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दुनिया मेरे आगे- जिंदगी के घटते नंबर

उस अहसास के आधार पर सोचने को बदला भी है कई बार। क्योंकि सोचने और बात करने और जीने के बीच अगर कोई दूरी या खाई है तो कुछ तो गड़बड़ है! तो ऐसा ही मैंने परीक्षा शब्द के साथ करने की कोशिश की।
Author March 16, 2017 03:56 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतिभा कटियार

इम्तिहान सिर पर सवार हैं। लेकिन विद्यार्थियों के तो नहीं! फिर किसके सिर पर सवार हैं? मां-बाप, शिक्षकों, स्कूलों और नौकरी देने वालों के? किसके सिर पर सवार हैं ये, जबकि चिंता तो सबको है कि बच्चे परेशान न हों, समाज बेहतर बने। शिक्षा का मकसद सिर्फ रोजगार की ललक में इकट्ठा की गई डिग्री न हो। तो फिर झोल कहां हैं? क्यों हमारे बच्चे मार्च आते ही डरने लगते हैं और जून आते ही खुश हो जाते हैं? यह सवाल बराबर खाए जाता है, जैसे कई दूसरे तमाम सवाल खाए जाते हैं!  मैं जिस तरह सोचती हूं, उस तरह जीने की कोशिश करते हुए उसे महसूस करने का प्रयास भी करती हूं। उस अहसास के आधार पर सोचने को बदला भी है कई बार। क्योंकि सोचने और बात करने और जीने के बीच अगर कोई दूरी या खाई है तो कुछ तो गड़बड़ है! तो ऐसा ही मैंने परीक्षा शब्द के साथ करने की कोशिश की। मेरे भीतर जो डर ‘परीक्षा’ शब्द को लेकर बोए जा चुके थे, उनका मैं कुछ नहीं कर सकी। लेकिन यह प्रयास जरूर किया कि यह डर किसी और को न दूं। मैंने अपनी बेटी को कभी भी इस शब्द के घेरे में फंसने नहीं दिया। जब क्लास के सारे बच्चे और उनके अभिभावक घबराए होते हैं, तो मेरी बेटी मजे से खेल रही होती है। परीक्षा को मुंह चिढ़ाना उसे आता है। अगले दिन पेपर था, लेकिन खेलना और टीवी देखना कभी बंद नहीं हुआ। न सोने से पहले हमारा गप्प मारने का सिलसिला।

मुझे याद नहीं कि मैंने कभी भी उसे कहा हो पढ़ाई करने को। बस यह कहा कि ‘मजा न आए तो मत पढ़ना। और मजा आने में अगर कोई दिक्कत आए तो जरूर बताना।’ यह सिलसिला जारी है। लेकिन समाज घर में सीखे हुए को चुनौती देने को तैयार रहता है। उस दिन वह आठवीं क्लास का इम्तिहान देने गई। वैसे ही जैसे रोज जाती है। न कोई टीका, न दही-चीनी, न खास तरह से दिखने का लोभ कि दिन अच्छा बीते। ‘खूब मजे करो स्कूल में’- इस कामना के साथ रोज भेजती हूं। लेकिन सवाल इतना भर नहीं है।
अब कुछ सवाल उसके भी हैं। मैंने उसे परीक्षाओं से डरना नहीं सिखाया, लेकिन समाज परीक्षा नाम का डंडा लेकर पीछे पड़ा हुआ है। एक हौवा बना है चारों तरफ। बच्चे परेशान हैं, शिक्षक डरा रहे हैं, नौवीं में आओ तब पता चलेगा। परीक्षा अब उसकी अपनी क्लास में नहीं होती। अलग से बड़े हॉल में होती है। साथ में बैठे दोस्त अनजाने चेहरे बन जाते हैं। परीक्षा के दौरान आसपास अपने जाने-पहचाने शिक्षकों की जगह अनजान खड़ूस चेहरे टहलते हैं।मेरा उसे बचपन से यह समझाना कि ‘परीक्षाएं कुछ नहीं होतीं। यह भी रोज के जैसा एक दिन है, जिसका लुत्फ उठाओ’, धराशायी होने लगता है। वह पूरी हिम्मत और लगन से मेरी सीख को बचाने की कोशिश करती है, लेकिन कभी-कभी हारने लगती है। तब मुझसे लड़ती है, सवाल करती है- ‘क्यों इतना इम्तिहान का हौवा बना रखा है सब लोगों ने! जो आपने हमें सिखाया है, वही तो पूछना चाहते हैं न? कोई नया पूछने में तो दिलचस्पी है नहीं किसी की! तो पूछ लो न आराम से, इतना डराते क्यों हो?’ पेपर में सब आ रहा होता है। फिर भी काफी देर तो इस ‘खतरनाक’ माहौल से तालमेल बिठाने में लग जाती है। वह उदास हो जाती है। कहती है- ‘मां, मुझे परीक्षा से डर नहीं लगता, लेकिन परीक्षाओं के समय स्कूल जाने में मजा नहीं आता।’

एक रोज उसने बताया उसकी क्लास का एक बच्चा परीक्षा हॉल में डर के मारे बेहोश हो गया था। बहुत सारे बच्चों के पेट में दर्द होने लगता है, चक्कर आना, उलझन, घबराहट होना सामान्य बात है। बेटी कहती है कि मेरे सारे दोस्त इतने परेशान होते हैं परीक्षा के समय कि मुझे भी बुरा लगने लगता है। क्या परीक्षा शब्द का यह हौवा दूर नहीं कर सकते आप लोग? मेरी बोलती बंद हो जाती है।मुझे उन अभिभावकों के चेहरे याद आते हैं जो बच्चों के कम नंबर आने पर बुझ जाते हैं और बहुत अच्छे नंबर लाने के लिए शिक्षकों से कहते हैं- ‘आप मारिए या पीटिए इसे जितना चाहें, लेकिन नंबर कम नहीं आने चाहिए’ और जिनके लिए बच्चे का रिपोर्ट कार्ड उनका ‘स्टेट्स सिंबल’ है। वे अभिभावक भी याद आते हैं जिन्हें बच्चों को स्कूल भेजने का मतलब अच्छे नंबर से पास होना ही पता है।इस अच्छे नंबर के संसार पर बहुत सवाल हैं? रिपोर्ट कार्ड में अच्छे नंबर जमा करने के चक्कर में जिंदगी के रिपोर्ट कार्ड से नंबर लगातार कम किए जा रहे हैं! यह तो ठीक नहीं है न! हमारे बच्चे परेशान हैं… उन्हें इस नंबरों की होड़ से मुक्त कीजिए!

 

 

 

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