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आस्था के आडंबर

अशोक गुप्ता मैं बेशक एक आस्तिक व्यक्ति हूं और धार्मिक आयोजनों की प्रस्तुति में अंतर्निहित संस्कृति का भावबोध ग्रहण कर सकता हूं। लेकिन धार्मिक कर्मकांड मेरी नजर में आखिरकार आडंबरपूर्ण कृत्य ही हैं। कुछ समय पहले उज्जैन जाना हुआ। हाथ में कुल एक दिन का समय था, इसलिए ज्यादा घूमने या भटकने की गुंजाइश नहीं […]
Author January 28, 2015 17:56 pm

अशोक गुप्ता

मैं बेशक एक आस्तिक व्यक्ति हूं और धार्मिक आयोजनों की प्रस्तुति में अंतर्निहित संस्कृति का भावबोध ग्रहण कर सकता हूं। लेकिन धार्मिक कर्मकांड मेरी नजर में आखिरकार आडंबरपूर्ण कृत्य ही हैं। कुछ समय पहले उज्जैन जाना हुआ। हाथ में कुल एक दिन का समय था, इसलिए ज्यादा घूमने या भटकने की गुंजाइश नहीं थी। जिस दिन पहुंचा, उसी शाम को उज्जैन के रामघाट चला गया। नदी का सुरम्य किनारा मेरे मन को हमेशा बहुत भाता है। पहली बार उज्जैन गया था, सो यह जानकारी रोमांचित कर गई कि शाम को वहीं शिप्रा नदी की आरती का दैनिक आयोजन होता है। उत्सुकतावश वहां रुका। उसके पहले भी मैं बनारस में दशाश्वमेध घाट पर गंगा की आरती का मनोरम दृश्य देख चुका था। हाल में वह दृश्य मैंने सपरिवार नौकायन के दौरान नाव पर बैठे-बैठे फिर देखा था। इससे पहले काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र रहे होने के नाते अनेक बार देखा था।

बहरहाल, शिप्रा के किनारे रामघाट पर आयोजित आरती साधारण, लेकिन भव्य थी। नदी के एक किनारे रामघाट पर तीन पुजारी एक साथ एक ही मुद्रा में आरती कर रहे थे और ठीक उसके सामने दूसरे किनारे पर एक पुजारी उन्हीं मुद्राओं की अनुकृति प्रस्तुत करते हुए आरती कर रहा था। यह आमूल भंगिमा सचमुच एक नृत्य का आभास दे रही थी। साथ में विभिन्न वाद्यों की संगीतात्मक ध्वनि का प्रसारण था। इस प्रस्तुति ने निस्संदेह मुझे न केवल विभोर किया था, बल्कि एक विचार प्रक्रिया में डाल दिया था। वैचारिक द्वंद्व यह था कि मुझ जैसे व्यक्ति को यह प्रस्तुति रोमांचित क्यों कर रही है, जबकि ऊपरी तौर पर यह एक दैनिक आडंबर ही है।

आरती पूरी होने के बाद मैं अपनी चिंतन प्रक्रिया में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश में था। विराम इस विचार से मिला कि यह आयोजन एक धार्मिक कृत्य न होकर, सांस्कृतिक प्रस्तुति है, जो नदी के मानवीकरण के भाव से जुड़ कर जन-मानस में प्रकृति की उदारता का संदेश पहुंचाती है। प्रस्तुति की नृत्य भंगिमा, संगीतात्मक लय और पुजारियों की वेशभूषा कुल मिला कर जो नाट्य प्रारूप रच रही थी, वह किसी सांस्कृतिक आयोजन की तरह ही देखे और सराहे जाने की मांग करती है। यह वैचारिक यात्रा मेरे लिए सचमुच आनंद का कारण बनी।

उसी रात मैं उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में था। उज्जैन में हर थोड़ी दूर पर कोई न कोई मंदिर है। वहां न फोटो लेने पर प्रतिबंध था, न अलग से पैसे लेकर प्रवेश करा कर ‘अति महत्त्वपूर्ण व्यक्ति’ होेने का दंभ देने की व्यवस्था थी! वहां भी पांच समय की आरती का आयोजन होता है। पहली आरती, जो भस्म आरती कहलाती है, वह सुबह चार बजे होती है। उसके लिए रात ढाई बजे से लाइन लगती है। वह भी केवल उन भक्तों की, जिनका पहले कंप्यूटरीकृत पंजीकरण हो चुका हो। उसमें पुरुषों के लिए धोती पहनने और महिलाओं को केवल साड़ी जैसे परिधान में आने का निर्देश था।

इन सब प्रतिबंधों के चलते मैं इसे देखने का मानस नहीं बना पाया। लेकिन मैंने रात साढ़े दस बजे होने वाली शयन आरती को जरूर देखा। मुझे बताया गया कि इस आरती का प्रयोजन प्रभु को शयन के लिए सज्जा देकर विदा करना होता है। महाकालेश्वर में महत्ता प्राप्त ज्योतिर्लिंग भवन के भूतल में स्थापित है। इसमें साधारण और टिकटधारी दर्शनार्थी एक बड़े हॉल में बैठाए जाते हैं। बीस मिनट तक चलने वाली आरती का प्रारूप भी वैसा ही था जैसा शिप्रा नदी की आरती का था। लेकिन इसे केवल एक पुजारी कर रहा था। उच्च स्वर में वाद्य यंत्रों का नाद हॉल में गूंज रहा था और एक भयावहता रच रहा था। पार्श्व में मंत्रोच्चारण चल रहा था। पुजारी की भंगिमा में वैसी ही अनुशासित नृत्य-सी लय थी। इसके बावजूद यह आरती आनंदमयी और मनमोहक न होकर एक डर जैसा उपजा रही थी। उसे देखते हुए मेरे मन में कुछ वैसी ही छवि उभर रही थी, जैसी मैंने नाटकों या फिल्मों के उन दृश्यों में देखी है, जिनमें वह स्त्री दिखाई जाती है, जिस पर ‘देवी’ आती है! उसका झूमना भी लयात्मक होता है, लेकिन उसमें नृत्य जैसा बोध नहीं होता।

मैं चिंतन से घिर गया। प्रस्तुतियों का यह कैसा अनुभूतिजन्य भेद है! फिर कुछ समझ में आया। महाकालेश्वर की यह आरती कोई सांस्कृतिक अभीष्ट लेकर दर्शकों तक नहीं पहुंचाई जा रही थी। यह धार्मिक आडंबर का एक ऐसा भय रच रही थी, जिसके आगे केवल श्रद्धा-भाव उपजे और विचार तंत्र अपने आप अवरुद्ध हो जाए। यह परंपरागत आयोजन ठीक इसी संदेश की प्रस्तुति का उपक्रम है। इसके बिना पुजारी और मठाधीश की अतार्किक अमानवीयता कहां क्षम्य मानी जा सकेगी!

 

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