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मौसम की आहट

कैसी बारिश होगी, गरमियों में अधिकतम तापमान क्या होगा, पहाड़ों की बर्फ किस गति से पिघलेगी, कितना ठिठुरेंगे मैदानी रहवासी सर्दियों के मौसम में, तटीय क्षेत्रों में समुद्री तूफानों का मिजाज कैसा रहेगा आदि।
Author May 10, 2017 05:17 am
तस्वीर का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया गया है।

एकता कानूनगो बक्षी 

मौसम के बारे में यों तो सरकारी विभाग और वेधशालाएं सूचनाएं उपलब्ध कराते हैं। कैसी बारिश होगी, गरमियों में अधिकतम तापमान क्या होगा, पहाड़ों की बर्फ किस गति से पिघलेगी, कितना ठिठुरेंगे मैदानी रहवासी सर्दियों के मौसम में, तटीय क्षेत्रों में समुद्री तूफानों का मिजाज कैसा रहेगा आदि। लेकिन मैं जो बात करना चाह रही हूं, वह इससे थोड़ी अलग है। तमाम जानकारियों और सूचनाओं के बावजूद अनेक धरती-पुत्र मौसमों से जूझते रहते हैं। मौसम की सूचनाएं और अनुमान भी कई मर्तबा गलत साबित हो जाते हैं।
अक्सर सोचती हूं कि मौसम के मिजाज और परिवर्तन का शुरुआती अनुमान किस तरह इन खास लोगों को होता होगा, जिनके रोम-रोम में प्रकृति की खुशबू बसी होती है। किसे सबसे पहले नए मौसम के आगमन की आहट सुनाई देती होगी? हालांकि वैज्ञानिकों की पैनी नजर हमेशा जुटी रहती है अपने यंत्रों से अनुमान लगाने की। फिर भी एक आम आदमी की अपनी समझ भी जरूर होती है, जिससे वह प्रकृति के बदलते स्वरूप का अंदाजा लगा लेता है और अपने जीवन और अपने आपको तैयार करने में जुट जाता है। दूरदराज के गांवों में मौसम की जानकारी टीवी चैनल और रेडियो के माध्यम से मिले, उससे पहले ही वहां के रहवासी मौसम के मिजाज का अनुमान लगा लेते हैं। तभी तो बारिश के आने से पहले घर के बच्चे दौड़ कर छत से सारे सूखे कपड़े उठा लाते हैं। दूर से आ रही मिट्टी की सोंधी खुशबू भी संदेश पहुंचा देती है कि बस अब बरखा बहार आने ही को है।

कुछ लोगों का तो जीवन ही पूरी तरह मौसम के बदलाव पर निर्भर करता है। मौसम के बदलाव का पूर्वानुमान उनके सुख-दुख, उत्साह, जन्म, मृत्यु, त्योहार, उत्सव आदि का निर्धारण और रणनीति बनाने में बहुत मदद करता है। गरमी की भनक सबसे पहले शायद उस मजदूर या किसान को मिलती होगी जो भरी धूप में रोज की तरह अपने जीवनयापन के लिए कुछ रुपए जोड़ने की कोशिश में लगा होगा। जनवरी और फरवरी की दिलकश धूप से अचानक परिवर्तित अग्नि की लपटों को उसी के शरीर ने महसूस किया होगा। पसीने का पहला रेला उसके सिर से बह कर गुजरता होगा, तभी उसने अनुमान लगा लिया होगा कि इस बार गरमी का पारा ज्यादा कूद लगाएगा या आने वाले दिन और भी भारी रहने वाले होंगे। जब किसान की आंखें अपनी फसल को आंसू बहाते बेहाल देखती होंगी, उसके माथे पर खिंच आई चिंता की लकीरें गुजरी हुई कई ऋतुओं की कहानी बयान कर देती होंगी।हरेक मौसम अपने आप में रोमांचक होता है। गरमी हो, बारिश हो या फिर कंपकंपाता शीतकाल, जायकेदार खाने-पीने के इंतजार में भी पूर्वानुमान बड़ी मदद करता है। बरसात की आहट से स्वादिष्ट पकौड़ियों के लिए तेल-बेसन आदि की व्यवस्था, ठंड के दिनों में गरमागरम गरिष्ठ भोजन का आनंद केवल इसी मौसम में आता है। कई तरह की सब्जियों की उपलब्धता और पाचन शक्ति भी दुरुस्त रहती है इस मौसम में। गोंद, मेथी दाना और दालों के लड्डुओं की खास तैयारियां होने लगती हैं हमारे घरों में। रजाई में दुबके रहने का प्यारा मौसम। लेकिन सड़क पर सोए उन लोगों को शायद सबसे पहले अहसास होता होगा शीतकाल का, जब रात की कड़ाके की ठंड में उनका साथी हमेशा के लिए ऋतुओं के नियमित चक्र से बहुत दूर चला जाता है।

मौसम के तेवर का पूर्व अनुमान लगाने की जरूरत तो उनको भी होती है जिनके घर की छत टपकती है या जिनके सिर पर छत ही नहीं होती। अल्पवर्षा और अतिवर्षा जैसे शब्दों का जिक्र अक्सर बारिश के मौसम में ही सुनने-पढ़ने में आता है, लेकिन कुछ के लिए तो जरा-सी बारिश ही दुखों की बाढ़ लेकर आ जाती है। प्रकृति के नियमों को बिना विचारे बनाई गई विकास योजनाओं में अच्छी माली हालत वाले लोगों को भी इसकी चपेट में आने से कोई पूर्व अनुमान भी नहीं बचा सकता है।विज्ञान की देन से आज हम काफी हद तक आने वाले मौसम के बारे में पहले से सचेत भी हो जाते हैं। प्रकृति के अपने नियम और परंपराएं होती हैं। हम उसके नियमों को तोड़ कर अपने स्वार्थ सिद्ध करने लगे हैं। इसके परिणाम भी भुगतने को विवश हैं। नदी में बाढ़, भूकम्प, तेज बारिश, ओलावृष्टि, बादल फटना, भूस्खलन, बिजली गिरना आदि कई अन्य प्राकृतिक आपदाओं से हर वर्ष हजारों लोगों की जान चली जाती है। बाद में हजारों लोग इस प्राकृतिक आपदा से उपजी बीमारियों से मर जाते हैं। आखिर हम क्यों नहीं विपदा आने के पहले से ही बेहतर तैयारी कर पाते हैं। अक्सर प्राकृतिक आपदाओं के घट जाने के बाद उनके बारे में सोचने लगते हैं। मन को विचलित करने वाली अनेक तस्वीरें सामने आने लगती हैं। सहानुभूति और आत्मग्लानि से भरे शब्द सुनाई देने लगते हैं। हर बार की यही कहानी है। कुछ आपदाओं के होने को हम रोक नहीं सकते लेकिन उन पर नियंत्रण जरूर कर सकते हैं।

 

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First Published on May 10, 2017 5:13 am

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