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किताबों की आभासी दुनिया

यह कठिन समय है। लेखक बढ़ रहे हैं और पाठक कम हो रहे हैं। पुस्तकें समुचित संख्या में छप रही हैं, पर उनके खरीददार कम होते जा रहे हैं।
Author January 29, 2016 03:08 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

वीरेंद्र जैन

यह कठिन समय है। लेखक बढ़ रहे हैं और पाठक कम हो रहे हैं। पुस्तकें समुचित संख्या में छप रही हैं, पर उनके खरीददार कम होते जा रहे हैं। पुस्तक मेलों में भीड़ उमड़ती है, पुस्तकों की प्रदर्शनी को निहारती है, ढेर में रखी पुस्तकों को पलटती है और जाकर चाट-पकौड़ी खाती है, स्वेटर, मफलर, जैकेट खरीदती है, मित्रों-परिचितों से गले मिलती है, सेल्फी लेती-देती और दिन सफल करके लौट आती है। वहां से मिले सूची-पत्र रद्दी के ढेर में रख देती है।

प्रकाशक पुस्तकें इसलिए छाप रहे हैं, क्योंकि वे बिक रही हैं, उन्हें सरकारी पुस्तकालय और शिक्षा विभाग समेत रेल, रक्षा और विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान खरीद रहे हैं। उनकी कीमतें ऊंची रखी जा रही हैं और संबंधित अधिकारियों को खरीद पर भरपूर कमीशन दिया जा रहा है, जो बहुत ऊपर तक पहुंच रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र का यह धन अंतत: जनता की जेब से जा रहा है।

पुस्तक प्रकाशन और इसकी खरीद-बिक्री में प्रकाशक और सरकारी खरीद के लिए जिम्मेदार अधिकारी मालामाल हो रहे हैं। कोई प्रकाशक गरीबी में नहीं जी रहा, सबके पास भव्य बंगले हैं, गाड़ियां हैं, दौलत है, वे अधिकारियों को जो पार्टियां देते हैं उनमें पैसा पानी की तरह बहाते हैं।
कोई देखने वाला नहीं है कि जो पुस्तकें खरीदी गर्इं उनमें से कितनी पढ़ी गर्इं या पढ़े जाने लायक हैं?

किसी को नहीं पता कि उनको खरीदे जाने का आधार क्या है? प्रकाशित पुस्तकों के पांच प्रतिशत लेखकों को भी रायल्टी नहीं मिलती। अधिकतर लेखक इस बात से खुश हो जाते हैं कि प्रकाशक ने कृपा करके उनकी पुस्तक छाप दी है। बहुत बड़ी संख्या में लेखक अपना पैसा लगा कर पुस्तकें छपवाते हैं और सरकारी सप्लाई की दर पर मुद्रित कीमत से अपनी लागत की पुस्तकें खरीद लेते हैं। वे अपना पैसा खर्च करके विमोचन समारोह आयोजित करते हैं, जिसमें प्रकाशक मुख्य अतिथि की तरह मंच पर बैठता है। यही कारण है कि आज ज्यादातर संपन्न और अतिरिक्त आय अर्जित करने वाले वर्ग के लेखक प्रकाशित हो रहे हैं।

लेखक के पैसे से किताब छपती है, उसके ही पैसे से उसके घर पर आती है, और ‘सौजन्य भेंट’ देने के काम आती है। भेंट पाने वाला सौजन्यता में ही दो-चार शब्द प्रशंसा के कह देता है, भले उसने उसे पढ़ी न हो। ऐसी पुस्तकें कम ही पढ़ी जाती हैं। आमतौर पर पुस्तक मेलों में पाक कला, बागबानी, घर का वैद्य या कैरिअर से संबंधित पुस्तकें बिकती हैं। आलोचना पुस्तक का और बुरा हाल है। आलोचक अक्सर पुस्तक की बिना पढ़े प्रशंसा कर देते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तक आलोचना के नाम पर जो कुछ छपता है, वह प्रकाशन की सूचना और फ्लैप पर लिखी टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं होता। कथित आलोचक उसमें दो-चार पंक्तियां और एकाध उद्धरण जोड़ कर उसे समीक्षा की तरह प्रकाशित करा देता है। ऐसा आलोचना कर्म कोई भी कर देता है।

आलोचक को कम से कम विषय और विधा की परंपरा और समकालीन लेखन का विस्तृत अध्यन होना चाहिए, जिसे वह दूसरी भाषाओं के साहित्य के साथ तुलना कर के परखता है। उसके सामाजिक प्रभाव के बारे में अपने विचार व्यक्त करता और पुस्तक की उपयोगिता या निरर्थकता को बताता है। इससे न केवल कृति को समझने में मदद मिलती है, बल्कि विधा के समकालीन लेखन और प्रवृत्तियों की जानकारी भी मिलती है। एक अच्छी पुस्तक समीक्षा अनेक दूसरी पुस्तकों को पढ़ने के प्रति जिज्ञासा पैदा कर सकती है।

पुस्तक प्रकाशन से लेकर पुस्तक मेले तक छद्म फैला हुआ है। प्रकाशक, लागत लगाने वाले और सरकारी खरीद में मदद कर सकने वाले महात्त्वाकांक्षी व्यक्ति को लेखक के रूप में अधिक प्रतिष्ठित करना चाहते हैं और ऐसे ही लोगों को छापना चाहते हैं। दूसरी ओर उनकी कृतियों को पाठक पढ़ना नहीं चाहते, खरीदना नहीं चाहते। कैसी विडंबना है कि बहुत सारे पुरस्कृत और सम्मानित लेखकों के प्रशंसक और पाठक नहीं के बराबर हैं। सामान्य पाठक के लिए ऐसा लेखन कौतुकपूर्ण वस्तु बन चुका है।

सरकारी पुरस्कारों से वह भ्रमित रहता है कि जरूर इस कृति में कुछ महत्त्वपूर्ण होगा, जो उसकी समझ में नहीं आ रहा, जबकि उसमें कुछ होता ही नहीं है। कम प्रतिभा वाले लेखक समूहों ने अपनी-अपनी संस्थाएं बना ली हैं, जिनके माध्यम से वे खुद पुस्तकें प्रकाशित करके एक-दूसरे को आभासी पुरस्कार लेते-देते रहते हैं। सच तो यह है कि लेखन की दुनिया में गहरी बेचैनी, निराशा, ईर्ष्या, कुंठा, शोषण, धूर्तता छाई हुई है। सृजन का संतोष या आनंद कहीं दिखाई नहीं देता।

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