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दुनिया मेरे आगे : सोशल मीडिया की माया

सोशल मीडिया पर अब जो कुछ सार्वजनिक हो रहा है, उसमें सच और झूठ के बीच का अंतर कम होता जा रहा है। इसने सृजनशीलता और मनोरंजन के बाजार में हड़कंप पैदा किया।
Author नई दिल्ली | May 31, 2016 21:51 pm
प्रतीकात्मक तस्वीर

इस देश की युवा जनसंख्या एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है जो अनेक प्रकार की सामाजिक चिंताएं पैदा करता है। सोशल मीडिया के प्रति युवाओं के एक बहुत बड़े हिस्से का आकर्षण एक गहरी लत के स्तर तक जा पहुंचा है और वह सामाजिक जीवन के एक बड़े भाग को प्रभावित और निर्धारित करने लगा है। राजस्थान के कोटा में अवलोकन के दौरान मैंने पाया कि अध्ययन के लिए आए हुए युवा सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों का अत्यधिक इस्तेमाल करने में लगे हुए हैं। इस आदत ने सामाजिक जीवन को व्याधि के स्तर तक प्रभावित किया है। इन गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण युवाओं में शारीरिक बीमारियां बेतहाशा बढ़ रही हैं।

शारीरिक श्रम या गतिविधियों में तेजी से कमी आई है। लगभग आठ साल पहले जब वहां मैंने शिक्षण कार्य शुरू किया था तो सुबह पार्क में टहलते हुए अनेक युवाओं से बातचीत हो जाती थी। लेकिन अब यह संख्या बहुत कम हो गई है। बहुत सारे युवाओं का वजन बढ़ रहा है। नींद पर्याप्त न लेने के कारण कामकाज के प्रति रुचि का कम होते जाना जाहिर होने लगा है। किसी काम को लेकर वे ‘कल करेंगे’ के तर्क को पेश करते हैं। यह ठहराव धीरे-धीरे कुंठा और पराजय की स्थितियों को जन्म देता है। युवाओं में ऐसी निराशा का भाव एक नए प्रकार की सांस्कृतिक विसंगति को जन्म दे सकता है। यह संस्कृति न केवल सामाजिक संबंधों में उनकी सहभागिता को कम करती है, बल्कि उन्हें भय और आक्रामकता का शिकार बनाती है और कहीं न कहीं आत्महत्या की प्रवृत्ति के उत्पन्न होने में योगदान करती है। इसके अलावा, धूम्रपान और मादक द्रव्यों के सेवन से लेकर दिखावे की दूसरी चीजों के प्रति भी उनका आकर्षण बढ़ा है।

दरअसल, सोशल मीडिया का प्रयोग युवा वर्ग के लिए एक ब्रांड का रूप ले चुका है। वे दलील देते हैं कि इसका अधिक से अधिक प्रयोग उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि करेगा। कोटा के विद्यार्थियों के मुताबिक किताब, स्टेशनरी, मनोरंजन के लिए सिनेमा, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि में व्यय और यहां तक कि अच्छे होटल और रेस्तरां में खाने की आवृत्ति में कमी कर स्मार्टफोन खरीदने के लिए पैसे की बचत की जाने लगी है। इसके अलावा, माता-पिता पर यह भावनात्मक दबाव डाला जाने लगा है कि वे महंगे स्मार्टफोन और सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराएं। इस बढ़ते हुए बाजार का लाभ कॉरपोरेट घरानों को हो रहा है। कोटा में यह दबाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि प्रतिष्ठा का न बढ़ना या ब्रांड के बाजार में पीछे छूटने की शंका शैक्षणिक प्रयासों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने का एक ऐसा कारण बनती है जो कालांतर में आत्महत्या की प्रवृत्ति को भी जन्म देता है।

सोशल मीडिया पर अब जो कुछ सार्वजनिक हो रहा है, उसमें सच और झूठ के बीच का अंतर कम होता जा रहा है। इसने सृजनशीलता और मनोरंजन के बाजार में हड़कंप पैदा किया। दूसरी सूचनाएं देकर युवाओं को आक्रामक बना देना एक ऐसी कोशिश है, जो एक तरफ सामाजिक विभाजन पैदा करती है, दूसरी तरफ अनावश्यक तनाव को व्यक्तित्व में भर देती है। एक सीमा तक यह कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया ने वंचना और कुंठा के समाज मनोविज्ञान को नए अर्थ दिए हैं। ऐसा लगता है कि फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत को सोशल मीडिया के संदर्भ में नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। क्या युवाओं के सपनों को सोशल मीडिया निर्मित कर रहा है? या फिर युवा-सपनों को केंद्र में रख कर सोशल मीडिया नई सांस्कृतिक फैंटेसी उत्पन्न कर रहा है? इन सवालों पर समाज वैज्ञानिकों को विचार करने की आवश्यकता है। अगर सोशल मीडिया ज्ञान, सूचना, कौशल और विविधतामूलक चेतना उत्पन्न कर व्यक्तित्व विकास को नए अर्थ देता है, तब भारत का युवा विकास के प्रारूप में समूचे विश्व के लिए धरोहर बन जाता है।

अगर गहराई में जाएं तो सोशल मीडिया का चरित्र कॉरपोरेटीय है और यह खंडित संस्कृति अविश्वास, हिंसा, भावनात्मक आक्रामकता और केवल विजय को स्थापित करता है। इसने ‘आई मस्ट बी द बेस्ट’ के विचार को सर्वाधिक मजबूती दी है और इसलिए ‘बेस्ट आउट आॅफ द क्वालीफाइड’ का संदेश बाजार में एक ऐसी गला-काट प्रतियोगिता उत्पन्न कर चुका है, जिसमें कुछ की तो जीत है, लेकिन एक बहुत बड़े हिस्से की हार है। हारा हुआ युवा एक दृष्टि में सामाजिक बहिष्कार को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में महसूस करता है और यही वह स्तर है जहां बिखराव होता है। क्या हमारे पास इस बिखराव को रोकने के लिए कोई विकल्प है? यानी क्या हम वैकल्पिक सोशल मीडिया की संभावना उस रूप में देख सकते हैं जो एक दौर विशेष में वैकल्पिक सिनेमा और वैकल्पिक साहित्य के रूप में उत्पन्न हुआ था और जिसने वैचारिक सहभागिता के क्षेत्र में इन संभावनाओं को जन्म दिया था, जिन्हें हम आज भी सामाजिक क्रांतियों के रूप में स्वीकार करते हैं?

(ज्योति सिडाना)

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