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दुनिया मेरे आगे- अंधेरे में लौ की तलाश

आजकल तो ऐसी भविष्यवाणियों के आकलन कुछ नुस्खानुमा या फार्मूला आधार पर भी होने लगे हैं। बेशक ऐसे आकलनों पर ‘धूल में लट्ठ मारने’ या ‘हवा में लाठियां भांजने’ जैसी प्रतिक्रियाएं भी होती रहती हैं।
Author October 12, 2017 06:01 am
प्रतीकात्मक चित्र।

शुभू पटवा 

माना जाता है कि यह जो दृश्य जगत है, सामान्य रूप से वहीं तक हमारी दृष्टि सीमित होती है और जो हम देखते हैं, बस यही भर संसार है। पर यह भी धारणा है कि ज्ञान का संसार इससे इतर भी है और वह अदृश्य को भी देख सकता है। वह उसके बारे में अनुमान लगा सकता है और दिशाबोध मिल सकता है। वास्तविक रूप में वही व्यक्ति ज्ञानशील कहा जा सकता है और उसे बाहरी प्रकाश या भौतिक प्रकाश के सहारे की जरूरत नहीं होती। प्रश्न खड़ा हो सकता है कि तब क्या ऐसे व्यक्ति अंधेरे में भी देख सकते हैं! अगर इसे विनोद या व्यंग्य में न लिया जाए कि अंधेरे में तो ‘उल्लू’ देखते हैं तो इसका उत्तर ‘हां’ ही होगा। अंधेरे में देखना या अंधेरे को देखना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भविष्य के बारे में सही-सही अनुमान लगा लेना या जिसकी भविष्यवाणी सदा सत्य की कसौटी पर खरी ही उतरती है, क्या उसे अंधेरे में देखना या अंधेरे को देखने जैसा नहीं कहेंगे? राजनीति के क्षेत्र में ऐसी भविष्यवाणियों से हमारा साबका अक्सर पड़ता रहता है। हम यह भी सुनते रहते हैं कि इस तरह की भविष्यवाणियों के सच हो जाने पर ऐसे लोगों का मोल राजनीति के बाजार में काफी ऊंचा हो जाता है। आजकल तो ऐसी भविष्यवाणियों के आकलन कुछ नुस्खानुमा या फार्मूला आधार पर भी होने लगे हैं। बेशक ऐसे आकलनों पर ‘धूल में लट्ठ मारने’ या ‘हवा में लाठियां भांजने’ जैसी प्रतिक्रियाएं भी होती रहती हैं।

इस तरह के आकलन को सूचनाओं और कुछ आंकड़ों का रोचक तोड़-मरोड़ भी कह सकते हैं। ज्ञान के प्रवर्द्धमान स्तर की कोई ऐसी बात इन भविष्यवाणियों में परिलक्षित नहीं होती। हम सभी के पास जो दो बाह्य चक्षु हैं, वे दृश्यमान जगत को देखते हैं। हमारे इन बाह्य चक्षुओं को लेकर अक्सर समाज और राज में चिंता होती रहती है। बढ़ते हुए अंधेपन को लेकर विश्वव्यापी चिंता से भी हम अवगत हैं। लेकिन अंत:चक्षु के कपाट कैसे खुलें- ऐसी चर्चा करने वालों की संख्या बहुत कम है। अलबत्ता हर व्यक्ति के पास अंत:चक्षु भी होते हैं, पर इनकी पलकें कब और कैसे खुलें- यह एक सवाल है। तब यह सवाल यहां उठाया जा सकता है कि क्यों ‘अन्त:चक्षु’ या ‘ज्ञान-चक्षु’ हर किसी के खुल जाने जरूरी हैं? सवाल तो यह भी है कि हर किसी में यह हो जाना क्या संभव है?
बहरहाल, जिस विषमता से आज का समाज विगलित है और असमानता का अभिशाप जोंक की तरह से इस समाज की काया का खून चूस रहा है, विग्रह और वैमनस्य के कस जिसके कारण ढीले नहीं पड़ रहे हैं, उसके चलते ‘अंत:चक्षु क्यों खुल जाने जरूरी हैं!’

बेशक हर किसी के अंत:चक्षु खुल जाना संभव प्रतीत नहीं होता, पर इसकी जरूरत क्यों है- इसे समझना कठिन नहीं है। यहां यह भी स्पष्ट हो जाना जरूरी है कि प्रवर्द्धमान ज्ञान-चक्षु के पृथक-पृथक स्तर होते हैं। भगवान महावीर ने देखने के नजरिए पर दृष्टिपात करते हुए स्पष्ट किया है कि देखने के दो दृष्टिकोण होते हैं- व्यवहारनय की दृष्टि और दूसरी निश्चयनय की दृष्टि। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी भगवान महावीर के देखने की इन दो दृष्टियों का विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि ‘एक द्रव्यार्थिक दृष्टि है और एक पर्यायार्थिक दृष्टि। पर्याय की दृष्टि का अर्थ है व्यवहारनय। पर्याय बदलते रहते हैं, अवस्थाएं बदलती रहती हैं। व्यवहार भी सच्चाई है और निश्चय भी सच्चाई है। संसार का सबसे बड़ा झूठ है-एकांगी दृष्टिकोण।’ आचार्यश्री महाप्रज्ञजी कहते हैं- ‘महावीर ने दोनों में संगति बिठाई। दुनिया व्यवहार से चलती है। एक साधक का जीवन भी व्यवहार से ही चलता है।’

प्रवर्द्धमान ज्ञान-चक्षु प्राथमिक या लौकिक स्तर पर ऐसा संतुलन बिठाने में सहायक होते हैं। ऐसा संतुलन ही सामाजिक विषमता, विग्रह और वैमनस्य को कम कर सकता है। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी चक्षु की निर्मलता को समाज-परिवर्तन की पहली आवश्यकता मानते हैं। वे इसके लिए तीन सूत्र देते हैं- सत्य निष्ठा, शांतिपूर्ण जीवन और करुणा। वे ‘साधना’ को भी नया अर्थ देते हैं- दिशा-परिवर्तन। वे कहते हैं- ‘सिद्धांत हमें कहीं नहीं पहुंचा सकता। हमें प्रयोगों से गुजरना होगा। परिवर्तन के लिए सिद्धांत ही नहीं, प्रयोग की भी आवश्यकता है। हम सिद्धांत और प्रयोग दोनों का समन्वय कर दिशा-परिवर्तन कर सकते हैं।’ज्ञान का संसार बेशक दृश्य जगत से इतर है और हर किसी के लिए ज्ञान के उस सत्य को देख पाना मुमकिन प्रतीत नहीं होता, पर व्यवहारनय और निश्चयनय की दृष्टि को अगर हम समझ लें, सिद्धांत और प्रयोग के समन्वय को अपने मार्ग का आधार मान लें, तब हमें किसी बाहरी प्रकाश से अपना मार्ग प्रशस्त करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारे अंत:चक्षु ही अंधेरे में किसी प्रकाश की लौ को तलाश लेंगे। दिशा-परिवर्तन उसी लौ में से निकलेगा। हमें उस लौ को पकड़ने के प्रयोग करने चाहिए।

 

 

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