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सांध्य वेला में

शिव कुमार शर्मा न्यायमूर्ति एमसी छागला ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘रोजेज इन दिसंबर’ इस चिंतन के बाद दिया है कि दिसंबर वर्ष का अंतिम माह होता है और आयु के अंतिम माह में गुलाबों का स्मरण ही आत्मकथा की विषयवस्तु हो सकती है। मैंने एकाग्रता के साथ यह पुस्तक पढ़ी और आत्मकथा का यह
Author February 9, 2015 16:26 pm

शिव कुमार शर्मा

न्यायमूर्ति एमसी छागला ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘रोजेज इन दिसंबर’ इस चिंतन के बाद दिया है कि दिसंबर वर्ष का अंतिम माह होता है और आयु के अंतिम माह में गुलाबों का स्मरण ही आत्मकथा की विषयवस्तु हो सकती है। मैंने एकाग्रता के साथ यह पुस्तक पढ़ी और आत्मकथा का यह शीर्षक मुझे सार्थक लगा। जीवनपर्यंत सक्रिय रहे व्यक्ति को एक बिंदु पर आकर निष्क्रियता का बोध करा दिया जाता है और वह बिंदु होता है व्यक्ति की सेवानिवृत्ति तिथि। परोक्ष रूप से उससे कह दिया जाता है कि अब आप वृद्ध हो गए हैं और सेवा करने योग्य नहीं रहे। बड़े से बड़ा बल्ब प्लग निकालने के बाद अनुपयोगी हो जाता है। बल्ब का महत्त्व तभी तक होता है जब तक वह ‘पावर’ से जुड़ा रहता है।

आयु के सांध्यकाल में व्यक्ति निराश हो जाते हैं और अधिकतर तो मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगते हैं। मेरे विनम्र मत में निराशा का यह भाव उचित नहीं है। सही है कि सांध्यकाल में आकाश की पश्चिमी दिशा में लालिमा फैल जाती है, लेकिन जब भोर होता है तब पूर्वी दिशा में भी इसी प्रकार की लालिमा बिखरी रहती है। यह तो हमारे सोच पर निर्भर है कि हम निराश रहें या निराशा में भी आशा की किरण ढूंढ़ने का प्रयास करें। यह सर्वमान्य सार्वभौमिक सिद्धांत है कि जिसने जन्म लिया है, उसे मरना है। लेकिन जब तक जीवित रहें, तब तक जीवन के उत्साह को कम क्यों होने दें! पूरे जीवट के साथ कर्मशील क्यों न रहें!

जीवन के सांध्यकाल में व्यक्ति को बाज से प्रेरणा लेनी चाहिए। बाज की आयु सत्तर वर्ष होती है। जब वह चालीस वर्ष का होता है तब उसकी देह के तीन प्रमुख अंग दुर्बल होने लगते हैं। पंजे लंबे और लचीले हो जाते हैं और शिकार पर पकड़ बनाने योग्य नहीं रहते। चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन ग्रहण करने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है। पंख भारी हो जाते हैं और पूरे खुल नहीं पाते, इस कारण उड़ान सीमित कर देते हैं। उस अवस्था में बाज न तो भोजन ढूंढ़ सकता है, न भोजन पर पकड़ बना सकता है और न भोजन ग्रहण कर सकता है। तब उसके पास तीन विकल्प रह जाते हैं। या तो वह अपनी देह का उत्सर्ग कर दे या अपनी प्रवृत्ति छोड़ कर गिद्ध की भांति त्यक्त भोजन पर जीवन निर्वाह करे या खुद को पुनर्स्थापित करके आकाश में निर्द्वंद्व एकाधिपति के रूप में विचरण करे। खुद को पुनर्स्थापित करने वाला विकल्प हालांकि लंबा और पीड़ादायी होता है, फिर भी बाज उस पीड़ादायी विकल्प को ही चुनता है। वह किसी ऊंचे पहाड़ पर जाता है, एकांत में अपना घोंसला बनाता है और तब प्रारंभ करता है पुनर्स्थापन की प्रक्रिया।

सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार-मार कर तोड़ देता है। पक्षीराज के लिए अपनी चोंच तोड़ना अत्यधिक पीड़ादायक होता है, फिर भी वह पीड़ा को वहन करता है और प्रतीक्षा करता है चोंच के फिर उग आने की। वह अपने पंजे को भी उसी प्रकार तोड़ कर उनके उग आने का इंतजार करता है। चोंच और पंजे उग आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है और नए पंखों के उग आने की प्रतीक्षा करता है। डेढ़ सौ दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद बाज को मिलती है पहले जैसी भव्य और ऊंची उड़ान। इस पुनर्स्थापना के बाद बाज तीस वर्ष और जीता है उसी ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

क्या जीवन के सांध्यकाल में हम बाज से सीख नहीं ले सकते? प्रकृति हमारे सामने बाज का दृष्टांत प्रकट करती है। पंजे पकड़ के प्रतीक हैं, पंख सक्रियता के। पंख कल्पना को स्थापित करते हैं। वृद्धावस्था में भी परिस्थितियों पर नियंत्रण बनाए रखा जा सकता है, सक्रिय रह कर अस्तित्व को गरिमामय बनाया जा सकता है और जीवन में कुछ नयापन बनाए रखने की कल्पना की जा सकती है। जीवन की संध्या में हमारे पास भी कुछ विकल्प होते हैं। कुछ सरल, कुछ त्वरित, कुछ पीड़ादायी। क्या वृद्धावस्था में भी हम बाज के पंजों की तरह परिस्थितियों पर नियंत्रण नहीं रख सकते? क्या आलस्य उत्पन्न करने वाली मानसिकता को त्याग कर बाज की चोंच की तरह उर्जस्वित सक्रियता नहीं दिखा सकते? क्या हम भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर बाज के पंखों की तरह कल्पना की उन्मुक्त उड़ान नहीं भर सकते?
मेरा देश के वरिष्ठ नागरिकों से अनुरोध है कि बाज की तरह डेढ़ सौ दिन न सही, खुद को पुनर्स्थापित करने के लिए एक माह का ही समय दें। जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोचने में पीड़ा तो होगी, लेकिन इसके बाद चिंतन को जो ऊर्जा मिलेगी उससे जीवन की उड़ान और ऊंची होगी।

 

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