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दुनिया मेरे आगे: लोक शक्ति

जो लोग ‘रावण’ को भस्म करते हैं, वे बड़े उत्साह में नजर आते हैं, इसलिए कि उनका ‘रावण’ दूसरे से ‘बड़ा’ था। अगले वर्ष फिर और बड़ा बनेगा, बनाएंगे। शुभू पटवा का लेख।
Author नई दिल्ली | October 11, 2016 04:24 am
नोएडा के बिसरख गांव में बने रावण के मंदिर में हुई तोड़फोड़। (प्रतिकात्मक फोटो)

शुभू पटवा

जो लोग ‘रावण’ को भस्म करते हैं, वे बड़े उत्साह में नजर आते हैं, इसलिए कि उनका ‘रावण’ दूसरे से ‘बड़ा’ था। अगले वर्ष फिर और बड़ा बनेगा, बनाएंगे। हर बार यह ‘कद’ बड़ा हो जाता है। बहुत गुमान के साथ ढिंढोरा पीटा जाता है कि इस बार हमारा ‘रावण’ सबसे ऊंचा रहा। पिछले वर्ष यह पचासी फुट ही था। कहीं पैंसठ से सत्तर तो कहीं साठ से पैंसठ, अस्सी या पचासी। ‘कद’ हर बार ‘रावण’ का ही बढ़ता है। जब-जब यह बात सुनने-पढ़ने को मिलती है, तो ऐसा अवसाद भीतर उठने लगता है कि कुछ कहते नहीं बनता। बुराइयों पर भलाई का, असद् पर सद् की विजय का प्रतीक है ‘रावण’। मन इसीलिए बैठ जाता है कि वह हर बार ‘बड़ा’ ही होता जाता है। यह सद् पर असद् की विजय हुई या इसके उलट। क्योंकि बड़ा हर बार ‘रावण’ ही होता रहा है। प्रतीक रूप में जल रहा ‘रावण’ हर बार अपना कद बढ़ा लेता है और जो उसे भस्म करते हैं, वे प्रसन्न मुद्रा में देखे जाते हैं। शासन से लेकर समाजोद्धारक तक, सभी खुशी-खुशी इसके सहभागी बनते हैं।

असद् पर सद् की यह कैसी विजय है? ऐसा कर हम खुशियां भी बटोर रहे होते हैं! जिस ‘प्रतीक’ रावण को भस्म करते हैं, उसी धुएं में से असल ‘असद्’ वास्तव में सिर ऊंचा उठा रहा होता है। तो क्या हम, यह शासन और समाज महज प्रतीक रूप में ही बुराइयों का ध्वंस चाहते हैं और इनके फलते-फूलते जाने को नजरअंदाज करने का ही स्वभाव पालते हैं? अब तक तो यही लग रहा है। सत्ता के शीर्ष से लेकर समाज के हर कोने में यह सब देखने को मिल जाएगा। आखिर यह कैसी प्रवंचना है? ‘रावण’ जलता नहीं, बल्कि उस आग में फिर निखर कर उभरता है। फिर भी ‘असद्’ से कोई प्रेरणा नहीं ली जाती है। अभिप्रेरणा तो सदा ‘सद्’ से ही पाई जा सकती है। दुर्भाग्य केवल इतना है कि ‘सद्’ सदा पंगु है। धर्म और अध्यात्म ही इसे शक्ति और सामर्थ्य देते हैं। तो क्या हर बार रावण के बढ़ते कद के चलते यह माना जाए कि ‘धर्म’ ही शक्तिहीन हो रहा है? भले कुछ अंशों तक ही हो, यह कड़वा सच हमें कबूल करना होगा। जब तक हकीकत से दो-चार नहीं हुआ जाएगा, तब तक वह तलाश भी शुरू नहीं होगी कि खोई हुई शक्ति फिर से कैसे पाई जाए? जो सामर्थ्य हमारा चुक गया है, वह कैसे हासिल हो? किसी भी युग में ऐसा कोई ऋषि-महर्षि नहीं हुआ, जो बुराइयों के शमन और सद्-आचार या सद्-विचार के विकास से मतभेद रखता हो।

मतांतर होते हुए भी बुनियादी मुद्दों पर सभी का मतैक्य है। इन्हें खंगालने और व्यवहार के स्तर पर जीवन-वृत्त का हिस्सा बनाने की जरूरत है। धर्म, बल्कि कहना चाहिए कि ‘पंथ’ के कर्मकांड से ‘धर्म’ को मुक्त करके उसके असली स्वरूप की व्याख्या फिर से करने और मिथ्या आग्रहों के साथ पर-दोष देखने की प्रवृत्ति से मुक्त होने की जरूरत है। भगवान महावीर हों या महर्षि वेदव्यास या फिर बुद्ध और गांधी- सभी इसी मत के रहे हैं। महावीर की तो साधु की परिभाषा भी बड़ी व्यापक है। वे कहते हैं- ‘अणुवीई भासई से निग्गंथे’, यानी जो पूर्णतया चिंतनपूर्वक बोलता है, वही साधु है। विचारों की यह विशालता हर स्तर पर आवश्यक है। महावीर समाज को सचेत भी करते हैं- ‘मिच्छत्ताहिनिवेसेणं’, यानी व्यर्थ के विवादों से गुणों का नाश होता है। इसी तरह वे यह भी कहते हैं- ‘माणेणं अहमा गई’, यानी अभिमान से अधोपतन होता है। क्या ये सुभाषित किसी धर्म या पंथ की हदों में जकड़े जा सकते हैं? ये मार्गदर्शक सूक्त हैं, जिन पर चल कर व्यक्ति न केवल अपना, बल्कि अपने समाज का भी भला कर सकता है। जिस ‘रावण’ को बुराई का प्रतीक मान लिया गया, अगर उपरोक्त मंतव्य को सामने रखेंगे तो यह लगेगा कि बुनियादी तौर पर ये ही कुछ बातें रहीं हैं कि रावण का अधोपतन हुआ।

आज दरअसल बुनियादी मुद्दे ही गौण हो रहे हैं। इसी वजह से शासन और समाज विपन्नावस्था में पहुंचता जा रहा है। जो सिद्धांत गढ़े जा चुके हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है और संकरे गलियारों को ‘राजपथ’ बनाया जा रहा है। तात्कालिक उपायों पर तरजीह देने का ही प्रतिफल है कि बुनियाद की ‘चूलें’ हिलने लगी हैं। रावण को भस्म कर बुराइयों पर विजय पा लेने का वहम यही है और इसी वहम से मुक्त होने की हमें जरूरत है। इसके लिए आवश्यक है कि सिद्धांतों के एवज में ‘तात्कालिक व्यूह-रचना’ की ओर बढ़ते जा रहे हमारे झुकाव को समाप्त किया जाए। आज अधिक समस्याओं और विषमताओं के मूल में तात्कालिक उपायों का ही मायाजाल है। मायाजाल के इस फंदे को काटना जरूरी है। लोकतंत्र में ‘लोक’ सर्वोपरि है।

 

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First Published on October 11, 2016 4:22 am

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