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काश किताब खो जाती

मन के किसी कोने में आस थी कि शायद किताब मिल जाए। यह याद था कि प्रेम ने आईएनएस पर नींबू की चाय पीते हुए किताब लौटाई थी और मेट्रो में वह मेरे हाथ में थी..
Author नई दिल्ली | September 3, 2015 01:57 am

मन के किसी कोने में आस थी कि शायद किताब मिल जाए। यह याद था कि प्रेम ने आईएनएस पर नींबू की चाय पीते हुए किताब लौटाई थी और मेट्रो में वह मेरे हाथ में थी। कुछ तो हर रोज दफ्तर पहुंचने के रुटीन से मुक्ति और कुछ ऐन घर से निकलते समय तेज बारिश की आमद के कारण अगले दो दिन तक घर से निकल नहीं सका। वह बात बार-बार याद आई कि कोई भी चीज खोती नहीं है। होता सिर्फ यह है कि आप उसे जहां रखते हैं, वह जगह आप भूल जाते हैं। मैं भी वह जगह भूल गया था। वह शायद मेट्रो स्टेशन पर एटीएम से पैसे निकालते वक्त या उस रिक्शे पर छूटी होगी, जिससे मैं उस रोज कन्हैया नगर से घर तक आया था। मुझे भरोसा था कि किताब रिक्शे पर छूटी होगी तो दैनिक सवारी से पहचान की अंगुली थाम कर देर-सबेर मुझ तक पहुंच ही जाएगी और अगर वह मेट्रो स्टेशन पर कहीं छूटी होगी, तब उसके मिलने का सवाल ही नहीं उठता।

दो दिन बाद मैं घर से निकल सका। कन्हैया नगर मेट्रो स्टेशन पहुंचा और किताब मिल पाने की नाउम्मीदी के बावजूद जब मेरे कदम बरबस ही एटीएम की ओर बढ़े, तभी वहां तैनात सुरक्षा गार्ड ने आवाज लगाई- ‘साहब, वहां एटीएम मशीन पर तीन-चार दिन से कोई किताब रखी है। देख लेना, आपकी तो नहीं है!’ किताब मेरी ही थी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे तुलसीराम की हिंदी में प्रकाशित आत्मकथा का दूसरा खंड- ‘मणिकर्णिका’। यह भयावह इसलिए था कि आत्मकथा के पहले खंड ‘मुर्दहिया’ यानी मृत मनुष्य और पशु के भी अंतिम शरण्य से आगे एक दलित लेखक का बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पूरे एक दशक का जीवन संघर्ष दर्ज करती इस किताब के एक सार्वजनिक स्थल पर दो दिन लावारिस पड़े रहने की यह घटना इस दौर में हुई, जब पिछड़ी जाति से आने वाले हमारे प्रधानमंत्री कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपने तूफानी चुनाव प्रचार अभियान के दौरान आमतौर पर हिंदी में ही लोगों से संवाद स्थापित करते रहे हैं। यह मेरे लिए निराशाजनक बात भी थी कि इसे दो दिन तक उस मेट्रो स्टेशन पर किसी ने नहीं उठाया, जिसके एक ओर दलितों-पिछड़ों-वंचितों की झुग्गी बस्ती है, एक ओर निम्न और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों का रिहाइशी इलाका त्रिनगर और थोड़ा ही आगे मध्यवर्गीय और उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों की केशवपुरम और अशोक विहार जैसी कॉलोनियां।

मैं भूल गया था कि दूसरों की किताबें मार लेने, पुस्तकालयों से उन्हें उड़ा लेने, फुटपाथों पर पुरानी किताबों के बेतरतीब बिखराव में घंटों डूबते-उतराते रहने और अपनी कोई पसंदीदा, खस्ताहाल किताब अचानक पा लेने के किस्से दशकों पहले ही हमारे अनुभवों से विदा हो चुके हैं। और हमारे इस समय में ‘मणिकर्णिका’ ही क्यों, हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं की कोई दूसरी किताब भी होती, मसलन प्रेमचंद की, रवींद्रनाथ, रेणु, मंटो, अमृता प्रीतम, विष्णु सखाराम खांडेकर या तकषि शिवशंकर पिल्लै की तो भी उसका हश्र शायद यही होता। दरअसल हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएं अब लोकतंत्र के पांचसाला उत्सव में अंगे्रजी की शिक्षा, उसके बाजार और प्रभामंडल में निषिद्ध बहुसंख्यक आबादी से लगाव का भ्रम पैदा कर उनका राजनीतिक दोहन भर ही संभव बनाती हैं।

हालांकि मेट्रो में कुछ लोग कोई किताब पढ़ते दिख जाते हैं। अमूमन अंगरेजी की कोई किताब, चेतन भगत की ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ या ‘रिवोल्यूशन 2020’ या इसी शीर्षक की ध्वनि देती दिवंगत अब्दुल कलाम साहब की ‘विजन 2020’, लेकिन स्मार्ट मोबाइल पर किसी गेम में गर्क रहने की तरह छोटी-बड़ी यात्राओं में किताबों में डूब जाना भी हमसफरों से निर्लिप्त हो जाना है। आप अपनी चेतना में बाहर की दुनिया को निषिद्ध करते हैं, लोगों के बीच एक निजी स्पेस निर्मित करते हैं और किताब का समय चेतना में बहने लगता है। समाज से निर्लिप्तता और निजत्व के संधान की इस युक्ति का मेल शायद केवल उन किताबों से हो पाता है, जो एक तो व्यक्तियों, समुदायों, वर्गों, सामाजिक संबंधों, विकास और प्रगति तक तमाम प्रत्ययों के बारे में आपकी लगी-बंधी धारणाओं को, स्टीरियोटाइप को प्रश्नांकित करने से कतरा कर निकल जाए और दूसरे, विकास में उसके ‘ट्रिकल-डाउन’ सिद्धांत में और इसमें आपकी निजी हिस्सेदारी संभव होने में आपका भरोसा पक्का कर सके।

बहरहाल, अभी दो-चार दिन पहले मेट्रो में एक लड़के के हाथ में शिवाजी सावंत की किताब ‘मृत्युंजय’ देख कर मैंने उससे दो सवाल किए- एक, क्या यह उपन्यास उसके किसी पाठ्यक्रम में शामिल है और दूसरा, क्या वह साहित्य का विद्यार्थी है! पहले पर उसका जवाब था ‘नहीं’ और दूसरे पर ‘हां’। उसके इन जवाबों से किताब के नहीं खोने की मेरी निराशा गहरी हो गई है।

(राजेश कुमार)

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