June 23, 2017

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हिंसा का मानस

पूरे विश्व में हिंसा और अहिंसा की नई मानवीय प्रवृत्ति पर तीखी बहस चल रही है।

Author April 20, 2017 02:11 am
चित्र का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (File Pic)

कृष्ण कुमार रत्तू

समय के साथ मानवीय व्यवहार में भी बदलाव आ रहा है। तेजी से बदलते सामाजिक मूल्यों और बाजार का असर समाज में दिखाई दे रहा है। इन दिनों हिंसा और अहिंसा में बहुत कम अंतर रह गया है। पूरे विश्व में हिंसा और अहिंसा की नई मानवीय प्रवृत्ति पर तीखी बहस चल रही है। आज हिंसा के दो रूप हमारे सामने हैं। एक नितांत क्रूरता का व्यवहार और दूसरा मानवीय सरोकारों की अवहेलना युक्त हिंसा का चेहरा। अहिंसा का एक पहलू यह भी है कि आप शांतिमय और सौहार्दपूर्ण माहौल में इस समाज की बेहतरी के लिए अपनी रचनात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत रह कर व्यक्तित्व और समाज के स्तर पर नए सृजन की ओर जिंदगी को आगे बढ़ाते रहें। भारतीय राजनीति में राजनेताओं के बयान आजकल कुछ इसी तरह दिखाई दे रहे हैं। हमारी जिंदगी की खुशियों का यह सिलसिला इस तरह से है कि यहां चिंतक जिम रॉन का यह विचार याद आता है- ‘खुशी ऐसी चीज नहीं है, जिसे आप भविष्य के लिए स्थगित कर सकते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि वर्तमान में खुशियों में जीना सीखें।’ अब इस बदलते समाज में लोग जीवन की इस खुशी के साथ-साथ हिंसा और अहिंसा का व्यापार करने लगे हैं। हमारे समाज में ऐसे बहुत सारे उदाहरणों को देखा जा सकता है, जब लगता है कि हिंसा अहिंसा के इस शोर के बहाने लोग हमारी खुशियों को छीनने का प्रयास कर रहे हैं या फिर उनमें खुशी के तत्त्व को क्षीण कर रहे हैं। हम विभिन्न समाजों के परंपरावादी भारतीय लोग इस सब कुछ को देखते-समझते, सहते हुए जिंदगी बसर कर रहे हैं। या यों कहा जाए कि जीने के जुगाड़ में बस जीए जा रहे हैं। अब ऐसी स्थिति है। लेकिन आखिर कौन-सी दुनिया हमारे आगे किस तरह के नए भविष्य को संजो कर रखती है।

दरअसल, पिछले एक दशक में नई उपभोक्तावादी संस्कृति के साथ नई बाजार परंपरा का एक नवधनाढ्य वर्ग इस समाज में पैदा हो गया है। कितनी ही श्रेणीगत विडंबनाओं से भरे हुए इस समाज में देश के आखिरी आम आदमी का स्थान अब कहां है? इस समय देश के गांव बदल रहे हैं, लेकिन कुछ गांव तो खंडहरों में और सन्नाटे के दृश्य से और भी डरावने होते गए हैं। लोग गांव छोड़ कर शहर का वह हिसा बन रहे हैं, जो हिंसा का भाग हो गया है। कुछ गांव संपन्नता के साथ बड़े शहरों का हिस्सा बन गए हैं। हमारे शहरों और गांवों का एक बड़ा वर्ग इस ग्लैमर की दुनिया और पाश्चात्य सभ्यता के कारण अपनी पहचान का यथार्थ खो चुका है।सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इस मीडिया, साइबर और डिजिटल क्रांति के उदय के कारण समाज में हिंसा की प्रवृत्ति को हमारी युवा पीढ़ी ने जिस तरह से अपनाया है, वह अब भयावह स्थिति में पहुंच चुकी है। जिन वजहों से हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं, वे किसी भी सभ्य समाज को अफसोस में डाल देने वाली हैं। राजस्थान, बंगाल से लेकर पंजाब और कश्मीर तक युवक आज मादक पदार्थों के साथ-साथ अन्य कुरीतियों को अपनाते हुए हिंसा के अनेक रास्तों पर चलते हुए एक ऐसे दलदल में फंसे हुए समाज की रहनुमाई करते हैं कि वहां बुद्ध, महावीर और नानक से लेकर सारे पीर-फकीर और समाज चिंतकों के साथ गांधी के अहिंसा के प्रयोग से संबंधित विचार भी असफल होते दिख रहे हैं। सवाल है कि बंदूक, गैंगस्टर और आतंकी माफिया का यह नया माहौल किस नए भारतीय समाज का सृजन कर रहा है।

कुछ समय पहले की कुछ घटनाएं दिल दहलाने वाली हैं, जिनमें पंजाब के लुधियाना में एक पंद्रह साल के युवक ने नौ वर्ष के बच्चे की हत्या करके उसके दिल को स्कूल के मैदान में फेंक दिया था। छोटी-सी बात पर छीना-झपटी और मरने-मारने की बातें और आक्रामकता के साथ बेलगाम तरीके से गुस्सा हो जाना किस नए समाज की बेचारगी को दिखाता है। नवसंस्कृति की बढ़ती हुई चकाचौंध और तेज-तर्रार जिंदगी ने हमारी सारी खुशियों की तहजीब को नजर लगा दी है।लेकिन क्या हम यह भूल जाएं कि अहिंसा का रास्ता सौहार्द, समरसता और खुशियों की यात्रा है। हमारे गांवों और नए शहरों के चाल-चलन और चरित्र को ‘भारत’ और ‘न्यू इंडिया’ में बांट दिया गया है। ‘डिजिटल इंडिया’ के बहाने असल में खुशियां देने वाला देश अब किस तरह से हिंसा और अहिंसा के बीच बंटता जा रहा है, यह सोचने-समझने और परखने का वक्त है। क्या आप इन दिनों ऐसे माहौल में किसी के चेहरे की मुस्कान को लौटाते हुए और खुद अहिंसावादी रहते हुए इस देश की नई पहचान के भागीदार हो सकते हैं? यह प्रश्न मैं अपने साथ सबके लिए भी बाकी छोड़ता हूं!.

 

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First Published on April 20, 2017 2:11 am

  1. D
    dev
    May 1, 2017 at 11:17 am
    Kab tak western sabhyta ko koste rahoge, kami hamari sabhyata me hai , na ki unki, vo log to developed ho chuke hai!
    Reply
    सबरंग