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किताब की जगह

विष्णु नागर हम हमेशा पुराने होते रहते हैं और दुनिया हमारे चाहे-अनचाहे नई होती रहती है। इतनी ज्यादा नई कि उसे हर समय नए सिरे से पहचानते रहने की जरूरत होती है और यह काम काफी मुश्किल होता है। अगर हम इससे घबरा कर अतीत में ही बसेरा बसा लेते हैं, वर्तमान का सामना नहीं […]
Author February 17, 2015 11:38 am

विष्णु नागर

हम हमेशा पुराने होते रहते हैं और दुनिया हमारे चाहे-अनचाहे नई होती रहती है। इतनी ज्यादा नई कि उसे हर समय नए सिरे से पहचानते रहने की जरूरत होती है और यह काम काफी मुश्किल होता है। अगर हम इससे घबरा कर अतीत में ही बसेरा बसा लेते हैं, वर्तमान का सामना नहीं करते, रोते-कलपते रहते हैं कि हाय, हमारा वह युग तो कितना प्यारा स्वर्ण युग था, अब हम इस कलयुग में कैसे जीएं तो दुनिया हमें बहुत पीछे छोड़ कर आगे निकल जाती है।

इस अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले से पहले दिल्ली पुस्तक मेले में जब मैंने पहली बार अंगरेजी किताबों को दो सौ रुपए किलो बिकते देखा, तो जाहिर है कि एक झटका-सा लगा। मगर जल्दी ही मेरा लालच मुझ पर हावी हो गया। याद आया कि मुझे अपने पोते के लिए कुछ किताबें अपने साथ ले जानी हैं। तो सोचा कि आलू की तरह पड़ी दो सौ रुपए किलो बिक रही उन किताबों में से उसके काम की हों तो क्यों न कुछ छांट लूं! मैंने अपनी समझ से तीन किताबें छांटीं और तौल करा कर ले लिया। अब पता चला है कि इस तरह से किताबें दिल्ली के दरियागंज के किताब बाजार में बिकती हैं और कुछ मॉलों में भी। यह प्रयोग मुंबई और पुणे में भी हो चुका है। ऐसी किताबें निन्यानवे रुपए किलो तक में बिकती हैं। हिंदी की किताबें डेढ़ सौ रुपए किलो में उपलब्ध हैं। किताबों की यह कीमत महत्त्व के आधार पर नहीं बंटी होती हैं। महंगी और सस्ती सब्जी में तो कई बार गुणवत्ता का अंतर भी रहता है, मगर किताबों के मामले में यह होना संभव नहीं दिखता। एक किताब वाले का कहना है कि किताबों की घटती बिक्री को देख कर उसे बढ़ाने का हमने यह उपाय ढूंढ़ा है। इससे बिक्री काफी बढ़ गई है!

इसे मैं अपने उदाहरण से समझ सकता हूं। मैं खुद भी हिंदी का एक छोटा-मोटा लेखक हूं और इस नाते इससे मुझे विचलित होना चाहिए था कि आज यह सलूक अंगरेजी में प्रकाशित अच्छे-बुरे लेखकों के साथ हो रहा है तो हिंदी के लेखक कब तक इस स्थिति से बच पाएंगे! यह भी हो सकता है कि किसी लेखक की लोकप्रियता का प्रतिमान यह बन जाए कि उसकी किताबें दो सौ रुपए किलो बिकती हैं या डेढ़ सौ रुपए! क्या मैं इस स्थिति से तभी आहत होऊंगा, जब कोई आकर मुझे बताएगा कि किलो के भाव से बिकने वाली किताबों में प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध की पुस्तकें भी हैं, मगर उनकी तरफ कोई झांक नहीं रहा है!

एक प्रकार से किताबों के साथ यह व्यवहार पहले से होता आया है। बल्कि हम खुद करते रहे हैं। पत्र-पत्रिकाओं की रद्दी के साथ कई बार किताबें भी उसी भाव बेची जाती हैं। बरसों पहले किसी अखबार में पढ़ा था कि बच्चनजी जब अपने बेटे अमिताभ के पास रहने के लिए दिल्ली से मुंबई जाने लगे तो उन्होंने दिल्ली के अपने घर की बहुत-सी किताबें रद्दी में बेच दीं। इतना खयाल भी नहीं रखा कि कम से कम उन्हें किसी के द्वारा श्रद्धापूर्वक किए गए लिखित समर्पण का पृष्ठ ही फाड़ डालते, ताकि उस लेखक को यह बाद में पता तो नहीं चलता कि उसकी किताबें बच्चनजी ने रद्दी समझ कर बेच दीं! दरअसल, कोई भी लेखक यह सोच कर लिखता और किताब छपवाता है कि उसने कुछ महत्त्वपूर्ण ही लिखा है। जिन्हें वह अपनी पुस्तक भेंट दे रहा है, वे उसे पढ़ेंगे, सहेज कर भी रखेंगे। मगर इतना प्रसिद्ध लेखक कितनी किताबों को कहां तक संभाल कर रखे और कितना पढ़े! अगर वह इन्हीं किताबों के इर्द-गिर्द रह जाएगा तो अपनी पसंद का कुछ पढ़-लिख नहीं पाएगा।

हालांकि किताबें रद्दी में बेचने का ‘अपराध’ अकेले बच्चनजी ने ही किया हो, ऐसा नहीं है। जब हम किसी की कोई किताब रद्दी के भाव बेच सकते हैं तो जिन किताबों को हम जरूरी समझते हैं, वे हमें रद्दी की तरह तुल कर सब्जी-भाजी की तरह मिल रही हैं, इस पर हमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए! आखिर उन किताबों का अपराध इतना ही तो है कि वे अकल्पनीय ढंग से सस्ती ही नहीं हैं, बल्कि किलो के भाव मिल रही हैं! जब उपभोक्ता सामान बाजार में किताबों को रखने की जगह खा रहा हो तो और होगा भी क्या! जब महंगी अंगरेजी किताबें वेबसाइट पर उपलब्ध हों और युवा पीढ़ी को कंप्यूटर खोल कर या ई-बुक पढ़ना पसंद हो तो भारी-भरकम किताबों के साथ उनके व्यापारी कोई और व्यवहार करेंगे भी कैसे! बल्कि उनका शुक्रिया कि वे पुरानी की जगह ज्यादातर नई किताबें बेच रहे हैं और इस धंधे को उन्होंने अभी सलाम नहीं किया है! और हमारे वे प्रकाशक, जिनके बारे में मशहूर है कि वे रिश्वत देकर अपनी कैसी भी किताब सरकारी खरीद में बेच देते हैं तो किताब के साथ प्रकाशकों का व्यवहार ही कौन-सा सम्मानजनक है!

 

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