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संबोधन के शब्द

दस-पंद्रह साल पहले दिल्ली जैसे महानगरों में सार्वजनिक स्थानों पर बहनजी, माताजी, दीदी या ज्यादा से ज्यादा आंटी जैसे शब्द दिन में आसानी से सुनाई पड़ जाते थे।
Author October 2, 2015 10:47 am

दस-पंद्रह साल पहले दिल्ली जैसे महानगरों में सार्वजनिक स्थानों पर बहनजी, माताजी, दीदी या ज्यादा से ज्यादा आंटी जैसे शब्द दिन में आसानी से सुनाई पड़ जाते थे। अब इनका टोटा पड़ता जा रहा है। महानगरों की बात छोड़िए, मध्यवर्गीय शहरों में भी अब ये शब्द कम ही सुनाई पड़ते हैं। दरअसल, ‘मैडम’ नाम का एक शब्द इन देशज शब्दों को लगातार हजम कर रहा है। ‘मैडम’ संबोधन ने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सारे देश में देखते-देखते अपने पर फैला कर अखिल भारतीय पहचान बना ली है।

पहले उम्र के लिहाज से अनजान महिला को बहन, बेटी या माताजी, संबोधित किया जाना आम था। बोलचाल में आहिस्ता-आहिस्ता आंटी ने प्रवेश किया और फिर मैडम ने सब पर आधिपत्य जमा लिया। मैडम शब्द किसी महिला के लिए प्रयोग किया जा सकता है। उम्र से उसका कोई ताल्लुक नहीं होता। लेकिन यह शब्द अचानक इतना लोकप्रिय कैसे हो गया, जबकि रिश्तों को संबोधित करने के लिए अलग-अलग देशज शब्दों का भरपूर खजाना हो!

अखबारों ने भी मैडम को अपना लिया है और यह शब्द धड़ल्ले से छप रहा है। याद पड़ता है कि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में निजी नर्सरी स्कूलों की नर्सरी जितनी तेजी से बढ़ी, उतनी तेजी से उसमें पढ़ाने वाली महिला शिक्षकों के लिए पहले मैडम और बाद में ‘मैम’ का प्रयोग बढ़ा। गांवों में सरकारी स्कूलों में महिला शिक्षक को अध्यापिका कहा जाता था। नर्सरी स्कूलों ने अध्यापिका को मैडम बना दिया। मूल रूप से फ्रेंच का ‘मदाम’ शब्द अंग्रेजी (ब्रिटेन) में मैडम हो गया। देश में धीरे-धीरे अमेरिका का प्रभाव बढ़ा, जिसके कारण स्कूलों में अब मैडम के स्थान पर मैम बोला जाने लगा, क्योंकि अमेरिका में मैम बुलाते हैं।

नर्सरी के फलक से निकल कर मैडम शब्द को एक सार्वजनिक तौर पर राष्ट्रीय पहचान भी मिली है, जिसे यह पहचान दिलाने में नेहरू परिवार का काफी बड़ा योगदान है। कांग्रेसी कभी अपनी नेता इंदिरा गांधी को मैडम कह कर संबोधित करते थे। यही संबोधन अखबारों में भी छपता था। तब सूचना की उतनी क्रांति भी नहीं थी। अब डेढ़ दशक से ज्यादा समय से सोनिया गांधी कांग्रेस की सर्वेसर्वा हैं, उनकी पार्टी या समूचा मीडिया जगत भी किसी खबर पर ‘मैडम-मैडम’ का दम भरता है। मीडिया ने औसत कांग्रेसियों की तरह सोनिया के लिए मैडम शब्द का बखान इतना ज्यादा किया कि यह शब्द गांव, गली-मुहल्लों तक पहुंच गया, जहां उसकी ताकत के आगे बहनजी, माताजी, दादीजी जैसे शब्द फीके पड़ चुके हैं। अब अनुभव में भी आने लगा है कि किसी को बहनजी या आंटी नाम से संबोधित करने पर बुरा लगता है, लेकिन मैडम सुन कर चेहरा खिल जाता है। मैडम का सार्वजनिक वजन दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। ऐसा लगता है कि उदारीकरण का प्रतीक यह शब्द देशज संबोधनों को समाप्त करके ही दम लेगा।

लेकिन अखिल भारतीय राजनीति के पटल पर ऐसा भी नहीं है कि सभी महिला नेताओं को मैडम ही कहा जाए। कांग्रेस से इतर अन्य पार्टियों में भी कई ताकतवर महिला नेता राजनीति में दशकों से जमी हैं। लेकिन क्षेत्र के हिसाब से उनका अलग-अलग देशज संबोधन है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी को बिना किसी तकल्लुफ के राष्ट्रीय फलक पर ‘दीदी’ के संबोधन से पुकारा जाता है। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक की प्रमुख जे जयललिता को ‘अम्मा’ के नाम से जाना जाता है। दरअसल, वहां बच्चियों को इसी संबोधन से पुकारा जाता है। उनके दिल्ली आने की खबर बनती है कि ‘अम्मा पहुंचीं दिल्ली!’ बसपा सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ‘बहनजी’ के नाम से जानी जाती हैं। राजनीति में ‘बहनजी’ का मतलब है मायावती।

रेल के सफर में समय काटने के लिए राजनीति पर बहस एक सशक्त माध्यम है। उत्तर प्रदेश से गुजरते हुए ऐसी चर्चा में लोग बार-बार ‘दीदी’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे। नए यात्री बहस में शरीक हुए और दीदी शब्द सुन कर उन्होंने कहा कि आप लोग क्या मायावती की बात कर रहे हैं, तो उनको जवाब मिला कि मायावती बहनजी हैं, दीदी नहीं। उनकी राजनीतिक समझ पर सब हंसने लगे। उन्हें बताया गया कि राजनीति की दुनिया में दीदी का मतलब उमा भारती या ममता बनर्जी होता है, बहनजी नहीं। हालांकि बहनजी और दीदी के अर्थ में कोई अंतर नहीं, बस कोई दीदी के नाम से प्रचलित हो गया और किसी के नाम पर बहनजी के नाम की मुहर लग गई। नई पीढ़ी की महिला नेता भी मैडम सुनना ज्यादा पसंद करती हैं, भले ही वह किसी पार्टी की हो। इस मायने में कांग्रेस ने मैडम शब्द का विस्तारीकरण किया है, इससे शायद ही कोई इनकार करे।
राजेश कटियार
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