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असाधारण जुनून

विष्णु नागर अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पण के उदाहरण तो आज भी कम नहीं हैं। मगर बदनाम पुलिस महकमे की साधारण नौकरी करते हुए ऐसे संपूर्ण मानवीय समर्पण के उदाहरण शायद बहुत कम होंगे, जैसा कि मुंबई के दादाभाई नौरोजी नगर पुलिस स्टेशन से इसी महीने सेवानिवृत्त हुए सहायक सब इंस्पेक्टर राजेंद्र धोंदू भोंसले […]
Author March 19, 2015 09:05 am

विष्णु नागर

अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पण के उदाहरण तो आज भी कम नहीं हैं। मगर बदनाम पुलिस महकमे की साधारण नौकरी करते हुए ऐसे संपूर्ण मानवीय समर्पण के उदाहरण शायद बहुत कम होंगे, जैसा कि मुंबई के दादाभाई नौरोजी नगर पुलिस स्टेशन से इसी महीने सेवानिवृत्त हुए सहायक सब इंस्पेक्टर राजेंद्र धोंदू भोंसले ने पेश किया है। उनकी पूरी कहानी हाल ही में एक अंगरेजी अखबार में प्रकाशित हुई। करीब चार साल पहले भोंसले को अपने क्षेत्र के लापता लोगों की खोज करने की जिम्मेदारी मिली, जो उनके लिए बिल्कुल नई थी।

कुछ समय तक इसे समझने के बाद इसमें वे ऐसे जुट गए कि उस क्षेत्र की एक सौ छियासठ गुम बच्चियों में से एक सौ पैंसठ और लापता हुए एक सौ चौहत्तर में से एक सौ इकहत्तर लड़कों को खोजने में उन्हें सफलता मिली। गुम होने वाली बच्चियों में से तब सात साल की रही लड़की पूजा गौड़ का ही अभी तक पता नहीं चला है। मगर भोंसले को पूरा विश्वास है कि वह जीवित है और उसकी खोज रिटायर होने के बाद भी करना उनके जीवन का बड़ा लक्ष्य है। यह किसी बड़े आदमी की लड़की नहीं, अंधेरी के एक सिनेमा हॉल के बाहर उबली हुई मूंगफलियां बेचने वाले अड़तीस वर्षीय गरीब संतोष गौड़ की बेटी है। वह तीन सौ रुपए रोज की आमदनी में इस महानगर में पांच-छह लोगों का परिवार पाल रहा है।

पूजा और उसके दस साल के भाई रोहित को उनके दादाजी स्कूल में खर्च करने के लिए रोज दस रुपए दिया करते थे। बाईस जनवरी 2013 को पूजा ने अपने भाई से कहा कि तुम अभी मुझे मेरे पांच रुपए दे दो। भाई ने खाने की छुट्टी में देने को कहा, मगर पूजा नहीं मानी। स्कूल जाने में पंद्रह मिनट की देरी हो चुकी थी, इस कारण स्कूल से महज दस कदम की दूरी पर भाई ने बहन का साथ यह सोच कर छोड़ दिया कि यह भी अंदर आ जाएगी। मगर तब से वह लापता है। भोंसले ने उस बच्ची को ढूंढ़ने के लिए जो किया, वह एक पिता भी शायद ही कर पाए। उनके एक सहयोगी के अनुसार वे अपने आपको भूल कर भी इस काम में लगे हुए हैं।

पिछले दो साल से वह अपने साथ पूजा की तस्वीर की तीन कॉपियां हमेशा रखते हैं, ताकि जो भी उनकी मदद कर सके, वे उसे दे दें। उन्होंने पूरी मुंबई में जगह-जगह उसकी तस्वीरें लगवा रखी हैं। यहां तक कि कभी कहीं उसकी किसी तस्वीर पर जमा धूल देख लेते हैं तो उसे साफ करते हैं। इस बच्ची की तलाश में उन्होंने दुकानदारों, मोचियों, नाइयों, पान वालों, गृहिणियों, दाइयों, भिखारियों, आॅटो चलाने वालों, मोबाइल ठीक करने-बेचने वालों, बेकरी कर्मचारियों से पूछा, जिनका वास्ता हर तरह के हर वर्ग के लोगों से पड़ता है। उन्होंने शराबियों, नशेड़ियों, आवारा लोगों को भी पकड़ कर पूजा के बारे में पूछा और शहरी इलाकों में जाकर अज्ञात लोगों के शवों को भी देखा है।

वे पूजा से इस हद तक जुड़ाव महसूस करते हैं कि उसकी एक छवि उनकी स्मृति में रच बस गई है। उसकी आंखें वे पहचानने लगे हैं। उन्होंने उस हालत में सड़क पर छूट गई पूजा की उम्र और कद की लड़की की तरह आसपास की दुनिया देखने की कोशिश भी की है। वे लोगों से अक्सर इस बारे में पूछते रहे हैं कि अगर आप भी सात साल के हुए होते और आपको पूजा की तरह आपके हिस्से के पांच रुपए नहीं मिले होते तो आप गुस्से में क्या-क्या सोचते-करते!

दो लड़कों के पिता भोंसले के लिए पूजा उनकी अपनी बेटी की तरह हो चुकी है। उसकी खोज में नाकामी मिलने पर वे उसके लिए उसके पिता के साथ बैठ कर रोए भी हैं। एक रात तो भोंसले ने उसे सपने में देखा और रात भर उन्हें नींद नहीं आई। वे नाश्ता करने और सोने से पहले पूजा के मिलने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। उन्हें इतना ज्यादा विश्वास है पूजा के जीवित होने का कि अपनी थोड़ी-सी आमदनी में से कुछ रुपए बचा कर उन्होंने उसकी शिक्षा के लिए रखा है।

हम किसी हालत में भोंसले नहीं हो सकते। लेकिन वे भी हमारे जमाने के ही एक इंसान हैं। उनके इस जुनून को कुछ व्यावहारिक लोग पागलपन कहेंगे। लेकिन ऐसे ही ‘पागल’ लोगों ने हमारे बदसूरत समय को जीने, गौरव करने लायक बनाया हुआ है! ऐसे आदमी को कोई भी सरकार या व्यक्ति क्या दे सकता है, सिवाय इसके कि अब दस बरस की हो चुकी पूजा को उनके सामने लाकर खड़ा कर दिया जाए, ताकि उनकी खोज पूरी हो। भोंसले को पद्म श्री कभी नहीं मिलेगा। वह ऐसे असाधारण इंसानों के लिए शायद होता भी नहीं और उसका वे करेंगे भी क्या!

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