षाबंधन में घर और भाई से दूर होने के मलाल को कम कर लूं। उस सहपाठी ने कहा- ‘देखो, दोस्ती सबसे प्यारा रिश्ता होता है। भाई-वाई का रिश्ता तो एक बोझ की तरह होता है। इसलिए यह खयाल दिमाग से निकाल दो।’ वह एक झटके में बोल तो गया, लेकिन शायद उसकी सांस फूल रही थी। दूसरा सहपाठी हमारी बात सुन रहा था।

मुझे थोड़ा दुख हुआ, मगर मैंने कुछ कहा नहीं। लेकिन दूसरे दिन तक यह खबर आग की तरह पूरी क्लास में फैल चुकी थी। यह ‘मेहनत’ शायद उस दूसरे दूर बैठे सहपाठी की थी! जिस सहपाठी को मैंने भाई बनाना चाहा था, वह अब मुझे देखते ही दूर खिसक लेता था। एक दिन मैंने उससे वजह पूछी तो उसने कहा- ‘तुम्हारी वजह से पूरी क्लास मुझे ताने मारती है। सारे सीनियर विद्यार्थी भी मुझे देखते ही दूर से हंस पड़ते हैं कि देखो आ गया ‘भइया’। तुमने अगर उस दिन मुझे यह प्रस्ताव नहीं दिया होता तो मुझे आज इस तरह सबकी हंसी का पात्र नहीं बनना पड़ता।’ मैं सोच में डूबी हुई थी कि आखिर मैंने ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया! एक अन्य सहपाठी ने सारा माजरा बताया। उसने कहा- ‘तुमने क्लास के सबसे स्मार्ट समझे जाने वाले लड़के को भाई बनाने का प्रस्ताव दे दिया। वह इसी से दुखी और शर्मिंदा है। उसके सारे दोस्त और सीनियर विद्यार्थी भी उसका मजाक उड़ा रहे हैं। फिर यह भी सोचो कि किसी गैर लड़की को बहन बनाना कितना तकलीफदेह होता है। बहन बनाने का मतलब यह भी है कि अगर किसी ने भी तुम्हें तंग करने की कोशिश की तो एक भाई की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि वह उससे लड़े। फिर अगर कल को तुम किसी पुरुष मित्र के साथ घूमने-फिरने लगी तो भी दुनिया तुम्हारे उस भाई को ही ताने देगी। बहनें जब पहले से ही घर में हों तो अलग से बहन कोई क्यों बनाना चाहेगा।’ मैंने जवाब दिया कि स्थिति अगर इसके उलट हो तो क्या किया जाए? मसलन, वह भाई किसी लड़की के साथ यों ही टाइमपास के लिए उसके साथ घूमे..! लेकिन यह खयाल मुझे क्यों नहीं कभी सताता? दोस्त ने इस मुद्दे को छोड़ देने के लिए कहा और मुझे पाठ पढ़ाने की कोशिश की कि समाज के नियम-कानून स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग हैं। कोई लड़का किसी लड़की के साथ घूमता है तो उसका ‘स्टेटस’ बढ़ जाता है, जबकि कोई लड़की ऐसा करती है तो वह बदनामी झेलती है।

तब मैं चूंकि समाज और उसमें स्त्री-पुरुष की स्थिति को लेकर बहुत सजग नहीं थी, इसलिए यह मेरे लिए सोचने का मसला था। उस दिन के बाद जिस सहपाठी को मैंने भाई बनाना चाहा था, उससे मेरी बातचीत लगभग बंद हो गई। मैंने कई बार महसूस किया कि अब वह मेरे सामने सहज नहीं हो पाता था। यह भी पता चल गया कि भाई बनने के प्रस्ताव से भी ज्यादा आहत वह इस बात से हुआ कि समाज जिस शक्लो-सूरत और पहनावे वाले लड़के को ‘स्मार्ट’ मानता है, उसे कोई भाई बनने का प्रस्ताव कैसे दे सकता है! लेकिन एक बात मेरी समझ में तब और अब भी नहीं आई कि कोई ‘स्मार्ट’ पुरुष अपने घर से बाहर किसी लड़की का भाई क्यों नहीं बन सकता या नहीं बनना चाहता? क्यों रोजमर्रा की बातचीत में ‘भैया टाइप’ या फिर ‘बहनजी टाइप’ कह कर हम किसी का भी मजाक उड़ाते हैं? क्यों हमारी मानसिकता इस तरह की है, जिसमें घर से बाहर भाई या बहन बनना अपमानजनक माना जाता है? इस घटना के बाद मैंने किसी को भाई बनने के लिए तो नहीं कहा, लेकिन अमूमन हर साल घर और अपने भाई से दूर रहते हुए कई बार ऐसी इच्छा जागती है। हो सकता है कि पुरुष दोस्त मेरी इस उलझन का कोई हल बताएं!

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