April 23, 2017

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उम्मीदों के चिराग

यह दूरदराज के किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके की बात नहीं है। यह सब हमारे देश की राजधानी दिल्ली में ही हुआ था।

Author March 9, 2017 04:11 am
अफसोस की बात तो यह है कि जिन गांवों को हम बुजुर्गों के सम्मान और उनका खयाल रखने के तौर पर जानते रहे हैं, वहां भी अब बुढ़ापे को सहारा नहीं मिलता।

मेरे घर के पास एक परिवार रहता है। चार साल पहले उनके बेटे का विवाह हुआ। दो साल बाद बहू ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया तो आसपास के लोगों में यह बात चर्चा का विषय बनी। खासतौर पर खाली वक्त में औरतें उस परिवार और उस लड़की के भाग्य से ईर्ष्या करने वाली बातें करतीं। उनमें से कुछ के यह कहने का लहजा अजीब होता था- ‘भई एक ही बार में दो-दो बेटे! अब दूसरी बार न तो बच्चा पैदा करने का दर्द झेलना है, न इस बात की चिंता करनी है कि लड़कियां हैं, कैसे पलेंगी! अब किस बात की चिंता! जीवन भर राजरानी बन कर राज करेगी!’
दो पोतों का एक साथ जन्म होने पर दादा-दादी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी खुशी को जाहिर करने के लिए उन्होंने बड़ी दावत का आयोजन किया। सैकड़ों मेहमानों को सपरिवार इस खुशी में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया। खूब नाच-गाना हुआ। तेज बजते डीजे पर लोग, खासतौर से युवा वर्ग के लड़के-लड़कियां देर रात तक खूब नाचे-गाए। जितने मेहमान, उतने ही उपहार। इसलिए उपहारों के ढेर से कई मेजें भर गर्इं।

लेकिन इस बीच एक दिलचस्प बात यह हुई कि इस खुशी को कोई नजर न लगा दे, इसके लिए जुड़वां बच्चों को आमतौर पर लोगों की नजरों से दूर भी रखा गया। यों सार्वजनिक रूप से तो नहीं किया, लेकिन ‘नजर लगने’ की आशंका को दूर करने के लिए हो सकता है कि कुछ टोने-टोटके भी किए गए हों। बाद में जब कभी वे बच्चे दिखते, तो उनके माथे पर काजल के बड़े-बड़े नजरौटे लगे रहते। यह दूरदराज के किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके की बात नहीं है। यह सब हमारे देश की राजधानी दिल्ली में ही हुआ था। दिखने में कोई शहर भले चकाचौंध से भरी आधुनिकता से सराबोर दिखता हो, टोने-टोटके को मानने या अंधविश्वासों के मामले में अपने देश के किसी कस्बे, गांव और महानगरों की सोच में आमतौर पर कोई अंतर दिखाई नहीं देता। कुछ साल पहले एक दूसरी घटना मेरे एक रिश्तेदार के घर में हुई थी। वह परिवार एक छोटे शहर में रहता है। उसे आर्थिक रूप से काफी संपन्न माना जा सकता है। उस परिवार की बहू ने एक के बाद एक दो लड़कियों को जन्म दिया था। पहली लड़की के जन्म पर तो सबने यह कह-कह कर मन को समझा लिया था कि आजकल लड़के-लड़कियों में क्या फर्क है… लड़कियां तो लड़कों की बराबरी कर रही हैं।

बल्कि लड़की के जन्म पर मोहल्ले और पड़ोस को दावत भी दी गई थी। ‘घर में लक्ष्मी के शुभ कदम पड़े हैं’, यह कह कर मन को भी समझाया गया। लेकिन दो साल बाद जब दूसरी बेटी पैदा हुई, तो जिस तरह घर वालों के मुंह लटक गए उससे पता चला कि पहली बेटी होने के समय जो खुशी दिखी थी, उसकी हकीकत क्या थी। हालांकि बहू से किसी ने कुछ नहीं कहा, मगर परिवार में एक नए सदस्य के आगमन की खुशी किसी को नहीं हुई। यह सच है कि समाज में अब भी दो बेटों की मां को बहुत आदर से देखा जाता है। वहीं दो बेटियों की मां को चाहे-अनचाहे दूसरों की दया और सहानुभूति का पात्र बनना पड़ता है। उन्हें ‘हाय बेचारी’ जैसी बातें अक्सर सुननी पड़ती हैं। ऐसा लगता है जैसे उस महिला को दूसरी बेटी न हुई, उससे कोई अपराध हो गया हो। परिवार के लोग सोचते हैं कि बेटों का मतलब है कि उनका भविष्य उज्ज्वल है। उनकी देखभाल करने के लिए बेटे मौजूद हैं। दूसरी ओर, लड़कियों का अपने वृद्ध माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार शायद ही कभी देखने में आता है। सेवा करने के मामले में बेटियां क्या हैं, उनके बारे में माता-पिता से ही जाना जा सकता है। ज्यादातर बेटियां शादी के बाद अपनी ससुराल चले जाने के बाद भी अपने माता-पिता को लेकर फिक्रमंद रहती हैं।

सच यह है कि आज के दौर में बेटों से जिस सेवा की उम्मीद लोग बुढ़ापे में करते हैं, वह लगातार कम होती जा रही है। कई-कई बेटों के बावजूद माता-पिता को बुढ़ापा अकेले या अपने भरोसे ही काटना पड़ता है। या फिर कई बार उन्हें घर से भी निकाल दिया जाता है। बहुत से बेटे तो माता-पिता को इतना सताते हैं कि उन्हें किसी और के घर में या फिर वृद्धाश्रम जैसी जगह पर शरण लेनी पड़ती है। कई बुजुर्ग किसी तीर्थ स्थान या किसी अपरिचित जगह पर घर छोड़ कर निकलते पड़ते हैं। कस्बों से लेकर महानगरों तक में बढ़ते वृद्धाश्रम इस बात के गवाह हैं कि बूढ़े और अशक्त लोगों को कोई नहीं चाहता। अफसोस की बात तो यह है कि जिन गांवों को हम बुजुर्गों के सम्मान और उनका खयाल रखने के तौर पर जानते रहे हैं, वहां भी अब बुढ़ापे को सहारा नहीं मिलता।

क्षमा शर्मा

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First Published on March 9, 2017 4:11 am

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