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हमसे स्कूल मत छीनो

निवेदिता मेरा शहर निहायत बदसूरत है। एक ऐसा शहर जहां पेड़-पौधे नहीं हैं, बाग नहीं हैं और जहां मौसम का फर्क सिर्फ आसमान में नजर आता है। उसके बावजूद कुछ है जिसने घोर दुखों के बीच जीवन को बनाए रखा है, सपने मरने नहीं दिए और जिसने लजाते सौंदर्य का उसकी खोह तक पीछा किया। […]
Author February 3, 2015 13:06 pm

निवेदिता

मेरा शहर निहायत बदसूरत है। एक ऐसा शहर जहां पेड़-पौधे नहीं हैं, बाग नहीं हैं और जहां मौसम का फर्क सिर्फ आसमान में नजर आता है। उसके बावजूद कुछ है जिसने घोर दुखों के बीच जीवन को बनाए रखा है, सपने मरने नहीं दिए और जिसने लजाते सौंदर्य का उसकी खोह तक पीछा किया। सबसे अहम बात है जिंदगी के पक्ष में खड़ा रहना, अपनी दुनिया की बेहतरी के लिए संघर्ष करना। इसलिए मुझे अपने इस टूटे-फूटे शहर से प्यार है। क्या यह अनोखी बात नहीं है कि किसी शहर को उसके स्कूल से जाना जाए? जिस स्कूल की नींव एक सौ सोलह साल पहले पड़ी, उसने अब तक कितनी बच्चियों को शिक्षित किया होगा? वे सब आज अपनी जिंदगी में क्या कर रही होंगी? क्या उन्होंने सफदर की कविता की तरह अ, आ, इ, ई को हथियार बनाया होगा? इस स्कूल ने जीवन में कितने रंग भरे होंगे? लाल रिबन बांधे, हाथों में बस्ता लिए खिलखिलाती बच्चियों का समूह जब कचौड़ी गली से गुजरता होगा तो कितने बेशुमार रंग झिलमिलाते होंगे? आज उस स्कूल को यहां से हटाया जा रहा है।

दरअसल, पटना सिटी की कचौड़ी गली स्थित नारायणी कन्या विद्यालय से कुछ दूरी पर सिखों की आस्था का प्रमुख केंद्र पटना साहेब गुरुद्वारा है। 2017 में सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह की साढ़े तीन सौवीं जयंती है। इस मौके पर लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। उनके ठहरने के लिए होटल और पार्किंग की व्यवस्था होनी है। गुरुद्वारे को यह जगह देने के लिए सरकार इस स्कूल को यहां से कहीं और भेजना चाहती है। यह त्रासदी नहीं तो और क्या है कि एक स्कूल को आस्था की भेंट चढ़ना होगा।

दुनिया में धर्म के रक्षकों की कमी नहीं है! पर अब सरकारें भी धर्म का ठेका लेने लगी हैं। धर्म को लेकर मेरे मन में हमेशा संशय रहा है। दुनिया में धर्म के नाम पर जो कुछ चल रहा है, उससे मैं इसी नतीजे पर पहुंची हूं कि किसी भी धर्म ने कभी इंसानों का भला नहीं किया। उसका इतिहास तमाम गैर-सभ्यताओं के खून से लथपथ है। धर्म के नाम पर देशों को लूटा गया, सभ्यताओं का विनाश किया गया। पूरी नस्लों का नामो-निशान मिटाया गया है। फिर भी उसने आज पूरी दुनिया को अपने घेरे में ले रखा है। हमारे देश में सवा सौ करोड़ से ज्यादा लोग हैं। प्रगति के मानव सूचकांक में हमारी गिनती एक सौ अड़तीसवें नंबर पर होती है। जिस देश में चालीस करोड़ से ज्यादा लोग अशिक्षित हैं और भयानक गरीबी में रहते हैं, जहां साठ करोड़ लोगों के पास जीने के लिए पशुओं से बेहतर साधन नहीं हैं, वहां सबसे ज्यादा कमाई धर्म के ठेकेदारों की है। हमारी धार्मिक आस्थाओं का आधार इतना कमजोर है कि वह मामूली चीजों से आहत हो जाता है। वह जनसंहार करने से भी नहीं चूकता। धर्म की किसी भी दरार के पास आग लगाइए, प्रचंड मात्रा में राजनीतिक ऊर्जा फूट पड़ती है। ऐसे में अगर किसी धार्मिक उत्सव में किसी स्कूल को होम करना हो तो कौन-सी बड़ी बात है!

प्रशासन के लिए यह काम आसान है, क्योंकि इस स्कूल में गरीब बच्चियां पढ़ती हैं। नारायणी मध्य विद्यालय के शिक्षक ललित किशोर ने बताया कि अगर स्कूल यहां से हट गया तो पचास फीसद बच्चियां पढ़ाई छोड़ देंगी। आसपास के चार किलोमीटर के दायरे में कोई स्कूल नहीं है। उस स्कूल को बचाने के लिए शहर के लोग सड़कों पर हैं। जिस शहर की आबादी का बड़ा हिस्सा निरक्षर है, वहां के लोग अगर स्कूल के लिए सड़क पर आए हैं तो मैं मानती हूं कि ये जीवित नस्लें हैं। किसी भी जाति, धर्म, समुदाय या सरकार को क्या यह अधिकार है कि वह बच्चियों को पढ़ने से वंचित कर दे?

देश के चालीस करोड़ लोगों को शिक्षित करना आसान नहीं है, पर स्कूलों को तोड़ने, बर्बाद करने का काम सबसे आसान है। मैं ऐसी किसी भी आस्था के विरुद्ध हूं जो लड़कियों की शिक्षा से ज्यादा किसी और बात को अहमियत देती हो। वह चाहे धर्म ही क्यों न हो! मैं खुद को विधर्मी कहलाना पसंद करूंगी। हमारे जंगल, खेत-खलिहान, हमारी बस्तियां और सभ्यता तभी बचेगी, जब बच्चियां पढ़ेंगी। हम अपने सपनों से खिलवाड़ नहीं कर सकते। कचौड़ी गली की बच्चियां अगर यह कह रही हैं कि हमारा स्कूल हमसे मत छीनो, तो हमें उसके पक्ष में खड़ा होना ही होगा। ये बच्चियां अक्षरों का उत्सव मना रही हैं। कचौड़ी गली के सैकड़ों बच्चों ने जुलूस निकाला। लाल, हरी, पीली और सफेद झंडियां लहरार्इं। मगर जिस स्कूल ने कभी मुल्क के गुलाम शरीर में स्वतंत्रता की रूह जगाई थी, आज उसे वहां से हटाया जा रहा है!

 

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