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जीत की हार

रागिनी नायक सुदर्शन की कहानी में तो ‘हार की जीत’ हो जाती है! दीन दुखिया अपाहिज का वेश धर कर डाकू खड्ग सिंह बाबा भारती का शानदार घोड़ा छलपूर्वक छीन लेता है, पर मानवता के हित में उनका यह निवेदन कि इस घटना का जिक्र वह किसी से न करे, वरना कभी कोई किसी गरीब […]
Author April 9, 2015 13:46 pm

रागिनी नायक

सुदर्शन की कहानी में तो ‘हार की जीत’ हो जाती है! दीन दुखिया अपाहिज का वेश धर कर डाकू खड्ग सिंह बाबा भारती का शानदार घोड़ा छलपूर्वक छीन लेता है, पर मानवता के हित में उनका यह निवेदन कि इस घटना का जिक्र वह किसी से न करे, वरना कभी कोई किसी गरीब अपाहिज की मदद नहीं करेगा, खड्ग सिंह पर गहरा प्रभाव डालता है। वह रात के अंधेरे में सुलतान को वापस अस्तबल में बांध आता है। लेकिन असल जिंदगी में तो जीत की हार हुई है। आम आदमी पार्टी की कल्पनातीत जीत में जिन सपनों, विचारों और सदिच्छाओं की जीत निहित समझी जा रही थी, अहं और सत्तालोलुपता ने उसकी केंचुली उतार दी है। एक बड़ी उम्मीद को अरविंद केजरीवाल ने नाउम्मीदी में और जनाकांक्षा को निजी महत्त्वाकांक्षा में तब्दील कर दिया है। शायद सबसे बड़ा अहित देश-समाज और राजनीति का यह हुआ है कि अब हर नई कोशिश करने वाला संदिग्ध हो जाएगा। काश, केजरीवाल ने बाबा भारती की चेतावनी का मान रखा होता!

आम आदमी पार्टी के ‘फलक के दश्त पे तारों की आखिरी मंजिल’ तक दिल्ली को पहुंचाने के वादे को जब यथार्थ की कसौटी पर परखती हूं तो मुक्तिबोध की कविता ‘चंबल की घाटी’ की कुछ पंक्तियां याद आती हैं- ‘मैं एक थमा हुआ मात्र आवेग/ रुका हुआ एक जबर्दस्त कार्यक्रम/ मैं एक स्थगित हुआ अगला अध्याय/ अनिवार्य/ आगे धकेली गई प्रतीक्षित महत्त्वपूर्ण तिथि/ मैं एक शून्य मैं छटपटाता हुआ उद्देश्य…!’ यह करीब तीन साल में घटित बड़ा दिलचस्प वृत्तांत है। यह जमाने से इश्क के केवल अपने तक सिमट जाने की दास्तान है। एक आंदोलन को व्यक्तिगत आरोहण में बदल देने की दुखद गाथा है। राजनीतिक विकल्प को हास्यास्पद गल्प में परिवर्तित करने की कहानी है।

जनसाधारण को जन लोकपाल के लिए जन संघर्ष की दिशा में प्रेरित करने से शुरू हुआ अध्याय सत्ता पर काबिज होने की होड़ तक सिमट जाएगा, यह उस आम आदमी ने कहां सोचा था, जिसके नाम की दुहाई देकर एक नई राजनीतिक पार्टी का जन्म हुआ। लक्ष्य तो था आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता, समावेशी आचार-विचार और भाईचारे के आधार पर एक वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत का, लेकिन सड़सठ सीटों का प्रचंड बहुमत मिलते ही पार्टी में एकाधिकार को लेकर शुरू हुए महाभारत ने सिद्धांतों और सार्वजनिक शोभनीयता के परखच्चे उड़ा दिए। एक दंतकथा का वह मेंढ़क आंखों के सामने आ गया जिसने मिथ्याभिमान में इतना पेट फुलाया कि अपनी सीमाओं का उसे अंदाजा ही न रहा। नतीजतन पेट फट गया।

अब्राहम लिंकन ने कहा था कि अगर किसी के चरित्र का सही आकलन करना हो तो उसे कुछ समय के लिए सत्ता पर काबिज कर दो, उसका असली चेहरा और प्रवृत्ति उजागर हो जाएंगे। 2013 में आम आदमी पार्टी पहली बार सत्ता में आई। दिल्ली की उदार जनता ने पहली उनचास दिनों की सत्ता से पलायन के लिए क्षमायाचना पर केजरीवाल की बड़ी भूल को भी भुला दिया और उन्हें फिर से मौका दिया। दूसरी पारी में तो जितना बड़ा जनादेश मिला उतनी ही जल्दी ‘आप’ पतन की ओर बढ़ चली। इंसानों को भाईचारा बनाए रखने का संदेश देने वाले केजरीवाल अपनी ही पार्टी के भीतर संवाद और समन्वय स्थापित नहीं कर पाए। जो आरोप-प्रत्यारोप सुनाई पड़े, वे इस पार्टी के उन कर्ताधर्ताओं पर थे, जो मौका मिलते ही ‘हमारी कमीज सबसे साफ’ बताते हुए हर दूसरी पार्टी और नेता को कमतर कहते थे। पार्टी के संरक्षक, संस्थापक और चाणक्य ने सवाल सिर्फ कथनी और करनी को लेकर उठाया था। लेकिन ‘एक व्यक्ति एक पद’ के पार्टी के नियम का सवाल उठाते ही योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण खलनायक और सत्ता के लोभी घोषित कर दिए गए। आरटीआइ के लिए लड़ने वाले केजरीवाल उसके मुख्य गुण पारदर्शिता को पार्टी में लागू नहीं कर पाए। आंतरिक लोकपाल सहित तमाम सवाल पूछने वालों को बेआबरू कर कूचे से बाहर निकाल दिया गया।

जो व्यक्ति सार्वजनिक रूप से गांधी की समाधि के सामने मौन धारण कर ग्लानि और पश्चात्ताप के आंसू बहाता है, वह व्यक्तिगत वार्तालाप में किस तरह अपने ही साथियों को गालियों से नवाजता है, यह दुनिया ने देखा। आम आदमी पार्टी को एक विचार के रूप में उदित करने के पीछे बहुत लोगों की मेहनत होगी। केजरीवाल की खास छवि बनाने और उन्हें एक ब्रांड की तरह उभारने में भी कई लोगों ने मशक्कत की होगी। लेकिन पार्टी में अपना वर्चस्व शायद केजरीवाल के लिए पार्टी के अस्तित्व से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। क्या इस सबसे तानाशाही और अधिनायकवाद का संकेत नहीं मिलता है?

जिस तरह अहंकार के मद में चूर, हठ बुद्धि से ग्रस्त, एकछत्र राज स्थापित करने की होड़ में भस्मासुर एक वरदान को अपने लिए श्राप बना बैठा, उसी तरह केजरीवाल भी जनता जनार्दन द्वारा दिए गए सड़सठ सीटों के वरदान को अभिशाप बनाने में लगे हुए हैं। आज जनता अगर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है तो इसमें उसकी क्या गलती है!

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