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सुख की उम्र

इस भागमभाग के दौर में अरस्तू जैसे दार्शनिक के लिखे को पढ़ने का समय हमारे पास नहीं है और न ही हम गांधी, कबीर और प्रेमचंद के लिखे को समझ पाते हैं।
Author April 12, 2017 05:31 am
प्रतीकात्मक चित्र

मनोज कुमार

इस भागमभाग के दौर में अरस्तू जैसे दार्शनिक के लिखे को पढ़ने का समय हमारे पास नहीं है और न ही हम गांधी, कबीर और प्रेमचंद के लिखे को समझ पाते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया में लगातार आने वाले संदेशों में कुछ संदेश ऐसे होते हैं जो गहन गंभीर दर्शन से हमारा सामना कराते हैं। जैसे अभी दो दिन पहले एक संदेश आया- ‘मुझे मालूम ही नहीं था कि सुख और उम्र में बैर है। जब सुख आता है तो उम्र विदा ले रही होती है।’ संदेश भेजने वाले ने शायद इतना ही किया था कि उसे किसी ने भेजा और उसने उसे आगे बढ़ा दिया। लेकिन इस संदेश ने मुझे सोचने के लिए विवश कर दिया। लगा कि सच में हम जीवन भर सुख की तलाश में भटकते हैं और जब एक उम्र गुजर जाने के बाद सुख हमारे पास होता है तो उम्र हमें छोड़ कर जाने के लिए तैयार बैठी होती है। मुझे लगता है कि इस संदेश में सुख और सुविधा को अलग-अलग कर नहीं देखा गया है। मेरा मानना है कि सुख और सुविधा, दो अलग-अलग चीजें हैं। सुख वास्तव में वह नहीं है जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर आपको मिलता है। उम्र के आखिरी पड़ाव पर मिलने वाले जिस सुख की हम बात कर रहे हैं, दरअसल वह सुख नहीं, सुविधा है।

सुख और सुविधा के बीच जो एक महीन-सी रेखा है, उसे समझना होगा। मेरी दृष्टि में सुख और सुविधा दोनों पर्यायवाची होने के बजाय बैरी हैं। सुख का सुविधा से कोई लेना-देना नहीं है। सुविधा संपन्न हो जाने का अर्थ यह नहीं कि आदमी सुखी है। अगर ऐसा होता तो तमाम धनपति और नाना प्रकार के कार्य कर धन संग्रहण करने वाले लोग इस संसार के सबसे सुखी लोग होते। हमारे समाज में संन्यासी होने की कोई जरूरत नहीं होती। हम कबीर और गांधी का स्मरण ही नहीं करते। सच तो यह है कि सुख को आप भीतर से महसूस करते हैं। जैसे एक अच्छी किताब पढ़ लेने के बाद, एक सार्थक फिल्म या नाटक देख लेने के बाद।एक अच्छे विचार को मन में बसा लेने के बाद जो महसूस करते हैं, वह सुख है। चोरी से आम तोड़ने का सुख या गेंद से पड़ोसी के घर का शीशा तोड़ देने का सुख बचपन का है तो युवावस्था में पहली कविता लिख लेने का सुख या किसी हमवय से आंखें चार करने का सुख, जिसे किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। हर उम्र का सुख अलग होता है। लेकिन एक बड़ी गाड़ी, बड़ा बंगला और अकूत धन इकट्ठा कर लेना सुविधा है। सुख आपके मन को शांति प्रदान करता है और सुविधाएं आपकी चिंता में लगातार बढ़ोतरी करती हैं। सुख आत्मिक होता है, इसलिए उसे बचाने के लिए कोई भौतिक प्रयास नहीं करना होता है, क्योंकि वह आपका अपना होता है। नितांत निजी। लेकिन सुविधा प्रदर्शन की वस्तु होती है और उसके संरक्षण के लिए किसी को लगातार भौतिक यत्न करना होता है।

किसी अच्छे विचार को हम अपनी सोच से और परिष्कृत कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त भौतिक साधनों की जरूरत नहीं होती है। एक अच्छी किताब पढ़ लेने का सुख भी आपका अपना होता है। हमारे भीतर के अच्छे विचार, सकारात्मक दृष्टि हमारे अपने परिवार को, आसपास के लोगों को संस्कारित करते हैं। भौतिक सुविधाओं से सुख की प्राप्ति होती तो हमारे ऋषि मुनि क्यों कंदराओं में भटकते! संकट से मिले अनुभव और अनुभव से समाज को शिक्षित करने में जो सुख है, वह असल सुख है। लेकिन सुविधाएं हमारी लालसा बढ़ाती हैं और लगातार और ज्यादा पाने की भावना को प्रबल करती हैं। यह लालसा उम्र के फना होने तक कायम रहती है। सुविधा और आवश्यकता में भी महीन अंतर है। रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य के जीवन की अनिवार्यता है तो बड़ी गाड़ी, बड़ा बंगला, ज्यादा बैंक बैलेंस अंतहीन सुविधा है। सुख,आवश्यकता और सुविधाओं के बीच उम्र आहिस्ता-आहिस्ता गुजर जाती है। उम्र सुख को साथ लेकर चली जाती है और सुविधाओं को वह दूसरों के उपभोग के लिए छोड़ जाती है, क्योंकि असीमित सुविधाएं तो उसने जुटा लीं, लेकिन उपभोग आवश्यकता के अनुुरूप ही कर पाया। एक निवाला एक बार में खाना था, सो वह सोने की थाली में रखी रोटी का एक निवाला ही खा पाया, क्योंकि सुविधाओं का अर्थ यह नहीं कि वह एक बार में पूरी रोटी निगल जाए। सुख उसे रोटी के एक निवाले में ही मिलता है। सुख उम्र के साथ-साथ चलता है और सुविधाएं जब आती हैं, तब उम्र जाने के लिए तैयार रहती है।

 

 

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