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दुनिया मेरे आगे- आधुनिकता और स्त्री

स्त्री का संघर्ष ज्यादा बड़ा है। हमारा समाज कहता तो है कि आज की नारी पूरी तरह आजाद है लेकिन यह सिर्फ एक बड़बोलापन है। सामाजिक संरचनाओं में भीतर तक पैठी पितृसत्ता के खिलाफ कुछ महिलाओं ने मोर्चा खोला तो है, लेकिन यह तादाद बहुत कम है।
Author October 5, 2017 00:55 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

शशि पांडेय 

जब भी सार्वजनिक जगहों पर कोई महिला आधुनिक ढंग के कपड़े पहने दिखती है, लोग उसे घूरने-निहारने से लेकर छींटाकशी तक करने लगते हैं। कितने लोग तो मुड़-मुड़ कर भी देखते हैं। ऐसे लोग भी देखते हुए दिखते हैं जो खुद को सभ्य और नफीस मानते हैं। कुछ को तो मर्यादा और भारतीय संस्कृति ही खतरे में दिखाई देने लगती है और ऐसे लोग तो किसी न किसी बहाने सलाह ही दे डालते हैं। सच पूछो तो हमारी आधुनिकता का बोध एक ढोंग है। ज्यादातर लोगों के लिए आधुनिकता एक कोरा लबादा है। ऐसी मानसिकता समाज के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। पुरुष प्रधान समाज में इस बीमार मानसिकता की वजह से आए दिन महिलाएं निशाना बनती हैं।

लेकिन यह भी देखने में आ रहा है कि अब महिलाएं खुद को तेजी से बदल रही हैं। वे पुरानी बेड़ियों को तोड़ रही हैं। किसी भी समाज की पहचान इस बात से होती है कि उसमें महिलाओं का स्थान क्या है। आंकड़े बताते हैं कि अपने देश में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। ये आंकड़े भी हम न देखें तो भी अपने आसपास होने वाले अपराधों से सच्चाई सामने दिखती है। यह शर्मनाक होने के साथ-साथ बेहद भयावह भी है। कितने ही कानून बना दिए जाएं जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा।

अक्सर लोगों को बोलते हुए सुनती हूं कि क्या महिलाओं को आजादी कपड़ों के स्तर पर ही चाहिए? क्या समानता और बराबरी आधुनिक कपड़े पहनने से ही आती है? जिस सामाजिक प्राणी को कहीं जाने-आने, अपने मनमुताबिक कपड़े पहनने या अपने मन की सोचने का अधिकार न हो उसके लिए समानता की बातें बेमानी हैं। समाज में मर्यादाएं जरूरी हैं, लेकिन उन्हें एक जैसा होना चाहिए। यह नहीं चलेगा कि महिलाओं के लिए मानदंड अलग हो और पुरुषों के लिए अलग। पुरुष वर्ग तो बड़े आराम से कहीं भी आता-जाता घूमता-फिरता है। वह सारे काम अपनी मर्जी से करता है। लेकिन क्या महिलाएं ऐसा कर सकती हैं। रात को छोड़िए, वे तो दिन में घर से बाहर निकलते हुए डरती हैं। एक बार एक लड़के-लड़कियों का एक समूह पिकनिक पर गया था। एक जगह तालाब दिखा, जितने लड़के थे उन्होंने कपड़े उतारे और तालाब में जाकर नहाने लगे, तैरने लगे और मौज-मस्ती करने लगे। साथ में गई लड़कियां बेचारी मन मसोस कर रह गर्इं। अगर वे ऐसा करतीं तो निश्चित रूप से उन्हें भला-बुरा कहा जाता। इसीलिए मेरा मानना है कि जब तक सोच नहीं बदलेगी तब तक कुछ नहीं बदलेगा।

स्त्री का संघर्ष ज्यादा बड़ा है। हमारा समाज कहता तो है कि आज की नारी पूरी तरह आजाद है लेकिन यह सिर्फ एक बड़बोलापन है। सामाजिक संरचनाओं में भीतर तक पैठी पितृसत्ता के खिलाफ कुछ महिलाओं ने मोर्चा खोला तो है, लेकिन यह तादाद बहुत कम है। जरूरी है कि स्त्री अपना स्वतंत्र व्यक्त्वि गढ़े और उसे कायम रखे । अपने रिश्ते, अपने रास्ते, अपने कपड़े तय करने का अधिकार उसका और सिर्फ उसी का होना चाहिए। लेकिन महिलाओं को सतर्क भी रहना होगा कि आधुनिकता के नाम पर वे खुद बहक न जाएं। सच है कि उसका रास्ता कठिन है, लेकिन तय भी उसे ही करना है। स्त्री को बराबरी के लिए पहली लड़ाई अपने घर में लड़नी होगी। घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि पुरुष हर समय स्त्री का शासक न बना रहे। महिलाओं को वे हर संभव प्रयास करने होंगे, जिससे सही परिप्रेक्ष्य में आधुनिकता को पहचाना जा सके और धारण किया जा सके। देखा गया है कि शहरों में तो महिलाएं कुछ हद अपने अनुसार जीवन जी भी लेती हैं लेकिन देहातों में स्थिति अभी भी बहुत विषम बनी हुई है।

असल में समाज में हो रहे बदलाव को कुछ पुरुष पचा नहीं पा रहे और स्त्री के खुलेपन से उन्हें खीझ और कुंठा पैदा हो रही है। अपनी इस चिढ़ को वे स्त्री पर घिनौने तरह से थोप रहे हैं। पुरुष की मानसिकता बदलने की कोई पूर्व तैयारी हमारे समाज में नहीं हुई, न तो उसकी परवरिश ऐसी हो रही है और न ही शिक्षा-दीक्षा में बदलाव किया जा रहा है। लेकिन लाख टके की बात है कि सामाजिक कलेवर बदल रहा है और उसका बदलना अपरिहार्य है। जब बात समानता की हो तो पुरुष स्त्री को अपने पीछे ही खड़ा देखना चाहता है। जबकि पुरुषों को भी यह समझना चाहिए कि उसके कंधे से कंधा मिला कर चलने वाली स्त्री सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि पुरुष के लिए भी ज्यादा सहायक होगी। एक शक्तिशाली स्त्री ही एक शक्तिशाली पुरुष की सहचर हो सकती है। इसलिए भी महिलाओं का सबलीकरण आवश्यक है।महिलाओं की आजादी पुरुष वर्चस्व के खिलाफ एक विद्रोह भी है। महिलाओं को इसे समझना होगा। वह किस तरह इस पथ पर आगे बढेÞ,इसकी तैयारी जरूरी है। उसे अपना अस्तित्व भी बचाना है और सामाजिक तानाबाना भी। आधुनिक महिला को आगे बढ़ना है लेकिन उसे बाजारवाद से भी सावधान रहना होगा। महिलाएं नकारात्मक प्रभाव और पुरुषों के दुर्गणों और कमियों से बचकर अपना आसमान पा सकती हैं। ऐसा मेरा मानना है। यह धारणा नारीत्व के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

 

 

 

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