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यादों के शहर

वर्षा हर वह शहर जिससे होकर हम कभी गुजरते हैं, जहां कुछ पल ठहरते हैं, वहां की सड़कें, बाजार, इमारतें देखते हैं, उससे एक नाता-सा बना लेते हैं। हमारी स्मृतियों के जंगल में उस शहर के लिए एक कोना तैयार हो जाता है। कई बार तो रेल यात्रा के दौरान जिन स्टेशनों पर ट्रेन ठहरती […]
Author January 7, 2015 11:51 am

वर्षा

हर वह शहर जिससे होकर हम कभी गुजरते हैं, जहां कुछ पल ठहरते हैं, वहां की सड़कें, बाजार, इमारतें देखते हैं, उससे एक नाता-सा बना लेते हैं। हमारी स्मृतियों के जंगल में उस शहर के लिए एक कोना तैयार हो जाता है। कई बार तो रेल यात्रा के दौरान जिन स्टेशनों पर ट्रेन ठहरती है, वहां पी गई चाय, किसी खास चीज का जायका भी उस जगह का खास अनुभव सहेज देता है। संडीला की रेवड़ी, आगरे का पेठा, मेरठ की गुड़-पट्टी, लखनऊ के कबाब, वाराणसी की जलेबियां, देहरादून के मोमोज, मसूरी का मैगी प्वाइंट, जयपुर के मिर्च वाले पकौड़े, मुंबई का बटाटा वड़ा…! ऐसे तमाम छोटे, मगर कीमती जायके अपने शहर का स्वाद बनाते हैं और उनसे हमारा रिश्ता मजबूत करते हैं। लखनऊ का ‘भूलभुलैया’ जिसने भी बनवाया, लेकिन लखनऊ में रहने वाले हर बाशिंदे का उस पर हक है। जब वह घर से कोसों दूर होता है, अपने शहर को याद करते हुए वहां की गलियों, चौराहों, बाजार में पहुंच जाता है। वहां की ऐतिहासिक इमारतों से अपना नाता जोड़ लेता है। पुराने शहरों के घंटाघर, बारादरी जैसी जगहों के इर्द-गिर्द कितनों की स्मृतियां घूमती हैं। जिन सड़कों पर कितनी सुबह-शामों को आते-जाते, उतरते-डूबते यों ही गुजरते देखा, वे उनकी स्मृतियों की पूंजी में जमा हो जाती हैं। अलग-अलग शहरों के बाजारों की चहल-पहल की गूंज हमारे कानों में कहीं रम जाती है। राजस्थानी बंधेजी साड़ियां, जयपुर की चूड़ियां, कन्नौज का इत्र, फर्रूखाबाद की दालमोठ..! हर शहर अपनी खूबियों-खासियतों के साथ अपनी पहचान बनाते हैं और हमसे रिश्ता जोड़ते हैं।

नदियों के किनारे बसे शहर के लोग तो अपनी नदियों से खास लगाव रखते हैं। उनके मन में उनकी नदी अविरल-निर्मल अपने पूरे विस्तार के साथ बहती है। कोई गंगा की धार से अपने मन को सींचता है तो कोई अपने घर के आसपास बने पोखर-कुएं से ही नमी हासिल करता है। नदी के जल में ढलते सूरज का प्रतिबिंब सालों के लिए हमारे मन में भी ढल जाता है। गोमती के किनारे उगे चटक जंगली फूल की अनुभूति भी नदी के साथ हमारी यादों से जुड़ जाती है। वे पोखर-कुएं और उनके इर्द-गिर्द की घटनाएं कभी हमारा पीछा नहीं छोड़तीं। अपनी नदी, झील या अपने पोखर से दूर बैठे व्यक्ति को कभी अकेले में उसकी तरल ध्वनि याद आती है। मई-जून की किसी बौराई-सी दोपहर में चिहुंकती नदी की तपन से गालों पर गर्म हवा के थपेड़े पड़े होंगे। हम सबकी यादों में ऐसी कई दोपहरें बसी हैं। सूखी पत्तियों के झुंड का चिड़ियों-सा उड़ना हम सबके मन में कहीं बसा है। हमारी स्मृतियों के जंगल की बसावट को जो और करीने से काढ़ता है। किसी शहर से गुजरते हुए उसकी एक खास गंध हमारे भीतर रह जाती है। वहां की इमारतें हमारे खयालों में घर बना लेती हैं। उन सबसे हम अपना एक खास नाता जोड़ लेते हैं। अपने शहर से दूर रहने वाले लोग जब वहां के किस्से सुनाते हैं तो जुबान नहीं रुकती, मीठी यादों का कारवां-सा निकल पड़ता है।

हमारी स्मृतियों के इन शहरों से ठीक उलट नए मिजाज के शहर भी तेजी से बस रहे हैं, जिनसे कोई मजबूत रिश्ता नहीं जुड़ पाता। चौड़ी सड़कों पर भागती बड़ी लंबी गाड़ियों में हम हर वक्त ठिठकते चलते हैं। जैसे हर वक्त हादसों से बच रहे हों। शहरों की ऐसी चिकनी-चौड़ी सड़कों पर कितने साल गुजार कर भी दिल का कोई तार यों नहीं जुड़ता जैसे अपने मोहल्ले की टूटी-फूटी सड़कों से जुड़ जाता था। जिन शहरों का कोई इतिहास नहीं, जिनकी बुनियाद सिर्फ बाजार और फायदे के लिहाज से रखी जा रही हो, उससे दिल का कोई धागा मुश्किल से जुड़ पाता है।

इन तेजमिजाज हाईटेक शहरों में लकदक इमारते हैं, शीशे के महल जैसे मॉल हैं, बडेÞ-बडेÞ वाटर पार्क हैं, लेकिन ये उस बाजार का हिस्सा हैं जहां हम सबसे बड़े उत्पाद, यानी प्रोडक्ट होते हैं। हम वह उत्पाद होते हैं, जिनके लिए कई सारे अन्य उत्पाद बनाए जा रहे हैं। बढ़िया जींस, शर्ट, खुशबूदार साबुन, डियो, परफ्यूम। हमारे खाने-पीने के लिए एक से बढ़ कर एक जायके, मैक्डॉनल्ड का बर्गर, शानदार कॉफी। लेकिन एक खास चीज की कमी होती है। एक खास जायका कहीं छूटता है। कहते हैं हर शहर के पानी का स्वाद भी अलग होता है, उससे बनी चीजों का स्वाद भी अलग। कुछ तो ऐसा है जिसे हम खो रहे हैं। जिसके चलते हम हर वक्त बेचैन रहते हैं। दिन-रात खटते हैं, खूब काम करते हैं, मगर किसी काम के न रहे। ऐसे शहर को अपने जीवन के कई साल देकर भी अजनबी से ही रहे। ऐसा मोहपाश, जिसमें रहा नहीं जाता, छोड़ा भी नहीं जाता। ऐसे शहर जो सिर्फ अजनबी बनाते हैं, अजनबियत को कायम रखते हैं। इन शहरों में रोजगार और तरक्की की उम्मीद लेकर हर साल करोड़ों लोग आते हैं, अजनबी की तरह और अजनबी ही रह जाते हैं।

 

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  1. R
    Rekha Parmar
    Jan 7, 2015 at 1:18 pm
    Visit Website for Latest Gujarati News :www.vishwagujarat/
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    Reply
    सबरंग