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संगत का सिरा

विष्णु नागर हाल ही में तिरुवनंतपुरम में केरल सरकार के पर्यटन विभाग के एक भव्य संगीत समारोह में अमजद अली खां ने सरोद वादन किया अपने बेटे अयान अली के साथ। उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग आए थे। जाहिर है, उनमें ज्यादातर मलयाली संगीतप्रेमी ही थे। इससे कुछ दिन पहले ‘पीके’ फिल्म […]
Author January 31, 2015 16:28 pm

विष्णु नागर

हाल ही में तिरुवनंतपुरम में केरल सरकार के पर्यटन विभाग के एक भव्य संगीत समारोह में अमजद अली खां ने सरोद वादन किया अपने बेटे अयान अली के साथ। उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग आए थे। जाहिर है, उनमें ज्यादातर मलयाली संगीतप्रेमी ही थे। इससे कुछ दिन पहले ‘पीके’ फिल्म के प्रदर्शन के दौरान भी सिनेमाघरों में काफी भीड़ देखी थी। देख कर अच्छा लगता है। मगर अपने पर शर्म भी आती है कि हम दक्षिण की कलाओं और फिल्मों में वैसी दिलचस्पी नहीं लेते हैं। इससे हमारा कलात्मक दिवालियापन ही झलकता है! खैर, वह शाम बहुत अच्छी रही और मेरे खयाल से श्रोता संतुष्ट होकर ही गए। बाकी उनके वादन की बारीकियों में जाने का विश्लेषण करना संगीत के गहरे जानकारों का काम है। अयान ने रागश्री से अच्छी शुरुआत की। बाद में अमजद साहब ने ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ और ‘एकला चलो रे’ की धुन भी पेश की। मेरे दोनों पोते भी अपने तरीके से आनंद उठा रहे थे।

अमजद साहब को सुनते हुए यह खयाल आया कि देश में सांप्रदायिकता का जो नंगा नाच पिछले लगभग दो दशकों से और खासतौर पर पिछले आठ महीनों से चल रहा है, क्या उस पर अमजद साहब ने कभी कुछ सार्वजनिक रूप से कहा है! मुझे ऐसा कुछ याद नहीं आया। मन में सवाल उठा कि यह मैं अमजद साहब को सुनते हुए ही क्यों कर रहा हूं! क्या जब कोई गैर-मुसलमान गायक-वादक जब कुछ सुनाता है तो यही सवाल मेरे मन में पैदा होता है? मैंने खुद को जवाब दिया कि अब तक तो ऐसा नहीं हुआ!
संगीत और कला की दुनिया के लोगों में अभी तक जो बात आमतौर पर मेरे देखने-समझने में आती है, वह यह है कि वे बुनियादी रूप से तो धर्मनिरपेक्ष होते हैं, मगर समाज और राजनीति से जुड़े सवालों पर खामोश रहना ही पसंद करते हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि जो हवा देश में बह रही है, उससे वे अप्रभावित रहते होंगे! अगर हुसेन साहब खतरे की जद में आ सकते हैं और उन्हें कू-ए-यार में दो गज जमीन भी नहीं मिल सकती है तो फिर कौन! कोई कितना ही बड़ा कलाकार हो, हुसेन साहब से भी बड़ा, तो वह कब तक बचा रहेगा, कहना मुश्किल है। शायद साहित्येतर कलाओं से जुड़े कलाकार सत्ता को नाराज नहीं करना चाहते, क्योंकि उनका साबका आज के राजा-महाराजाओं से पड़ता है, जिनके बिना उनका काम नहीं चल सकता और जिन्हें नाराज करके वे कला के ऊंचे सिंहासन पर नहीं बैठे रह सकते। अमजद साहब ने विश्व शांति के पक्ष में बोलते हुए इस कार्यक्रम में ‘वैष्णव जन’ और ‘एकला चलो रे’ की धुनें सुना कर संकेत में ही सही, अपनी बेचैनी प्रकट कर दी!

लेकिन अगले दिन अंगरेजी के एक राष्ट्रीय दैनिक के स्थानीय संस्करण में उनके लंबे-चौड़े इंटरव्यू के कुछ अंशों ने हताश किया और लगा कि शायद उनके भीतर या तो कोई बेचैनी नहीं है या उसे प्रकट करने से न केवल उन जैसे लोग घबराते होंगे, बल्कि वे प्रत्यक्ष रूप से ऐसा कुछ कहना नहीं चाहते, जिससे यह समझे जाने का भ्रम हो कि वे नई सत्ता से दूरी बना कर रखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि वे फलां तारीख को मोदीजी से मिले हैं। हालांकि एक कलाकार को किसी प्रधानमंत्री से मिलने के लिए इतना बेचैन क्यों होना चाहिए? लेकिन चलिए, मिले तो कोई अपराध नहीं किया! आखिर मोदीजी देश के प्रधानमंत्री हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय की किसी समिति में शामिल होने की इच्छा को उन्होंने सार्वजनिक रूप से प्रकट किया, इसे भी छोड़ें। (उनकी यह शिकायत है कि उनके गृहराज्य मध्यप्रदेश की सरकार उनकी उपेक्षा कर रही है)। मगर इसके बाद जो उन्होंने कहा, वह परेशान करने वाला था कि मैंने टीवी पर मोदीजी को नगाड़े बजाते देखा है और मेरी इच्छा है कि मैं एक दिन उनके साथ संगत करूं!

मोदीजी निस्संदेह अपना राजनीतिक नगाड़ा बहुत अच्छा बजाते हैं। बल्कि वे इस समय के सबसे अच्छे ‘कलाकारों’ में हैं, यह मानने में गुरेज क्यों हो। मगर मोदीजी वाकई नगाड़ा इतना अच्छा बजाते हैं कि अमजद साहब जैसा कलाकार उनके साथ संगत करने की इच्छा प्रकट करे, यह कहना क्या अति नहीं है! मेरा खयाल है कि मोदीजी की कोटि के ऐसे कलाकार तो भारत में लाखों में नहीं तो हजारों में जरूर होंगे। क्या अमजद साहब उन सबके साथ भी संगत करना चाहेंगे! शायद नहीं, क्योंकि वे मोदीजी नहीं हैं!

 

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