ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: डिजिटल भक्ति

इस जीवन के लिए शक्ति और अगले के लिए भक्ति का समन्वय हमारी देशज डिजिटल क्रांति की यूएसपी या अनूठी गुणवत्ता है।
भगवान शिव की तस्वीर

आज हमारे जीवन का हर पहलू डिजिटल क्रांति से प्रभावित है, लेकिन ठोस भौतिकता से ऊपर उठ कर अब आध्यात्मिक और भावनात्मक जगत पर भी इसका आच्छादन आश्चर्यजनक लगता है। इस जीवन के लिए शक्ति और अगले के लिए भक्ति का समन्वय हमारी देशज डिजिटल क्रांति की यूएसपी या अनूठी गुणवत्ता है। और क्यों न हो! कंप्यूटर विज्ञान से अध्यात्म और भक्ति का संबंध भले नया-नया जुड़ा हो, पर अंकगणित से उनकी रिश्तेदारी तो बहुत पुरानी है।
बचपन में दादी को सुमिरनी के मनके फेरते देख कर बहुत कौतूहल होता था।

उनके पास दो तीन सुमिरनियां थीं। जहां तक याद है, एक रुद्राक्ष की थी। एक अन्य से भीनी-भीनी सुगंध आती थी। शायद वह चंदन की लकड़ी की गुरियों से बनी थी। दादी की उंगलियां सुमिरनी फेरती जाती थीं, पर ध्यान खाना बनाने वाले महाराज के कार्यकलाप पर केंद्रित लगता था। उनकी सुमिरनी में सत्ताईस मनके थे, जिनमें अंतिम का नाम उन्होंने सुमेरु बताया था। मुझे जब गिनती आ गई तो दादी की सुमिरनी के मनके घुमा कर उसका अभ्यास करने की इच्छा होती थी। मगर उनकी पूजा के सामानों को हाथ लगाना आसान नहीं था। सुमिरनी पर गिनती गिनने की और उसके कुछ साल बाद उस पर सत्ताईस का पहाड़ा दुहराने की मेरी इच्छा अधूरी ही रही। आगे चल कर कबीर का दोहा पढ़ा- ‘माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर, कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर’। फिर क्या था! दादी को खिझा कर उनकी सुमिरिनी से न खेल पाने की भड़ास निकालने के लिए अच्छा मसाला मिल गया।

आगे चल कर पड़ोस में रहने वाले मौलवी साहब को जो माला फेरते देखा, उसका नाम उन्होंने तस्बीह बताया था। उनकी तस्बीह में तैंतीस-तैंतीस गुरियों के तीन भाग थे। कुल मिला कर निन्यानबे मनकों वाली तस्बीह को फेरते हुए वे खुदा के निन्यानबे नामों का जाप करते थे। माला की अंतिम गुरिया का नाम उन्होंने इमाम बताया था। जब मैंने मौलवी साहब को बड़े गर्व से बताया कि मेरी दादी के पास तो चंदन और रुद्राक्ष आदि की कई तरह की सुमिरनियां थीं, तो उन्होंने हंस कर बताया कि उनके वालिद भी हज करके लौटे थे तो अपने साथ ऊंट की हड्डी से बनी और खजूर के बीजों से बनी तस्बीहें ले आए थे। उनके पास एक तस्बीह कर्बला की मिट्टी को पका कर बनाए दोनों की थी तो दूसरी में कई तरह के रंग-बिरंगे कीमती पत्थर थे। खुदा को याद करना तो उनके बिना भी संभव था, पर कितनी बार याद किया, इसके गर्व की अनुभूति तो तस्बीह की अंकगणित ही देती थी। तस्बीह और सुमिरनी के आकर्षण से खिंच कर मैंने जानना चाहा कि क्या अन्य धर्मों में भी इतने ही हिसाब-किताब का प्रावधान है तो कैथोलिक ईसाई धर्म की रोजरी से परिचय हुआ। पता चला कि रोजरी एक दिए हुए क्रम में ‘द लाडर््स प्रेयर’, ‘हेल मेरी’ आदि कई प्रार्थनाएं गिन कर दुहराने में सहायक होती हैं।

इस जबानी हिसाब-किताब के बाद आगे चल कर स्टांप पेपर पर तो नहीं, लेकिन सादे पन्नों पर ‘राम’ का नाम बारंबार लिखने का एक सज्जन का उपक्रम देखा, जो अंधाधुंध तीर चलाने जैसा लगा। पता चला कि इन पन्नों पर लिखे हुए राम-नाम की गिनती काशी की एक संस्था में होती है, जो ‘रामनाम बैंक’ चलाती है। वहां बाकायदा उनके पन्नों पर लिखे हुए ‘राम-नाम’ गिन कर उनके खाते में जमा किए जाते हैं। अगर वह बैंक आज भी चल रहा है तो अब तक शायद कंप्यूटरीकृत भी हो चुका हो! हरित पर्यावरण के लिए पेड़ बचाने के विचार से कागजी कार्यवाही बंद हो चुकी होगी और नेट बैंकिंग में एंड्रॉयड फोन, लैपटॉप आदि पर ‘राम-नाम’ लिख कर भेजने की सुविधा भी होगी!

भक्ति प्रदर्शन का एक तरीका पोस्टकार्ड पर किसी देवी-देवता या संत का नाम लिख कर शृंखला बनाने का भी था। शृंखला जारी रखने वालों को लॉटरी खुल जाने का लालच और शृंखला भंग करने वालों को बर्बाद हो जाने की धमकी साथ-साथ मिलती थी। लेकिन यह तरीका बहुत सफल हुआ होता तो डाकखाने बंद होने के कगार पर नहीं खड़े होते। डिजिटल दुनिया में ऐसे पोस्टकार्डों का काम अब संचार उपकरणों ने संभाल लिया है।

डिजिटल दुनिया में भगवद्-भक्ति के कई नए आयाम खुल गए हैं। सोशल मीडिया पर चित्र गुहार लगा रहे हैं कि अगर सचमुच अमुक देवी, देवता, बाबा या फकीर के भक्त हो तो कम से कम एक बार ‘लाइक’ तो करके दिखाओ। शेयर करने वालों के हिस्से में पुण्य आता होगा! पवित्र संदेश को कितने लोगों ने ‘लाइक’ किया, कितनों ने ‘शेयर’ किया इसका हिसाब भी तुरंत हो जाता है। ईशभक्ति ही नहीं, अब तो देशभक्ति भी डिजिटल हो गई है। राष्ट्रध्वज से लेकर आतंकियों से लड़ने में हताहत सैनिकों की तस्वीरें तक ‘लाइक’ करके देशभक्ति का प्रमाण दीजिए या संदेश की उपेक्षा करके खुद को देशद्रोही कहवाइए! सब कुछ एक क्लिक पर निर्भर करता है!

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 4, 2016 6:05 am

  1. No Comments.