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लाल टाई का गणित

अभिषेक श्रीवास्तव गणितज्ञ जॉन नैश की एक सड़क हादसे में मौत की खबर जिस वक्त मिली, मैं दिल्ली के हिंदी भवन में बैठा था। वहां दिल्ली विश्वविद्यालय में अंगरेजी के शिक्षक जीएन साइबाबा की रिहाई के लिए एक सम्मेलन चल रहा था। वक्ता कह रहे थे कि वे ‘गिल्ट ऑफ एसोसिएशन’ यानी ‘संबद्धता का दोष’ […]
Author May 27, 2015 10:29 am

अभिषेक श्रीवास्तव

गणितज्ञ जॉन नैश की एक सड़क हादसे में मौत की खबर जिस वक्त मिली, मैं दिल्ली के हिंदी भवन में बैठा था। वहां दिल्ली विश्वविद्यालय में अंगरेजी के शिक्षक जीएन साइबाबा की रिहाई के लिए एक सम्मेलन चल रहा था। वक्ता कह रहे थे कि वे ‘गिल्ट ऑफ एसोसिएशन’ यानी ‘संबद्धता का दोष’ में बंद किए गए हैं। यह ‘संबद्धता’ किसी दूसरे राजनीतिक बंदी के कथित बयान के आधार पर स्थापित की गई है। नैश की खबर पढ़ते हुए मैं सोच रहा था कि इस कथित बयान के न होने पर क्या यह कानूनी संबद्धता स्थापित हो पाती? हर बार किसी सामूहिक हित के आड़े व्यक्तिगत मामले क्यों आ जाते हैं। हम जानते हैं कि हमारा सामूहिक हित क्या है, फिर भी हम बुद्धि क्यों लगा देते हैं। बहरहाल, कोई पाठक यह पूछ सकता है कि कैदियों के सवाल का एक गणितज्ञ की मौत से आखिर क्या लेना-देना?

मैं गणित का छात्र हुआ करता था। गणित मेरा शगल था। पर गणित को सचेत रूप से छोड़ दिया। इसीलिए 23 मई को बड़ा अफसोस हुआ, जब मैंने देखा कि लोग श्रद्धांजलि देने की उतावली में सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे हैं कि जॉन नैश को गणित के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। गणित के लिए नोबेल नहीं मिलता, यह तो सामान्य ज्ञान है! नैश बेशक गणितज्ञ थे, लेकिन उन्हें अर्थशास्त्र के लिए संयुक्त रूप से नोबेल मिला था। मैंने गणित की पढ़ाई इसलिए बीच में छोड़ी कि एक मौके पर लगने लगा था कि समाज में इसकी कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है। वक्ताओं को सुनते-सुनते जब नैश की मौत की खबर मैंने मोबाइल पर देखी, तो तुरंत अतीत का दर्द उभर आया और वहां साइबाबा पर चल रही चर्चा के संदर्भ में नैश के दिए सिद्धांत ‘नैश संतुलन’ (नैश इक्विलिब्रियम) की याद हो आई।

नैश के गणित को आसान शब्दों में समझिए- दुनिया में दो तरह के खेल होते हैं। खेल मतलब एक से ज्यादा व्यक्तियों को संलग्न करने वाली कोई गतिविधि। गणित में हम इसे ‘गेम’ कहते हैं। खेलों की सामान्य समझदारी के हिसाब से एक ‘गेम’ क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, कबड््डी जैसा हो सकता है, जहां टीम का कोई ठेकेदार/ प्रायोजक होता है, इसलिए वहां फैसले सामूहिक होते हैं। दूसरे तरह के गेम सामाजिक होते हैं। इनमें मनुष्य के विवेक पर भरोसा किया जाता है, जहां यह माना जाता है कि हर सदस्य अपने-अपने विवेक और सामने वालों के पक्ष के हिसाब से स्वतंत्र फैसले करेगा (जब तक सामने वालों का पक्ष अपरिवर्तित रहे)। समाज, राजनीति, मनोविज्ञान, सैन्यशास्त्र, आदि में ऐसे ही ‘गेम’ पाए जाते हैं। इन्हें गणित की ‘गेम थियरी’ में असहयोगात्मक खेल कहते हैं। नैश का शोध इसी श्रेणी की गतिविधियों पर था। वे मानते थे कि हर कोई अगर सामूहिक हित को समझ रहा है, तब भी निजी हित में वह अपने विवेक से ऐसे स्वतंत्र फैसले करेगा, जो सामूहिक हित को नुकसान पहुंचाते हों।

इसका गणितीय निरूपण बेहद क्लिष्ट है, काफी हद तक मेरी योग्यता से भी बाहर, लेकिन इसका एक उम्दा उदाहरण गणित के एक सवाल में मिलता है, जिसे हम ‘प्रिजनर्स डाइलेमा’ कहते हैं। यानी ‘कैदियों की दुविधा’। समस्या के अंतर्गत एक ही अपराध में लिप्त दो कैदियों को एक-दूसरे के खिलाफ बयान देने और उसके बदले कैद में छूट का प्रलोभन दिया जाता है। यह जानते हुए कि वे दोनों चुप रह कर सबसे कम अवधि की सजा भोग सकते थे, बावजूद इसके अपने-अपने विवेक से स्वतंत्र फैसला करते हुए वे ऐसा नहीं करते। किसी ‘असहयोगात्मक’ खेल में विवेक के आधार पर व्यक्तियों के स्वतंत्र फैसले की मार्फत एक-दूसरे से विश्वासघात करने की स्थिति को ही ‘नैश संतुलन’ कहा जाता है।

जॉन नैश को लाल टाई पहने हुए किसी व्यक्ति से डर लगता था। उन्हें लगता था कि लाल टाई पहनने वाले सारे लोग कम्युनिस्ट हैं और उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। इस व्यामोह से पीड़ित होकर उन्होंने एक बार वॉशिंगटन में मौजूद दूतावासों को खत भी भेज दिया था कि सारे कम्युनिस्ट मिल कर सरकार बनाने वाले हैं। कैसा अजीब विरोधाभास है! जिस व्यक्ति ने सामूहिकता के खिलाफ खड़े स्वतंत्र विवेक को ‘संतुलन’ की स्थिति करार दिया, वह सामूहिकता की राजनीति से आजीवन आतंकित रहा! नैश के काम का समाजशास्त्रीय अध्ययन जाने कभी होगा या नहीं, पर उनके काम में क्या हम वामपंथी राजनीति का अक्स देखने की हिमाकत कर सकते हैं? बीते नब्बे साल में वाम एकता की जितनी समझदारी बनी, टुकड़े भी उतने ज्यादा होते गए हैं। क्या एक मंच से सारे राजनीतिक कैदियों का सवाल एक साथ वाकई नहीं उठाया जा सकता? हमारे जैसे लोग, जो अब तक संबद्धता के तर्क से बचे हुए जेल से बाहर बैठे हैं, क्या हम भी ‘नैश संतुलन’ में फंसे रहने को अभिशप्त नहीं हैं?

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