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दुनिया मेरे आगे: पूर्वग्रह के स्कूल

जातिसूचक गाली नत्थी करते हुए लगातार ऐसे बच्चों को शिक्षा की पगडंडी से खदेड़ा जाता रहा है।
प्रतिकात्मक तस्वीर।

सामान्य बोलचाल में अक्सर ऐसी बातें सुनने को मिल जाती हैं कि ‘ई ना पढ़ि’, यानी यह नहीं पढ़ेगा! हालांकि इस वाक्य में छिपा एक पूर्वग्रह साफ दिखाई देता है। हम पहले ही मान कर चल रहे हैं कि फलां बच्चा नहीं पढ़ेगा। बिना इसकी कोई गुंजाइश तलाशे कि अगर कोशिश की जाए यह बच्चा भी पढ़ सकता है। अमूमन यह वाक्य न केवल जेंडर, बल्कि जाति, वर्ग, धर्म आदि के प्रति हमारे दृष्टिकोण को भी सामने लाता है। शिक्षक, अभिभावक, प्रशासक भी इसी पूर्वग्रह को आधार बना कर तमाम प्रतिभावान बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में प्रवेश से वंचित कर देते हैं। पहली नजर में दिखाई देने वाली हकीकत दरअसल हमारे नागर समाज की सोच को भी जाहिर करती है। तुलसी राम के उपन्यास ‘मुर्दहिया’ को पढ़ें या फिर ओमप्रकाश वाल्मीकि के आत्मकथात्मक उपन्यास ‘जूठन’ को, तो उसमें यह हकीकत सामने आती है कि कैसे एक खास वर्ग के रूप में दलित बच्चों को स्कूल में पहले ही दिन हाथ में कलम पकड़ाने के बजाय झाडू पकड़ा दिया जाता है। अगर कभी कोई पूछता है तो शिक्षकों की ओर से बेधड़क कह दिया जाता है यह तो इस बच्चे का पुश्तैनी काम है। जातिसूचक गाली नत्थी करते हुए लगातार ऐसे बच्चों को शिक्षा की पगडंडी से खदेड़ा जाता रहा है।

हमारे नागर समाज द्वारा तैयार पाठ्य-पुस्तकें भी कई बार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ‘ई ना पढ़ि’ की अवधारणा को ही आगे बढ़ाती हैं। इस रोशनी में हम सरकार की नीतियों को देखने-समझने की कोशिश करें तो यह फांक साफ दिखाई देती है। ‘कमतर’, ‘कमजोर’ और ‘प्रतिभाशाली’ बच्चों आदि की श्रेणी में बांट कर हमने शिक्षा देने की वकालत भी शुरू कर दी है। साथ ही बाल मजदूरी कानून को शिक्षा के अधिकार कानून के बरक्स खड़ा कर हमने बच्चों की शिक्षा की तस्वीर को कमजोर ही किया है। एक ओर शिक्षा का अधिकार कानून देश के सभी बच्चों को पढ़ने का हक देता है, वहीं नया बाल मजदूरी कानून उसे कुचलने पर आमादा है। आंकड़े गवाह हैं कि आजादी के सत्तर साल बाद भी करीब अस्सी लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। वहीं जीएमआर और यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक अब भी पांच करोड़ से ज्यादा बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। ताज्जुब तो तब होता है जब स्कूल जाने वाले बच्चे महज रजिस्टर में दर्ज होते हैं, कैसी शिक्षा उन्हें मिल रही है इस पर हमारा कोई खास ध्यान नहीं होता। यही कारण है कि हमारे बच्चे कहने को छठी कक्षा में होते हैं, लेकिन उन्हें दूसरी या तीसरी कक्षा के गणित व विज्ञान की समझ नहीं होती। ये बच्चे हिंदी में सामान्य लिखे हुए वाक्यों को पढ़ या समझ नहीं पाते। यह स्थिति चिंताजनक है। इसमें कहीं न कहीं शिक्षक के साथ-साथ शिक्षण की विधियां भी कठघरे में खड़ी होती हैं।

सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जा रही हिंदी पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षक आमतौर पर महज पाठों का वाचन करके आगे बढ़ जाते हैं या फिर पाठ के अंत में दिए गए सवालों के उत्तर लिखवा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। हिंदी की कविता, कहानी आदि कैसे रोचक तरीके से पढ़ाई जाए, इस ओर उनका ध्यान कम जाता है। हिंदी की जमीन यहीं से कमजोर होनी शुरू हो जाती है जो आगे चल कर कॉलेज और विश्वविद्यालय में और खराब हो जाती है। बच्चों को खूब सारे अंक तो मिल जाते हैं लेकिन वे अभिव्यक्ति के स्तर पर पिछड़ने लगते हैं। न तो वे लिखने, बोलने और पढ़ने के कौशल में और न अपने विचारों को प्रकट करने में सक्षम हो पाते हैं। अगर शिक्षक पाठ्य-पुस्तकों के साथ अपने सृजनात्मक चिंतन और कल्पनाशीलता का इस्तमाल करें तो संभव है कि हिंदी शिक्षण ज्यादा रुचिपूर्ण और लाभकारी हो सकेगा। भाषाविदों और प्रशिक्षकों का मानना है कि हिंदी या किसी भी भाषा के शिक्षण में व्याख्यान के साथ गतिविधियों के जरिए पढ़ाया जाए तो वह ज्यादा कारगर होता है। बच्चे जितना दृश्य-श्रव्य सामग्री देखते और सुनते हैं, वह उनकी स्मृति में स्थायी हो जाती है। दिक्कत यह है कि सरकारी स्कूलों में ब्लैकबोर्ड को छोड़ अन्य सामग्री मुश्किल से मिलती है।

बच्चा अगर स्कूल पहुंच रहा है तो उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, इसके लिए विभिन्न आयोगों और समितियों ने संस्तुतियां दी हैं। लेकिन वे फाइलों में ही दबी हैं। एक ओर अभिभावक तो दूसरी ओर शिक्षक वर्ग भी है जो मान कर चलता है कि ये बच्चे नहीं पढ़ सकते… इन्हें तो अंत में रेहड़ी ही लगानी है… यह पढ़ कर क्या करेगा…! सारा संसार पढ़ेगा, बस कुछ खास बच्चे ही शिक्षा के स्वाद से अछूते रह जाएंगे। एक ओर समाज में पढ़ने-लिखने पर सरकारी स्तर पर काफी जोर दिया जा रहा है। वहीं बच्चों का एक बड़ा वर्ग वह भी है जो स्कूल और शिक्षा की देहरी पर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है।

 

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