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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में ज्योति सिडाना का लेख : विश्वास बनाम विवेक

धर्म सामाजिक नियंत्रण के एक साधन के रूप में उभरा, ताकि समाज में विचलन की स्थिति पैदा होने से रोकी जा सके और लोगों को संतुलित व्यवहार करने के लिए बाध्य किया जा सके।
Author नई दिल्ली | July 7, 2016 00:28 am
”सरस्‍वती देवी, समाज लड़कियों को पीछे धकेलना चाहता है लेकिन उन्‍हें आगे बढ़ने दो। हर दिन के साथ उन्‍हें और चमकने दो। ”

धर्म सामाजिक नियंत्रण के एक साधन के रूप में उभरा, ताकि समाज में विचलन की स्थिति पैदा होने से रोकी जा सके और लोगों को संतुलित व्यवहार करने के लिए बाध्य किया जा सके। समाजशास्त्रीय दृष्टि से धर्म के दो अर्थों की चर्चा की जाती है। पहला, ईश्वर के प्रति आस्था और दूसरा, मानव/ समाज/ देश के प्रति कर्तव्य का निर्वाह। दोनों ही अर्थों में हिंसा, घृणा, क्रोध, आक्रामकता या ईर्ष्या का भाव नजर नहीं आता। बल्कि धर्म का उद्देश्य एक संतुलित, समानतामूलक और ‘बेहतर समाज’ की स्थापना करना है।

लेकिन मीडिया निर्देशित समाज में मानो धर्म का स्थान मीडिया ने ले लिया है। अब मीडिया मानव व्यवहार को निर्देशित और उसे अपने लाभ के लिए नियंत्रित करता है। मीडिया, बाजार और उपभोक्ता समाज के गठजोड़ ने धर्म को नया आकार देना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, टीवी पर दिखाए जाने वाले विभिन्न धारावाहिकों में आत्मा, जादू-टोना, अंधविश्वास और रूढ़ियों को उजागर करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर प्रहार का प्रयास करना, ताकि लोगों में ‘भय का मनोविज्ञान’ उत्पन्न किया जा सके और धर्म संबंधी वस्तुओं के बाजार को स्थापित किया जा सके। आज जिसे हम सूचना या प्रौद्योगिकी के युग की संज्ञा देते हैं, जिसके कारण दुनिया छोटी हो गई है, जहां सब कुछ अंगुली के एक क्लिक पर हाजिर हो जाता है, वहां धर्म के बाजार की स्थापना से वैज्ञानिक दृष्टिकोण को एक चुनौती मिली है। अंधविश्वास से विज्ञान के चरण की तरफ और फिर विज्ञान से अंधविश्वास की तरफ क्या यह चक्रीय परिवर्तन है? या फिर बाजारवाद ने इसे मीडिया की सहायता से लाभ कमाने के लिए पैदा किया है? यह कैसा विरोधाभास है, जिसने तर्क और अतर्क की एक साथ उपस्थिति को संभव बनाया है?

अगस्त कोंत ने समाज के विकास के तीन चरणों की चर्चा की थी- (1) अंधविश्वास के चरण, (2) तत्त्वशास्त्रीय चरण और (3) वैज्ञानिक चरण। यानी समाज अंधविश्वासों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तरफ अग्रसर हुआ। इसलिए अतर्क से तर्क की तरफ हुए परिवर्तन में दोनों की एक साथ उपस्थिति असंभव थी, क्योंकि दोनों एक दूसरे का निषेध हैं। लेकिन आज समाज में दोनों की एक साथ उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। शायद यही उत्तर-आधुनिकतावाद/ उत्तर-उद्योगवाद/ उत्तर पूंजीवाद की विशेषता है।

विरोधाभास यह भी है कि परिवार में धर्म के निर्वाह का सर्वाधिक या शत-प्रतिशत दायित्व महिलाओं पर ही होता है। परिवार को बुरी नजर से बचाने के लिए, पति और बच्चों के स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए, घर में सुख-शांति बनाए रखने के लिए पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, सत्संग, साधु-संतों की सेवा करना आमतौर पर केवल महिलाओं का ही ‘दायित्व’ है! दूसरी तरफ वही महिला हर माह के कुछ दिन के लिए अपवित्र घोषित की जाकर किसी भी धार्मिक कृत्य से अलग कर दी जाती है या ‘अछूत’ मान ली जाती है।

प्रकृति की पूजा करना धर्म है, क्योंकि वह पवित्र वस्तु है तो फिर महिला को प्रकृति द्वारा दिया गया ‘मासिक धर्म’ कैसे अपवित्र हो सकता है? ये ऐसे विरोधाभास हैं जिनके पीछे के तर्क अतर्क नजर आते हैं। दरअसल, हम आधुनिक तो बनना चाहते हैं, लेकिन पारंपरिकता को भी नहीं छोड़ना चाहते, क्योंकि ‘भय का मनोविज्ञान’ हमें ऐसा नहीं करने देता। अगर हम ऐसा करेंगे तो अनिष्ट की आशंका का भय हमें घेर लेता है, जिसका सामना करने के लिए हम तैयार नहीं होते। हमारे इसी भय को बाजार भुनाता है और लाभ कमाता है। वह हमें आश्वासन देता है कि अगर हम फेंगशुई या वास्तुशास्त्र का ध्यान रखेंगे तो विपत्ति नहीं आएगी। ईश्वर या ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए उनके बताए उपायों का पालन करेंगे तो अनिष्ट नहीं होगा, विभिन्न किस्म के जाप, पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा देना और रंग बिरंगे रत्न या मोती पहनना कथित अनिष्टकारी शक्तियों से बचने का उपाय है!

काश ऐसा हो पाता तो दुनिया की सारी समस्याएं ही समाप्त हो जातीं! परिवार नहीं टूटते, अपराध नहीं होते, युद्ध नहीं होते, आत्महत्याएं, गरीबी और बेरोजगारी नहीं होती, सांप्रदायिक दंगे नहीं होते। बस चारों ओर शांति और खुशहाली होती। एक ओर, सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई क्रांति ने विकास के असंख्य रास्ते खोल दिए जिसकी मदद से इंसान भगवान और प्रकृति को भी चुनौती देता नजर आता है और प्रकृति द्वारा उत्पन्न आपदाओं को खुद द्वारा निर्मित प्रौद्योगिकी से नियंत्रित करने का दावा करता है। दूसरी तरफ, खुद मनुष्य के द्वारा उत्पन्न समस्याओं (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक) को नियंत्रित करने के लिए तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास का सहारा लेता है, क्यों?

क्या यही उत्तर-आधुनिकतावाद है जहां वैज्ञानिक प्रगति भी अपने चरम पर है और अंधविश्वास भी? यह एक ऐसा दोराहा है जहां ‘भय का मनोविज्ञान’ व्यक्ति को अनिर्णय की स्थिति में पहुंचा देता है और वह आक्रामक, कुंठित, निराश, हिंसक प्रवृत्ति को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेता है। परिणामस्वरूप ‘विश्वास का संकट’ उत्पन्न हुआ, जिसने मनुष्य के सामने असुरक्षा का विस्तार किया है और भय के मनोविज्ञान को तीव्र किया है। यानी चारों तरफ केवल डर का विस्तार हुआ है। इन सभी पक्षों पर गहन चिंतन की जरूरत है, ताकि हम एक सभ्य और विकसित समाज की अवधारणा को मूर्त रूप दे सकें।

(ज्योति सिडाना)

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