May 30, 2017

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दुनिया मेरे आगे: किसकी नदी

हमें वर्षा जल संग्रहण और तालाबों, झीलों के निर्माण और रखरखाव की ओर अपरिहार्य तौर पर ध्यान देने की जरूरत है। घनश्याम कुमार देवांश का लेख।

Author नई दिल्ली | October 10, 2016 05:00 am
ब्रह्मपुत्र नदी की फाइल फोटो (स्रोत-यूट्यूब)

घनश्याम कुमार देवांश

महाभारत में एक रोचक प्रसंग है। गंगा और शांतनु के बीच संबंध विच्छेद हो जाने के बाद गंगा अपने पुत्र देवव्रत को अपने साथ ले गई थीं। कई वर्षों बाद जब देवव्रत शिक्षित होकर लौटे तो उन्होंने एक स्थान पर गंगा का प्रवाह रोक दिया। उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि शांतनु उनके पिता हैं। गंगा के प्रवाह को निर्बाध करने के लिए शांतनु को देवव्रत से युद्ध करना पड़ा। बाद में सच का पता चलने पर देवव्रत ने क्षमा मांगी। तब शांतनु ने कहा कि नदी एकाधिकार की वस्तु नहीं है, इसलिए उसे कभी भी बाधित नहीं किया जाना चाहिए। विश्व की श्रेष्ठ सभ्यताओं का जन्म नदियों के किनारे हुआ। मनुष्य ने नदियों की गोदी में चलना, पलना और जीना सीखा। इस प्रकार उसने नदी के साथ अपना एक दीर्घ संवेदनशील संबंध स्थापित किया। नदी की विशालता ने उसे प्रकृति के सामने आदर से झुकना सिखाया और उसका सम्मान करना भी। नदी में सहस्राब्दियों और सदियों पुरानी निरंतरता थी, जिसने वन, जन-जीव, पर्वत, मैदान, पठार सब अपने इर्द-गिर्द लपेटा हुआ था। इसमें झांक कर मनुष्य अपने अतीत की गंध को गहराई से महसूस कर सकता था। हर नदी का अपना पानी होता है और यह आप उसे देख कर, पीकर और चाहें तो प्रयोगशाला में जांच कर भी महसूस कर सकते हैं। नदी अपना पानी खुद निर्मित करती है, जो बादलों से बरस कर उसकी गोदी में गिरता है, उसमें वह अपना ‘आब’ और अपनी ‘रूह’ मिला कर उसे एक अलग पहचान देती है। नदी अबाध है, निरंतर है। वह प्रकृति की संरक्षिका है, मनुष्यता का उद्गम है और धरती पर प्राणों का स्रोत है।

अब सवाल यह कि नदी किसकी है? नदी दरअसल किसी की नहीं है। इसलिए वह सबकी है। कोई एक मनुष्य, एक समाज, एक देश उस पर अपना दावा नहीं कर सकता और अगर करता है तो यह प्रकृति के मूल्यों के खिलाफ है। उसका प्रवाह उन सभी क्षेत्रों के लिए है, जहां-जहां वह बहती है। बल्कि जहां-जहां वह पहले बहती है, वहां के लोगों की जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि नदी किसी भी तरह न तो प्रदूषित हो और न ही नहर या बांध बना कर उसके प्रवाह को रोका या तोड़ा-मोड़ा जाए। आखिर यह मनुष्य सहित धरती के सभी जीव-जंतुओं के नैसर्गिक अधिकार का मसला है। सत्ता के बल पर इसका हनन नहीं होना चाहिए। नदी का पारिस्थितिकी में एक बहुत अहम योगदान होता है और इसे महज मनुष्य के लिए संसाधन के रूप में देखना एक खतरनाक आयाम है। उसका प्रवाह-तंत्र सदियों में विकसित होता है और इस तंत्र की अपनी एक अलग नैसर्गिक लय होती है। पुराने समय में जल प्रबंधन का काम कुओं, झीलों और तालाबों के जरिए पूरा किया जाता था। लेकिन आज के समय में नदी पर बढ़ती निर्भरता हमें उस ओर धकेल रही है, जहां पहुंच कर हम अपनी जल आत्मनिर्भरता खोने केकगार पर पहुंच गए हैं। नदी जल की जरूरत को पूरा करने का एकमात्र साधन नहीं है।

हमें वर्षा जल संग्रहण और तालाबों, झीलों के निर्माण और रखरखाव की ओर अपरिहार्य तौर पर ध्यान देने की जरूरत है। कृषि की ऐसी व्यावहारिक नीति बनाने की जरूरत है जो क्षेत्र विशेष में मिट्टी, जलवायु और जल उपलब्धता की विशेषताओं पर आधारित हो। देश में अव्यावहारिक कृषि के चलते अत्यधिक जल बर्बाद किया जाता है, जो एक बढ़ती हुई आबादी वाले देश के लिए खतरे का संकेत है। हम नदियों को जोड़ कर और नहरों का जाल बिछा कर कभी भी इस समस्या का हल नहीं निकाल सकेंगे। इससे सिर्फ पर्यावरण और जीव-जगत का भीषण नुकसान होगा।

इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल समझौते को लेकर तनातनी है, तो चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी का बहाव रोके जाने की खबर आ रही है। देश के भीतर भी नदियों को लेकर अशांति बनी हुई है, फिर चाहे वह कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी को लेकर विवाद हो या हरियाणा और दिल्ली के बीच यमुना को लेकर। इस समस्या की जड़ में नदी को क्षेत्र विशेष की संपत्ति मान लेने की भावना छिपी हुई है। जबकि नदी किसी एक देश या राज्य की संपत्ति नहीं हो सकती। और अगर हम उसे किसी देश या क्षेत्र विशेष की संपत्ति के रूप में घोषित करते हैं तो यह उसके बहाव वाले अन्य देश या क्षेत्र के भूभाग में बसने वाले मनुष्यों और असंख्य जीवों सहित विशाल पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति एक क्रूर अन्याय होगा।

जल मनुष्य की एक अपरिहार्य जरूरत है और इसे दुश्मन की कमजोरी बना कर प्रयोग करना मानवता के प्रति अपराध है। नदी का संबंध अबोध बच्चों, महिलाओं सहित असंख्य जीवों से है। इसलिए हमें देश के बाहर भी और भीतर भी, नदी के संबंध में गहराई से पुनर्विचार करने की जरूरत है।

 

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First Published on October 10, 2016 5:00 am

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