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सही रास्ते की तलाश

निर्भया कांड जैसे हिंसा और कू्ररता के तत्त्व हमारे समाज में स्थान बना रहे हैं। क्या कभी हमने सोचा है कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं? क्यों पनप रहे हैं हमारे समाज में ऐसे कीटाणु, जो वातावरण को रोगग्रस्त बना रहे हैं।
Author January 30, 2016 03:14 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

सीमा क्षोत्रीय

निर्भया कांड जैसे हिंसा और कू्ररता के तत्त्व हमारे समाज में स्थान बना रहे हैं। क्या कभी हमने सोचा है कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं? क्यों पनप रहे हैं हमारे समाज में ऐसे कीटाणु, जो वातावरण को रोगग्रस्त बना रहे हैं। आज मानव मूल्यों की किसी को परवाह नहीं, वे पीछे छूटते जा रहे हैं। बालिग और नाबालिग लोगों की ऐसी गैर-जिम्मेदार फौज तैयार हो रही है, जो गलत और असभ्य कामों को अंजाम देने में जरा भी नहीं हिचकती। न जाने क्यों अधर्म धर्म के ऊपर हावी होता जा रहा है? हम ऐसे सामाजिक मूल्य क्यों नहीं रोप पा रहे हैं, जो अमानवीय हरकतों को विराम दें। क्या ऐसी घटनाओं का उन्मूलन अब संभव नहीं रह गया है?

इस समस्या से पार पाने के लिए पहले ऐसे कारणों को जानने के प्रयास करने होंगे, जिनके चलते हमारे बच्चे गलत कामों को अंजाम दे रहे हैं। इसकी तह में जाने पर पता चलता है कि आधुनिक जीवन शैली इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है, जिसने हमारे समाज को एक गलत राह पर चलने को उकसाया है। आज बच्चे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दुनिया में- कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, सिनेमा आदि में व्यस्त रहते हैं। अपने घर में चाहे वे बड़े और छोटे सदस्यों से बात करना पसंद न करते हों, उनके साथ मिलबैठ कर अपने मन की बात कहना जरूरी न समझते हों, पर मोबाइल या इंटरनेट पर चैटिंग उनके जीवन का आवश्यक अंग बन गया है। टीवी उनके जीवन में जैसे रच-बस गया है।

बकि अब यह भी छिपी बात नहीं है कि टीवी उनके लिए गलत चीजें ही परोस रहा है। बच्चे प्रेरणा देने वाले कार्यक्रम देखते नहीं, उन्हें वही कार्यक्रम अधिक आकर्षित करते हैं, जिनमें भोंडे प्रदर्शन हों। बच्चे कच्चे घड़े की तरह हैं, इसलिए वे जैसा बनना या उन्हें हम जैसा बनाना चाहें, बन सकते हैं। कटु सत्य यह भी है कि मौजूदा परिवेश में अच्छे संस्कार देने वाले काम नहीं हो रहे हैं। ऐसे में बच्चे गलत काम जल्दी सीखेंगे ही। अच्छे कामों के लिए अनुशासन और संयम चाहिए, जो आज के तेजी से बदलते समाज में दिखाई नहीं देता और गलत काम सीखने के लिए कुछ ज्यादा करने या सोचने की जरूरत नहीं होती। इसके अलावा आसपास ऐसी सामग्री उपलब्ध है, जिससे बच्चे समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं।

अब सवाल उठता है कि हम ऐसा क्या करें जिससे बच्चे गलत दिशा में चलने से बच सकें? ऐसा समाज तैयार करने की जिम्मेदारी हम पर है, जिसमें गलत काम करने से पहले बच्चे ही क्यों, बड़े भी दस बार सोचें। ऐसी घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है, जिनको सुन कर हमारी रूह कांप जाती है। हमें खुद को और समाज को खंगाल कर बच्चों को एक ऐसा सांस्कृतिक, परिष्कृत माहौल देना होगा, जिसमें बच्चे अपना मानसिक स्तर ऊंचा उठा सकें और सही-गलत, हित-अनहित समझ कर निर्णय कर सकें।

एक उच्च आदर्शों वाला परिष्कृत समाज तैयार करने के लिए अध्यापक वर्ग को सामने आना होगा, क्योंकि वह बच्चों का सर्वांगीण विकास करने में सबसे मददगार साबित हो सकता है। अगर माता-पिता, समाज और अध्यापक सब मिल कर सही मायनों में बीड़ा उठा लें तो निस्संदेह ऐसे बच्चे तैयार हो सकते हैं, जो न केवल समाज को पतन के रास्ते पर चलने से रोक सकते हैं, बल्कि एक सुदृढ़ इमारत का निर्माण कर सकते हैं, जिसकी छत्रछाया में अनगिनत पुष्प रूपी कोमल बच्चे तैयार होंगे, जो कभी गलत काम करने का साहस नहीं कर पाएंगे। इन सुधारों में हमें बच्चों को अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लिए भी प्रेरित करना होगा, क्योंकि वे संस्कार का निर्माण करती हैं।

अध्यापकों को बच्चों को नैतिक मूल्यों का ज्ञान कराना होगा। सही, गलत के बीच अंतर का बोध कराना होगा। अच्छी प्रार्थनाएं सुना कर उन्हें आपसी द्वेष, रंजिश, वैमनस्य जैसी कमियों के गर्त से निकाल कर नेकी के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करना होगा। स्कूलों में प्रार्थना स्थल पर कुछ ऐसी प्रार्थनाएं बार-बार चलानी होंगी, जिनको सुनने और गाने से बच्चों के मस्तिष्क पर अच्छी बातों की अमिट रेखा खिंचती चली जाएगी और वह उन बातों को अपने जीवन मे ढालते जाएंगे।

अगर बचपन में ही अच्छी आदतों का विकास हो जाए तो वह संस्कार जीवन भर मनुष्य को गलत राह पकड़ने ही नहीं देगा। निष्कर्षत: हमें समाज का बहुमुखी विकास करने के लिए अपनी व्यस्तता से हट कर कुछ तो सोचना होगा। आज माता-पिता अपने कामकाज और पैसा कमाने की होड़ में इस कदर व्यस्त होते गए हैं कि उनके पास अपने बच्चों के पास बैठ कर बातें करने, प्रेरणादायी बातें बताने का समय ही नहीं है। इसके लिए उन्हें अपनी दिनचर्या और अपना आचरण बदलना होगा।

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