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दुनिया मेरे आगे- जिजीविषा के सहारे

कुदरत की गोद में हम सभी निर्मल आनंद प्राप्त करते हैं। प्रत्याशित खतरों का आभास भी नहीं होता। हमारा अस्त-व्यस्त और अफरातफरी से भरा जीवन, असमान सुविधाओं, नियमों और अनुशासन में जकड़ा पड़ा है।
Author June 28, 2017 04:33 am
कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान पहाड़ पर से गुजरते यात्री।

संतोष उत्सुक

पहले की तरह इस बार भी पहाड़ से वापस लौटते हुए अपने आप ही वहां हुए अनुभवों और अहसासों का विश्लेषण होता रहा। दिल ने दिमाग से कहा लौटने का तो मन नहीं करता। हरियाली हर ओर, खूबसूरत पहाड़ियां, शीतल नीले बर्फीले पानी में गर्म पानी के खौलते चश्मे और जून के महीने में रजाई में सोना। शहरों में क्या जीते हैं? बनावटी जिंदगी, यह न करो, वह हो जाएगा, वैसा न करो, ऐसा हो जाएगा। पहाड़ पर जिंदगी सिर्फ जीने के लिए क्या-क्या करना ही पड़ता है, मोबाइल से खींची तस्वीरें बार-बार दिखा रही थीं।
मजदूरी करती नेपाली मां की पीठ पर फटी शाल में बंधा बच्चा। पीठ ही उसका खेल मैदान है और दुनिया भी। जब तक थोड़ा आत्मनिर्भर नहीं हो जाता, उसे तब तक वहीं जीना है, क्योंकि मां को रसोई चलाने के लिए दिन भर पत्थर उठाने हैं। इस मां और बच्चे की दुनिया सीमित है। तारकोल के खाली ड्रमों की पतरों से बनी रसोई और रात को सोने के लिए आशियाना भी। कौन जाने कब पहाड़ दरक जाए या कोई और मुसीबत दस्तक दे बैठे। मगर दोनों खुश और बेफिक्र हैं, क्योंकि संभालने के लिए उनके पास ज्यादा कुछ नहीं है। सीधा कहें तो उनके पास सिर्फ जिंदगी है, जिसे उन्होंने संभालना और जीना है।

कुदरत की गोद में हम सभी निर्मल आनंद प्राप्त करते हैं। प्रत्याशित खतरों का आभास भी नहीं होता। हमारा अस्त-व्यस्त और अफरातफरी से भरा जीवन, असमान सुविधाओं, नियमों और अनुशासन में जकड़ा पड़ा है। हम छूटना चाहते हैं, मगर हमारी कार्यशैली, सामंतवादी समाज में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की जिद, बाहर महंगा खाना, ब्रांडेड कपड़े हर कहीं पार्क न हो सकने वाली गाड़ियां। फिर शानो-शौकत के लिए कई मकान लाजिमी माने जाने लगे हैं। हम आफती समाज में जिंदगी काट रहे हैं। कम्यूनिकेशन यानी संचार की जकड़ में रोजाना नए सेलफोन ईजाद हो रहे हैं।संप्रेषण की इस फैलती दुनिया में संवाद की दुनिया गर्क हो रही है। आपस में बातचीत पति-पत्नी की भी सीमित हो चली है। चौबीस घंटे उपलब्ध मनोरंजन ने अंधविश्वास और फूहड़ता फैलाने का जिम्मा ले रखा है। इन सबका मजा लेने वाले किसी भी किस्म की कीमत चुकाने को तैयार हैं। जिंदगी यात्रा न होकर, मेला नहीं भगदड़ हो चुकी है, जिसमें हम खुद को खोज रहे हैं। इस भगदड़ से चाह कर भी हम बाहर नहीं हो सकते। लेकिन कभी जब हम इस दुनिया से छिटक कर कुदरत की गोद में होते हैं तो आनंद की सोहबत में सब छूटता लगता है।

समाज में एक वर्ग के पास मनचाहा समय और धन है तो अनगिनत रास्ते भी हैं। दूसरों के पास सुविधाएं हैं, मगर ऐसे लोग भी हैं जो जिम्मेदारी की गिरफ्त में हैं। नौकरी की जगहों के हालात बहुत जटिल हो चुके हैं। वक्त है, लेकिन सुकून की खातिर या घूमने के लिए नहीं। जीवन शैली बताती है कि किसी की मृत्यु हो जाए तो जान-पहचान के लोग सोचने लगते हैं कि अब तो ‘वहां जाना पड़ेगा।’ सभी ने अपने लिए सुविधाजनक इलाके बना लिए हैं, मगर सुविधाओं के अंबार के नीचे सब दुविधा में हैं।दरअसल, हमारी कार्य संस्कृति ही ऐसी बन चुकी है। विमान में जब तक एअर होस्टेस सख्ती से न कहे, हम फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं। बाग में सुबह की सैर में भी हाथ से मोबाइल नहीं छूटता, परिवारिक यात्रा में व्यावसायिक चिंताएं चिपकी रहती हैं। अब तो मॉल ही वातानुकूलित बाग हो गए हैं। हम विदेश के नकलची हैं, जहां सप्ताह में पांच दिन काम होता है और फिर अंतिम दिन शाम होते ही सब मस्ती के फर्श पर उतर चुके होते हैं। क्या हम यह मान कर चलें कि वहां प्रतिस्पर्धा नहीं और वहां लोग अपने काम, अपने परिवार और देश से कम प्यार करते हैं? नहीं। दरअसल, वे जीवन के ऐसे सहज स्वानुशासित ढांचे में जीते हैं जहां हर व्यक्ति, कार्य और वस्तु की अहमियत है। इतना कुछ विकसित होने के बाद भी हमारी व्यवस्था ऐसी है कि हम शरीर को चिंताओं में जीवित रखते हैं और रोज मरते हैं। आदमी का दिल चाहता है ‘जीना’, मगर दिमाग जीने नहीं देता। प्रकृति के वरदान मानव जीवन को साल में कुछ दिन जी लेने की सुविधा मिलेगी या फिर जिंदगी की दुविधाएं ही जिंदगी से कहती रहेंगी, जिंदगी नहीं जीने के लिए। मुझे पता है, इस हाल में तो उस मां और बच्चे जैसी बेफिक्री हमारे जीवन में होनी संभव नहीं।

 

 

 

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