December 05, 2016

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दुनिया मेरे आगे: मां का रुपया

मां के पास जमा ये पैसे हम भाई-बहनों को जरूरत के वक्त काम आते थे।

Author November 15, 2016 03:08 am
एक युवक 500 रुपये का नया नोट दिखाते हुए। (Source: ANI)

कई बार हम अपने रुपए-पैसे कहीं सुरक्षित जगह रख कर भूल जाते हैं, यह मानते हुए कि यह सड़ने-गलने की चीज तो है नहीं, आड़े वक्त में काम ही आएगी। भारतीय परिवारों की जो अर्थव्यवस्था रही है, उसमें आमतौर पर यह आदत महिलाओं में ज्यादा होती है। हाल ही में जब देश में पांच सौ और एक हजार के नोट का चलन रद्द होने की घोषणा की गई तो इसके तुरंत बाद मीडिया में दिखाया जाने लगा कि कैसे लोग अपने घरों में पांच सौ और एक हजार के नोटों को एक जगह इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि इन्हें नए नोटों से बदला जा सके। एक निजी चैनल पर दिखाए गए शो में स्त्रीधन के बारे में चर्चा हो रही थी कि कैसे महिलाएं अपने घर के खर्चों में से कटौती कर या उन्हें शगुन के तौर पर मिले रुपए को कई महीने तक जमा करके रखती हैं और आखिरकार उसका उपयोग घर में अचानक कोई संकट खड़ा होने पर होता है। यह अद्भुत है कि भारत के लगभग हर हिस्से में इस तरह की आदतें मिलती हैं। इस बचत के नाम अलग-अलग हो सकते हैं।

इस दौरान मुझे अपना बचपन याद आ गया, जब घर में कमाने वाले एकमात्र व्यक्ति बाबूजी थे। तब उस छोटे शहर के एक निजी विद्यालय की फीस भी हमारे परिवार पर भारी पड़ती थी। मैं अमूमन हर बार फीस महीने की आखिरी तारीख को ‘लेट फाइन’ (तय तारीख के बाद जमा करने पर लगने वाला आर्थिक दंड) के साथ जमा करता था। महीने के अंत में फीस देने की चिंता हमेशा बनी रहती थी, लेकिन इसके साथ-साथ मन आश्वस्त भी रहता था कि मां कहीं न कहीं से फीस के पास मुझे दे देगी। मां हमेशा घर खर्चों में से काट कर कुछ हमेशा बचा कर रखती थी, जैसा आम भारतीय घरों में होता हैं। बाबूजी को शायद यह पता रहा होगा, लेकिन यह पता नहीं रहता था कि मां के पास कितने जमा हैं। लेकिन भारत में ऐसे बहुत घर मिल जाएंगे, जहां घर की महिलाओं के पास जमा धन की जानकारी मर्दों को नहीं होती है। दरअसल, अगर इस बात की जानकारी घर के मर्दों को हो जाती है कि घर की किसी महिला ने कुछ पैसे जमा कर रखे हैं तो वह जमा धन महिलाओं के हाथ से निकल जाने का खतरा हमेशा बना रहता है।

बहरहाल, मां के पास जमा ये पैसे हम भाई-बहनों को जरूरत के वक्त काम आते थे। शायद मां के पास इकट्ठा यह पूंजी कम से कम महीने के अंत तक ही सही, स्कूल की फीस जमा हो जाने की गारंटी तो देती ही थी? अब जब घोषणा हुई कि पांच सौ और हजार के नोट का चलन रद्द हो गया है तो मां के पास पांच सौ और हजार के नोट बहुत नहीं मिले। इसकी वजह यह है कि अब हम सब कमाने लगे हैं और अपनी जरूरतें आसानी से पूरी कर लेते हैं। लेकिन वर्षों पहले जो मेरे घर की स्थिति थी, वैसी ही स्थिति आज देश के लाखों घरों की होगी और इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन घरों में भी पढ़ने वाले बच्चों की फीस उनकी मां के पास इकट्ठा रुपए से ही जमा होती होगी।

अब चूंकि निजी विद्यालयों की फीस छोटे शहरों और कस्बों में भी पहले से ज्यादा है और रुपए का अवमूल्यन भी हुआ है तो निश्चित तौर पर मां, नानी-दादी और चाची के पास जमा धन बड़े नोटों की शक्ल में ही होगा। यह एक मानवीय सोच है कि जो धन नजर से दूर रहता है, उसका उपयोग हम संकट के समय ही करते हैं। अब इन नोटों का चलन रद्द होने की घोषणा के बाद घर की महिलाओं के पास इन रुपयों की शक्ल में जमा धन नए नोटों में बदलने के बाद उनके पास न रहने की ही संभावाना ज्यादा है। लेकिन एक बात तो तय है इस स्त्रीधन के सार्वजनिक होने से इन रुपयों के संकट के समय बचे रहने की संभावना कम हो जाएगी और मां और अन्य महिलाओं के पास एक जो आत्मविश्वास रहता था कि अगर कभी घर में कोई आर्थिक संकट आया तो वे उसे संभाल लेंगी, उसमें कमी आएगी। अब सवाल पढ़ रहे बच्चों की स्कूल फीस और उनकी छोटी-मोटी जरूरत को लेकर है, जिनके पिता कई बार आर्थिक परेशानी के चलते समय पर नहीं दे पाते होंगे। लेकिन अब तो मां की जमा पूंजी भी मां के पास नहीं रही।मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि मां ने घर के खर्च में कटौती करके जो भी पैसे बचाए थे, वे उन्होंने किसी भी हाल में अपने लिए नहीं बचाए थे…!

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First Published on November 15, 2016 3:08 am

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