December 08, 2016

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दुनिया मेरे आगे: भरोसे का जोखिम

हम लोग पहले ही भूख से परेशान थे, सो टूट पड़ने की तरह अपनी जरूरत के मुताबिक खाना खाने लगे। सुनील मिश्र का लेख।

Author October 25, 2016 03:12 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

सुनील मिश्र

हमारे आसपास धीरे-धीरे संवेदनशीलता में लगातार कमी होते जाना कई तरह से सामने आता रहता है। कई बार इसका भुक्तभोगी होने के बावजूद हम खुद भी इसी मानस का शिकार होते हैं। छठे दशक में आई मेहबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ इस बात का संकेत देती है कि देश के स्वतंत्र होने के एक दशक में ही ऐसा वातावरण बनने लगा था, जब लोग अपने आसपास, पड़ोस और अपने ही संसार में लोगों को त्रासद स्थिति में लाने के साथ-साथ उनका शोषण और उन पर अत्याचार करने में जुट गए थे। लेकिन इधर हम संवेदनहीनता को अलग-अलग परिस्थितियों में देख रहे हैं। कई बार हमें अपने आसपास कोई नितांत अपरिचित लेकिन अच्छा व्यक्ति बन कर मिलता है तो कई बार कोई अपना ही निहायत शत्रुतापूर्ण या पराएपन के साथ। जीवन के अनुभव यानी सच्चे किस्से अनेक हैं, हर एक के पास एक न एक अनुभव है।

कुछ समय पहले उज्जैन से गुजरते हुए रास्ते में खाना खाने के लिए एक प्रसिद्ध ढाबे में रुका। थोड़ी देर में बैरे ने खाना लाकर रख दिया। हम लोग पहले ही भूख से परेशान थे, सो टूट पड़ने की तरह अपनी जरूरत के मुताबिक खाना खाने लगे। सबकी थालियों के बीच बाल्टी-सी कटोरी में अरहर की दाल भी थी। जब से अरहर की दाल पहाड़तोड़ भाव से विभूषित हुई है, तब से मैं उसका एक-एक दाना खा जाना चाहता हूं और उसका एक रत्ती भी बर्बाद करने में मेरा जी रोता है। तो मैंने कटोरी में बची हुई दाल में चम्मच घुमाया तो लगभग आधा इंच आकार का तिलचट्टा दिख गया। अचानक मुझे अजीब-सा लगने लगा। इसी में से कुछ दाल मैं पहले खा चुका था, इसलिए उबकाई-सी महसूस होने लगी। मैंने तुरंत बैरे को बुलाया और धीमी आवाज में कहा कि ये क्या लापरवाही है। क्या आप लोग अपने किचेन में तिलचट्टे के साथ दाल बनाते हैं?

वह बैरा बेचारा क्या करता! वह तो सिर्फ थाली-कटोरी मेज पर रखने की ड्यूटी पर था। जिम्मेदार तो सबसे पहले होटल प्रबंधन, मालिक और फिर खाना बनाने वाले थे। मैंने वह तिलचट्टे वाली दाल बैरे को पकड़ाई और कहा कि जाओ, भीतर दिखा कर आओ और अपने मैनेजर को भी बताओ। मैंने गुस्से में यह भी कहा कि मैं इस खाने के एक भी पैसे नहीं दूंगा। इसके बाद परिवार के साथ मैं उठ कर चल पड़ा। यह मेरी सभ्यता ही थी कि हंगामा खड़ा करके मैंने अन्य ग्राहकों को भी सचेत नहीं किया, वरना बात बढ़ जाती।

इस बीच ढाबे का मालिक सामने आया और उसने कहा कि यह गलती हो गई है और मैं आपसे इस बात के लिए माफी चाहता हूं। लेकिन आप यह ठीक नहीं कर रहे हैं कि बिना पैसे दिए ही चले जा रहे हैं। मुझे उसकी बात पर गुस्सा आया। कायदे से इस पर किसी को इसके खिलाफ शिकायत दर्ज करके होटल मालिक के खिलाफ कार्रवाई करने की अर्जी लगानी चाहिए थी। लेकिन मैंने इतना ही कहा कि पैसे दे देना कोई मुश्किल काम नहीं है, लेकिन मैं यह पैसे इसलिए नहीं दे रहा हूं कि आप लोग इस बात से सबक लें। लोग कितने विश्वास भाव के साथ अपनी भूख मिटाने आते हैं और उनके साथ ऐसा हादसा होता है तो यह उस विश्वास पर चोट पहुंचाना है।

इस तरह की घटनाओं की खबरें अक्सर समाचार माध्यमों में आती रहती हैं। कई बार पुलिस के पास भी मामला जाता है। लेकिन फिर सब कुछ पहले की तरह चलने लगता है। यों खानपान की जगहें मनुष्य की जानमाल से जुड़े होते हैं। अगर कोई व्यक्ति खाने में मिला कीड़ा धोखे से खा जाता है तो यह उसकी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है, उसकी जान तक जा सकती है। संभव है कि खाने के तुरंत बाद उसके विष की प्रतिक्रिया शरीर पर नहीं हो और बाद में इसका असर जानलेवा बन जाए। लेकिन मुश्किल यह है कि बाद में की गई शिकायत को न तो जिम्मेदार व्यक्ति या होटल और न ही प्रशासन मानने के लिए तैयार होता है कि खतरे की वजह वही भोजन बनी।

हम सब ऐसी खबरों से रूबरू होते हैं कि किसी सामूहिक भोज, घरों में या स्कूल के दोपहर के भोजन में गिरगिट या किसी दूसरे कीड़े के गिरने से वह खाना दूषित हो गया और उसे खाने वाले बच्चे या बड़े बीमार पड़ गए। ऐसे उदाहरण आम हैं जिनमें पर्यटन के दौरान किसी अच्छे दिखने वाले होटल में लोग भरोसा करके जाते हैं। लेकिन वहां खाने-पीने से लेकर बाकी सुविधाएं इस कदर खराब होती हैं कि मन बहुत निराश होता है। इस तरह मनमानी पर कहीं कोई निगरानी नहीं होती। इसका खमियाजा वहां से गुजरते हुए मजबूरी में पेट की भूख बुझाने जाने वाले साधारण नागरिक को भुगतना पड़ता है।

 

 

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First Published on October 25, 2016 2:42 am

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