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मोबाइल के साथ

विष्णु नागर पहले सिर्फ (अचलित) फोन होता था और उसे हासिल करने में पसीने छूट जाते थे। कई तरह की तिकड़में लगानी पड़ती थीं, तब कहीं फोन मिलता था। उसकी खुशी हम अपनों से साझा करते थे। एक बड़े हिंदी अखबार का संवाददाता और सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त पत्रकार होने के बावजूद अगर मेरी सिफारिश एक […]
Author March 10, 2015 16:39 pm

विष्णु नागर

पहले सिर्फ (अचलित) फोन होता था और उसे हासिल करने में पसीने छूट जाते थे। कई तरह की तिकड़में लगानी पड़ती थीं, तब कहीं फोन मिलता था। उसकी खुशी हम अपनों से साझा करते थे। एक बड़े हिंदी अखबार का संवाददाता और सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त पत्रकार होने के बावजूद अगर मेरी सिफारिश एक हमपेशा व्यक्ति ने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री से न की होती तो मुझे फोन मिलने में बहुत देर लगती। लेकिन आजकल फोन या मोबाइल लेना कोई समस्या नहीं है, बल्कि समस्या न लेना ज्यादा है। जिन्होंने आज भी जिद करके मोबाइल फोन नहीं लिया है, वे मित्र-परिचित कई बार इस दुनिया के आदमी नहीं लगते। उनसे बात करना अब एक समस्या लगने लगा है, क्योंकि उन्हें जब चाहे फोन नहीं किया जा सकता, जिसकी अब लत पड़ चुकी है।

समाजवाद तो क्या खाकर इस देश में आएगा, मगर मोबाइल समाजवाद जरूर आ चुका है! आज लगभग सबके पास मोबाइल है। साधारण आदमी के पास भी मोबाइल होना भद्रवर्ग को अखरता नहीं। बल्कि उसे इससे अपने लिए भी खासी सुविधा हो गई है। हमारी एक परिचिता को जब साइकिल रिक्शा की जरूरत होती है तो वे उस विश्वसनीय रिक्शा वाले को मोबाइल पर बुला लेती हैं। मजदूरों-कारीगरों के पास मोबाइल होने से उनसे संपर्क करना आसान हो गया है। मोबाइल को सिर्फ फोन कहना एक तरह से उसके अन्यान्य गुणों के साथ अन्याय करना है और स्मार्ट फोन के तो कहने ही क्या! यह अलग बात है कि हमारी पीढ़ी के बहुत से लोग मोबाइल का उपयोग फोन की तरह करने के अलावा कोई और इस्तेमाल करना नहीं जानते। कई के लिए तो एसएमएस करना भी मुश्किल है। बहुत से लोग अब विभिन्न कारणों से एक से ज्यादा मोबाइल फोन रखते हैं। मैं भी एक मोबाइल के साथ घर में एक अचलित फोन भी आदतन रखे हुए हूं। मैं चूंकि एक हाउसिंग सोसायटी में रहता हूं, इसलिए घर में इंटरकॉम भी लगा हुआ है। कभी-कभी तीनों एक साथ घनघनाते हैं तो दिमाग भी घनघना जाता है कि किसे उठाऊं, किसे छोड़ दूं। एक की तरफ लपकता हूं तो दूसरा बंद हो जाता है और कई बार संयोग से एक से बात इतनी लंबी खिंच जाती है कि दूसरे का जवाब देना भूल जाता हूं!

पहले जब मेरे पास मोबाइल नहीं होता था तब हर जगह, हर परिस्थिति में दूसरे के घनघनाते मोबाइल से बड़ी कोफ्त होती थी। किसी का मोबाइल किसी के शवदाह के समय भी आ जाता था तो अजीब लगता था। इससे भी विचित्र यह लगता था किसी का उस समय भी सुनना और आराम से बातें करते चले जाना। लेकिन अब मैं इन सबका अभ्यस्त हो चुका हूं और कुछ भी विचित्र नहीं लगता। जब मैंने नया-नया मोबाइल खरीदा था तो उसे लेकर बस में जाने पर भी असुविधा होती थी, क्योंकि तब मोबाइल स्टेटस सिंबल हुआ करता था। उसके चोरी जाने के डर से ज्यादा संकट यह लगता था कि कोई क्या सोचेगा कि यह मोबाइल फोन रखता है, मगर इसकी हालत यह है कि बस में सफर करता है!

अचलित फोन का सुख यह था कि आप दफ्तर या घर में जब हैं, तभी उसे सुन सकते थे। शेष समय पूरी तरह आपका अपना होता था। अब हर समय किसी का फोन सुनने या उसकी उपेक्षा करने को आप बाध्य हैं। कई बार विचित्र स्थितियां पैदा हो जाती हैं। फोन तब आएगा, जब आप सुनने की स्थिति में नहीं हैं। नहा रहे हैं या कुछ और कर रहे हैं, किसी दूसरे फोन पर बात कर रहे हैं या आप किसी मीटिंग या सभा में बैठे हुए हैं या किसी बात पर बच्चों पर झल्लाए हुए हैं या पत्नी आपकी खबर ले रही है, दिन भर के थके हुए हैं और सोने जा रहे हैं या कार-स्कूटर चला रहे हैं। आप फोन सुनना नहीं चाहते, लेकिन सुनना पड़ता है।
मोबाइल होने से आपको घर वालों की और घरवालों को आपकी चिंता ज्यादा होने लगी है। किसी समय आपने मोबाइल पर संपर्क किया और उसने किसी कारण से नहीं उठाया तो चिंता बहुत बढ़ जाती है। ऐसा पहले नहीं होता था। दरअसल, एक बार मोबाइल के अभ्यस्त हो जाने पर न आप इसे छोड़ सकते हैं और न यह आपको छोड़ सकता है। अभी दो दिन मेरा मोबाइल खराब रहा तो मेरी चिंता यह थी कि यह किसी तरह ठीक हो जाए। ऐसा लगता रहता है कि पता नहीं किसका कितना जरूरी फोन अभी आ रहा होगा। जबकि सामान्य दिनों में ज्यादातर लगभग गैरजरूरी फोन आते रहते हैं। बहरहाल, इस मोबाइल पर झल्लाता भी हूं, इससे उकताता भी हूं, मगर इसे दिन-रात अपने पास भी रखता हूं। जब कभी घर पर या कहीं और इसे भूल गया हूं तो बेचैन हुआ हूं। मैंने खुद को असुरक्षित महसूस किया है, जैसे यह मेरा पहचान-पत्र हो!

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