December 09, 2016

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दुनिया मेरे आगे: सदाबहार सप्तपर्णी

सप्तपर्णी का फूलना और हरसिंगार का खिलना मौसम के बदलने की सुगबुगाहट लेकर आता है।

Author November 1, 2016 05:25 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अलका कौशिक

सप्तपर्णी का फूलना और हरसिंगार का खिलना मौसम के बदलने की सुगबुगाहट लेकर आता है। अक्तूबर-नवंबर के महीनों में दोनों की खुशबू से रात की सैर मोहक बन जाती है। मेरे घर के आसपास इन दिनों दोनों शबाब पर जाने की तैयारी में हैं। लेकिन इस बार एक अजीब शामत सप्तपर्णी के पेड़ों पर आई है। मुहल्ले की औरतें जब-तब रोक कर कानों में एक मंत्र फूंक जाती हैं- ‘बड़ा मनहूस पेड़ है यह…! घर के सामने इसका उगना तो और भी खराब है…!’ और फिर कुछ घरों की तरफ इशारे होते हैं, जिनके सामने कल तक इठला रही सप्तपर्णी की छतरी अब गायब हो चुकी है। जाहिर है, कथित मनहूसियत फैलाने वाले उस पेड़ की खूबसूरती और उसके फूलों की खुशबू भी उसके अस्तित्व को बचाने में नाकाम रही।

यों मुझे अपने घर के ऐन सामने खड़े सप्तपर्णी के फूलने के मुकाबले उसकी चक्राकार पत्तियों और सिलसिलेवार शाखों से फैलने वाली उस छतरी से ज्यादा प्यार है, जिसकी आड़ में खड़ी मेरी कार को छाया के कुछ बेशकीमती कतरे नसीब होते हैं। वह छतरी न हो तो बेचारी कार दिनभर में धूप में खड़ी-खड़ी कुम्हलाती रहे। घर बनते ही पहला काम यही किया था कि नर्सरी की दौड़ लगाई थी और माली से भरपूर पड़ताल कर एक ऐसा पौधा लाकर घर के सामने उगाया था जो जल्द बड़ा होकर छतरी का काम कर सके। हम ‘एल्सटॉनिया’ का पौधा लेकर ही उस रोज नर्सरी से लौटे थे। और वाकई दो-चार साल में इस पौधे ने हमारी इकलौती कार के सिर पर कुदरती छतरी का इंतजाम कर डाला था।

लेकिन इधर बीते कुछ हफ्तों में मेरे मुहल्ले वाले पार्क से एक-एक कर तमाम सप्तपर्णी गायब हो चुके हैं। उससे पहले जाने कब से वे खूबसूरत पेड़ पार्क के किनारे-किनारे इठलाते आए थे। किसी को उनसे कोई शिकायत नहीं थी। बस कभी-कभार तेज हवा में एकाध टहनियां टूट जाती थीं। लेकिन पेड़ों के साथ तो ऐसा लगा ही रहता है। इस सदाबहार पेड़ की शाख पर दिन भर गिलहरियां मटरगश्ती करती हैं, हवा के झोंके इसके गहरे हरे-गुदगुदे पत्तों को दुलारते हैं। फिर अक्तूबर-नवंबर की सर्दी इसके फूलों के बहाने हवाओं को खुशबू से सराबोर करती है। लेकिन यह खुशबू इसकी दुश्मन ही साबित हुई है। कुछ साल पहले ताइपी में एक अभियान शुरू हुआ था, एल्सटॉनिया को मुहल्लों-पार्कों से निकाल बाहर करने का। लोगों को इसके फूलों की तीखी सुगंध से दिक्कत थी। यहां तक कि इस महक को अस्थमा की वजह माना जाने लगा। लेकिन सच क्या है, यह फिलहाल साफ नहीं है।

दिल्ली जैसे शहर में लोधी गार्डन से किंग्सवे कैंप तक की सड़कों पर सप्तपर्णी की बहार देखी जा सकती है। शायद कम समय में इसके बड़ा होकर घने छांवदार वृक्ष में बदल जाने के चलते ही इसे बागवानी में काफी इस्तेमाल किया गया है। लेकिन जब-तब इसके खिलाफ कभी अस्थमा के बहाने और कभी कच्ची टहनियों के तेज हवाओं में टूटने तो कभी इसके यहां की जलवायु का ‘मूल बाशिंदा’ न होने के बहाने अभियान चलते रहे हैं। लेकिन अब जो मेरे पड़ोस में इसे बदनाम करने की साजिश दिखाई पड़ी है, उसने तो दिल ही तोड़ दिया है। इस साजिश से तकलीफ बस इतनी है कि हम ईर्ष्यालुओं ने पेड़ों को भी नहीं बख्शा है। जो पेड़ कल तक चुपचाप सिर्फ छांव और खुशबू देता रहा है, उसी के खिलाफ मुझे भड़काने को साजिश नहीं तो और क्या कहूं। इसके अलावा, पेड़-पौधों से मेरे जगजाहिर लगाव को देखते हुए उसके ‘मनहूस’ होने की जो ‘थ्योरी’ गढ़ी गई है, वही मेरे दिल के टूटने का सबब है।

देखते-देखते मेरा वाला सप्तपर्णी अकेला रह गया है। आसपास के उसके ‘बिरादर’ ठूंठ में बदल चुके हैं या जड़ समेत उखाड़े जा चुके हैं। ‘डेविल्स ट्री’ भी कहलाता है सप्तपर्णी, जब यह मालूम हुआ तो लगा कि हो न हो, वाकई खुराफाती गुणों वाला होगा पेड़। तहकीकात की तो मालूम हुआ कि इसकी छाल से निकलने वाला दूध जहरीला होता है, जिसे दवाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यहां तक कि घाव, अल्सर वगैरह पर यही दूध मरहम का काम करता है। कितनी ही आयुर्वेदिक दवाएं बनाने के काम आता है सप्तपर्णी। फिर कुछ और नाम भी सामने आए, जैसे ‘एल्सटॉनिया स्कॉलेरिस’ या ‘ब्लैकबोर्ड’। दरअसल, सप्तपर्णी की लकड़ी इतनी कमजोर होती है कि इसे फर्नीचर जैसे भारी-भरकम सामान बनाने के लिए इस्तेमाल में नहीं लाया जाता। अलबत्ता, पेंसिल और स्कूलों में इस्तेमाल होने वाले ब्लैकबोर्ड इसी कच्ची लकड़ी से बनते हैं और इसीलिए नाम हो गया ‘स्कॉलेरिस’ या ‘ब्लैकबोर्ड ट्री।’ जिस पेड़ का नाता विद्यार्जन से हो, रोगमुक्ति से हो, उससे अपना बैर कैसा? हे सदाबहार सप्तपर्णी, तुम मेरे आंगन में आबाद रहो!

 

 

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First Published on November 1, 2016 5:25 am

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