ताज़ा खबर
 

जनतंत्र के सामने

राष्ट्रवाद की भूमिका में खुद का वैचारिक परिचय आरंभ करना समकालीन भारत की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ वर्षों में जिस तरह से एक वैचारिक असहिष्णु व्यवस्था की स्थापना हुई है
Author नई दिल्ली | March 1, 2016 01:15 am
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर पुलिस का पहरा।

भारत में विचारधारा के विकास का इतिहास बहुत लंबा नहीं है। विचारधारा की वर्गीकृत अवधारणा को हम आधुनिकता से जोड़ कर देखते हैं। अब चूंकि एक मत में ‘आधुनिकता’ उपनिवेशवाद का परिणाम था, इसलिए विचारधारा का भी इतिहास उपनिवेशवाद के समांतर ही चलता है। अगर आप पाठ्य सामग्री से इस तर्क को विश्लेषित करें, तो यह न्यायसंगत दिखेगा। भारतीय चिंतन पर उपलब्ध सामग्री भले ही वेदांतिक परंपरा, चाणक्य, अबुल फजल आदि की चर्चा करें, लेकिन विचारधारा का पाठ हमेशा राममोहन राय से ही आरंभ होगा। यह एक संकेत है कि विचारधारा खुद में एक आधुनिक प्रत्यय है, जिसे मध्यकाल या प्राचीन काल में नहीं खोजा जाना चाहिए।

आधुनिकता ने सबसे पहले हमें ‘राष्ट्रवाद’ की विचारधारा से अवगत करवाया और देखते-देखते यह हमारे संघर्ष का प्रतीक बन गई। 1980 के दशक में हुए राष्ट्रवाद पर विभिन्न लेखन कार्य यूरो-केंद्रित ही हैं। उन्होंने उत्तर-औपनिवेशिक विश्व के लिए राष्ट्रवाद की अवधारणा पर बहुत बल नहीं दिया है। तब यह हमारा काम है कि हम अपने राष्ट्रवाद की परिधि का निर्माण करें और यह ध्यान रखें कि वह संकीर्ण न हो। उसे गांधी, नेहरू और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे लोगों की विरासत का सम्मान करना होगा। शायद इसी मत को ध्यान में रख कर ‘भारत का विचार’ कहलाने वाले प्रत्यय की परिकल्पना की गई है। लेकिन चूंकि राष्ट्रवाद जैसी सांस्कृतिक या आर्थिक प्रक्रिया का राजनीतिकरण होता गया, भारत के विचार निर्माताओं के फेहरिस्त और लंबी होती गई। मंडल के बाद डॉ आंबेडकर को उसमें अब धूमधाम से शामिल कर लिया गया है। कमंडल के लोकतांत्रिक ‘हाइजैक’ के बाद अब सावरकर और गोलवलकर को उसमें संयोजित करने का प्रयत्न हो रहा है। यहां यह चिंता उजागर करना आवश्यक है कि डॉ आंबेडकर जैसे राष्ट्र-निर्माता को सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए इतना क्यों इंतजार करना पड़ा? आप मेरा संकेत समझ गए होंगे।

राष्ट्रवाद की भूमिका में खुद का वैचारिक परिचय आरंभ करना समकालीन भारत की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ वर्षों में जिस तरह से एक वैचारिक असहिष्णु व्यवस्था की स्थापना हुई है, यह आपको स्वतंत्र विचारक होने की अनुमति नहीं देती। जब राष्ट्रवादी होने की होड़ लगी हो, तो दलगत विमर्श आपको विवश करता है कि आप ‘साइड’ लीजिए। या तो हमारी तरफ या उनकी तरफ। बीच का कोई रास्ता नहीं है, और शायद होना भी नहीं चाहिए। यह मेरा मानना नहीं है, विमर्श को अब ऐसे ही परिभाषित किया जाता है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का वर्तमान संकट इसी संदर्भ में अगर देखें, तो पक्ष-विपक्ष दोनों के साथ न्याय संभव है। जो घटित हुआ, वह हमारी लोकतांत्रिक लचरता को देखते हुए निंदनीय है। अभी हमारी लोकतांत्रिक भावना इतनी सशक्त नहीं हुई है कि हम विश्वविद्यालयों को हर तरह के विचार और विरोध की संस्था मान लें। विश्वविद्यालयों से अब भी यही आशा है कि वे राष्ट्र की सांस्कृतिक विषमताओं को आरोग्य करने में अपना योगदान दें। लेकिन जेएनयू हमेशा से इन विषमताओं के मध्य प्रगतिशील चरित्र के साथ उपचार नहीं, संवाद करता रहा है। आज इस संवाद पर आपत्ति हो सकती है। ये क्यों है और किसके कारण है, यह विश्लेषित करना राजनीतिक और बुद्धिजीवी वर्ग का कार्यक्षेत्र है, मेरा नहीं। मैं तो बस एक परा-स्नातक विद्यार्थी होने के नाते अपना पक्ष रख सकता हूं।

परिसर के भीतर मैंने पाया कि खेमे बंट चुके हैं। कोई समर्थन में है, कोई नहीं। या तो आप सहमत हैं, या असहमत। लेकिन विचार की परिधि का निर्माण कुछ लोगों ने ही मिल कर किया है। अगर आप उस लक्ष्मण रेखा को लांघ जाते हैं, तो आपके विचार सुनने के योग्य नहीं माने जाएंगे। अगर आप एक प्रबल वाम से दूर हैं तो आपके भीतर दक्षिणपंथ की संभावना तलाश ली जाएगी। और अगर गलती से आपकी आवाज वाम जैसी आई, तब तो किसी भी और स्वतंत्र अस्मिता की कोई गुंजाइश ही नहीं है। मेरा मानना है कि चारदिवारी के बाहर हम चाहे जितने भी असहनशील हो, परिसर के भीतर हमें बाहर का प्रभाव कम करना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए ‘स्पेस’ रहने देना चाहिए जो प्रबल दो विचारों से अलग, शामिल कोई तीसरा विकल्प खोज रहे हैं। जिन्हें यह स्वतंत्रता हो कि वह बिना किसी ‘अधिकार-कर्तव्य’ के अंतर्विरोध के अपनी बातें रखे और उसे सुना जाए। हममें से कई शायद इतने सचेतन हैं कि हम हर विचार समूह में कुछ खामियां खोज लेते हैं और उनसे पूरी तरह सहमत नहीं हो पाते। लेकिन आज के ‘अंध-युग’ में शायद ऐसे ही लोगों की अधिक आवश्यकता है। हम किसी के ध्वज-वाहक नहीं है, क्योंकि हम नहीं हो सकते। आशा है इतिहास इस घटना को राष्ट्रवाद की बहस से अधिक लोकतंत्र की चेतना पर आम सहमति बनाए जाने के प्रयत्न के रूप में याद करेगा।

(शान कश्यप)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.