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लैपटॉप की लॉलीपॉप

श्रीप्रकाश दीक्षित लोकसभा चुनाव में जब अस्सी सीटों वाले उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को चार-पांच सीटें ही मिलीं तो नेताजी खिसियाए और बौखलाए भी। इस शर्मनाक पराजय का ठीकरा उन्होंने नरेंद्र मोदी के बजाय बेटे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुफ्त लैपटॉप योजना पर फोड़ा। उत्तर प्रदेश सरकार की इस योजना के जरिए सरकारी […]
Author April 7, 2015 16:06 pm

श्रीप्रकाश दीक्षित

लोकसभा चुनाव में जब अस्सी सीटों वाले उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को चार-पांच सीटें ही मिलीं तो नेताजी खिसियाए और बौखलाए भी। इस शर्मनाक पराजय का ठीकरा उन्होंने नरेंद्र मोदी के बजाय बेटे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुफ्त लैपटॉप योजना पर फोड़ा। उत्तर प्रदेश सरकार की इस योजना के जरिए सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप बांटे गए थे। इधर हमारे मध्यप्रदेश में भी मुफ्त लैपटॉप की एक योजना सुर्खियों में है। कहा जा रहा है कि लैपटॉप के नाम पर रसीद लेकर हर हितग्राही को चालीस-बयालीस हजार रुपए बांटने के बाद ही व्यापमं घोटाले को नई ऊर्जा मिली, जिसने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भी लपेटे में ले लिया! इसलिए कल को हमारे अंधविश्वासी नेता लैपटॉप को मनहूसियत का प्रतीक बताने लगें तो हैरान मत होइएगा!

मध्यप्रदेश में लैपटॉप बांटने की तस्वीर दूसरे किस्म की है। यहां लैपटॉप का हितग्राही विद्यार्थी कोई जरूरतमंद नहीं, बल्कि पत्रकार बिरादरी है। मजे की बात यह कि पत्रकारों को मुफ्त लैपटॉप का वादा विधानसभा चुनाव के समय सत्तारूढ़ भाजपा की प्रदेश इकाई ने किया था। दिलचस्प यह भी है कि इस मुफ्तखोरी को घोषणापत्र में इस अंदाज में जगह दी गई, मानो यह समाज के सबसे ‘गए-गुजरे’ तबके के कल्याण के लिए जरूरी हो! आज का कड़वा सच यह है कि सभाओं और घोषणापत्रों में किए गए वादों को चुनावी जुमला कह कर खारिज किया जा रहा है।

लेकिन लैपटॉप का वायदा चूंकि मीडिया से किया गया था, सो फटाफट इस पर अमल की कवायद भी शुरू कर दी गई। उपहाररूपी खुली रिश्वत के लिए बदनाम दिवाली के अवसर से लैपटॉप बांटने की शुरुआत कर दी गई। पहली खेप में चुनिंदा पत्रकारों को इस उपहार से नवाजा गया और लैपटॉप के बजाय उसकी कीमत देने का तरीका चुना गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने खुद लैपटॉप खरीद कर बांटे थे। हमारी सरकार ने समझबूझ से काम लिया और वह इस झंझट में नहीं पड़ी! पत्रकारों से लैपटॉप खरीदी की रसीद भर मांगी गई, जिसके मिलते ही रकम उनके खाते में जमा कर दी जाती है।

कहावत है कि पत्रकारों को साधना तराजू में मेढ़क तौलने जैसा है। सो लैपटॉप के बहाने मुफ्त के चालीस हजार को लेकर सिर फुट्टवल तो होनी ही थी! कहते हैं कि हितग्राहियों में अपना नाम नहीं होने से कुपित एक संपादक के विरोध का तरीका अखबार मालिक को रास नहीं आया और उनकी नौकरी चली गई! कुछ पत्रकारों ने इसे लालीपॉप यानी बेवजह की रिश्वत कह कर गैरजरूरी बताया। उनका तर्क है कि जो पत्रकार लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं, उनके पास वह पहले से ही है और जो नहीं करते हैं उन्हें देने का कोई मतलब नहीं। दोनों ही सूरत में दिलचस्पी सिर्फ रकम में होगी। इस ऐतराज में दम है, क्योंकि इन दिनों लैपटॉप की रसीदें ज्यादा कट रही हैं, पर उतने बिक रहे हैं या नहीं, यह शोध का विषय है। असंतोष को देखते हुए अब लैपटॉप की पात्रता का दायरा बढ़ाने की भी खबर है।

पत्रकार बिरादरी को लैपटॉप देने पर नहीं, बल्कि देने के तौर तरीकों पर ऐतराज है। वे घोषणापत्र में ऐलान कर इसे देने और बैंक खाते में रकम जमा करने से कुपित हैं। सही भी है, क्योंकि उपहार का आदान-प्रदान तो खामोशी से होता है। सार्वजनिक ऐलान से पत्रकारों की भद्द पिट रही है। ऐसा भी सुनने में आया है कि सरकारी साधन-सुविधाओं से गले तक उपकृत कुछ पत्रकारों ने इस मौके को अपनी छवि चमकाने का मौका मान कर यह तोहफा कबूल करने से इनकार कर दिया! यों पत्रकारों को साधने के लिए हमारे मध्यप्रदेश की सरकारें, वे कांग्रेस की रही हों या भाजपा की, तैयार रहती हैं। सरकार के प्रचार विभाग में पत्रकारों की सेवा-टहल के लिए अलग से शाखा भी है। कुछ समय पहले तक तो इसका नाम ही पत्रकार सत्कार शाखा था। बाद में शायद किसी के ऐतराज पर इसका नाम बदल दिया गया। लेकिन काम वही है। इस शाखा के मार्फत सरकार ने पिछले नौ सालों में पत्रकारों के सत्कार पर छब्बीस करोड़ रुपए से ज्यादा फूंक डाले हैं! इसमें लैपटॉप के मद में इस साल का अनुमानित पांच करोड़ रुपए का खर्च शामिल नहीं है।

इस कथा का एक कृष्णपक्ष और है। भोपाल या सूबे के अन्य महानगर से इस घोषित उपहार और अघोषित खुशामद के खिलाफ पत्रकार बिरादरी की ओर से कोई आवाज नहीं उठी! न किसी पत्रकार संगठन ने और न किसी पत्रकार ने सरकार में अपना विरोध औपचारिक रूप से दर्ज कराया है। मध्यप्रदेश में ज्यादातर मीडिया मालिक अपने रसूख का बेजा इस्तेमाल कर कारोबारी हो गए हैं और उनका जलवा देख कारोबारी भी मीडिया में घुस आए हैं। नतीजा यह कि मीडिया सत्तापरस्त और सरकारपरस्त होकर रह गया है। मातहत पत्रकार करें भी तो क्या! सरकार की सरपरस्ती और प्रशस्ति ही मानो उनकी नियति बन गई है! ऐसे में लैपटॉप के बहाने दी जा रही नगदी को नकारने का जोखिम भला वे कैसे लेते!

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