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दुनिया मेरे आगे-बाजार में घर

प्रदूषण से हम सभी पीड़ित हैं और दिनोंदिन इसका प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। इस मामले में मैं अपेक्षाकृत सौभाग्यशाली रही हूं।
Author November 7, 2017 04:17 am
प्रतीकात्मक चित्र।

एकता कानूनगो बक्षी

प्रदूषण से हम सभी पीड़ित हैं और दिनोंदिन इसका प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। इस मामले में मैं अपेक्षाकृत सौभाग्यशाली रही हूं। मेरा घर घनी बस्ती से अलग प्रकृति के करीब रहा है, जहां मैं पली-बढ़ी। हमें वायु और ध्वनि प्रदूषण से ज्यादा जूझने की जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन कहते हैं न सब दिन जायं न एक समाना। तो हमारे भी दिन कुछ दिनों पहले फिर गए। हम अपने ही शहर की एक दूसरी कॉलोनी में शिफ्ट हुए। पुराने घर को छोड़ना काफी कष्टदायक था, क्योंकि उससे हमारा भावनात्मक लगाव था। लेकिन वह मेरे दफ्तर से दूर पड़ता था, इसलिए नजदीक रहने का निर्णय लिया गया।  यह नया घर बाजार के बीचोबीच है। ऐसी जगह पर रहने का यह मेरा पहला अनुभव था। अभी तक तो जितने भी घरों में रहना हुआ था, वे प्राकृतिक वैभव के आसपास थे, जहां अपनी बॉलकनी से ही खेत, पहाड़, उगता हुआ सूरज, आसमान में बदलते रंगों के साथ उतरती खूबसूरत शामें जीवन में मधुरता घोलती रहती थीं। नए घर को लेकर हम बहुत रोमांचित भी थे और सहमे हुए भी, क्योंकि पूरा दृश्य ही बदलने वाला था। नए घर में शिफ्ट होने में पूरा दिन लग गया। रात को सोए तो दिन भर की थकान से बहुत जल्दी नींद आ गई और फिर सुबह ही खुली। कुछ लोहे के सरियों की खड़खड़ाहट और ठोंकने-पीटने की आवाजों से जब नींद टूटी तो देखा पास की सड़क पर सब्जी और फलों की दुकानें लग रही थीं।

यह भी सुखद था कि खिड़की से दिखाई देते सामने लगे पेड़ों पर पक्षियों का आना-जाना भी लगा हुआ था। रोड की रौनक दिन के चढ़ते-चढ़ते बढ़ती जा रही थी। मेरे मन में खयाल आया कि यह तो बड़ी मजेदार स्थिति है। यहां तो पुराने घर की सादगी और प्राकृतिक सौंदर्य तो है ही, साथ में लोगों और वाहनों की चहल-पहल से ऊर्जा भी मिलती रहेगी, जो चलते रहने को प्रेरित करेगी। शाम होते-होते थोड़ा यातायात बढ़ता गया, जिससे वायु प्रदूषण भी बढ़ने लगा। मैंने घर के अंदर के प्रदूषण को कम करने के लिए प्राकृतिक साधनों का उपयोग करते हुए रबर प्लांट जैसे वायु को स्वच्छ करने में सहायक पौधे लगा लिए हैं। वायु प्रदूषण के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण भी दिन के साथ देर तक बना रहता है। रात होते-होते बाजार की गतिविधियां और शोरगुल उफान पर आ गए। लगने लगा कि कुछ देर का वायु और ध्वनि प्रदूषण दफ्तर की निकटता की वजह से और अन्य सुविधाओं को देखते हुए सहन किया जा सकता है।

इस बीच यह जगह भी अपनी-सी लगने लगी। सुबह चिड़ियों की चहचहाहट और रात होते-होते गाड़ियों के शोर और खटर-पटर के हम अभ्यस्त होते जा रहे हैं। कुछ राहगीरों को तो हम उनके वाहनों की आवाज से ही पहचानने लगे हैं, जैसे रात के दस बजे एक आॅटो वाले दादा, जिनके आॅटो का साइलेंसर फटा हुआ है और दूर से ही पता चल जाता है कि वही आ रहे हैं। एक अलग ही तरह की ध्वनि की तरंगें छोड़ते हुए वह गुजरता है। शायद वे उसे ठीक कराने के लिए धन नहीं जुटा पा रहे होंगे। यह वाकई एक बड़ा मसला है। उन्हें मदद की जरूरत है। इसके साथ एक सज्जन हैं जो लगातार खाली सड़क पर स्कूटर का हॉर्न बजाते जाते हैं। हो सकता है अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा करते हों, पर मुझे लगता है कि उन्हें भी मदद की जरूरत है। यह एक मानसिक बीमारी है।
ऐसा ही, रात साढ़े ग्यारह बजे तेज रफ्तार बाइक पर शायद कोई शूरवीर सड़क से गुजरता है। हॉर्न की आवाज नहीं होती लेकिन उस बाइक की गति की आवाज ही इतनी जोरदार है जैसे कि प्लेन के टेकआॅफ और लैंडिंग की आवाज और कंपन का संगम हो रहा हो। ऐसे लोगों के लिए एक अलग रन-वे बनाने की मुहिम शुरू करने की जरूरत है ताकि सड़क से ही आकाशीय सफर की उड़ान भर सके उनकी दुपहिया गाड़ी। ऐसे प्रतिभासंपन्न खतरों के खिलाड़ियों के कौशल का इस तरह जाया हो जाना बिल्कुल भी देशहित में नहीं है।

चौराहे पर पता नहीं कहां स्पीकर लगा हुआ है, जहां से बहुत मधुर गीतों का प्रसारण सुबह,दोपहर और शाम को होता रहता है। कभी-कभी नहीं भी होता है। समय-सारिणी बनाई जाए तो हम नियमित रूप से लोकप्रिय संगीत का घर बैठे लुफ्त उठा सकते हैं। थोड़ी-सी सूझबूझ से इसे व्यवस्थित किया जा सकता है। प्रसारणकर्ता आस-पड़ोस के निवासियों की मनचाहे गीतों की फरमाइश भी स्वीकार करें, ताकि जनभागीदारी से इसे और खूबसूरत और आकर्षक बनाया जा सके। ये कुछ जरूरी मुद्दे हैं, जिन पर गौर करने की जरूरत लगती है।वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के कारण सुबह तैयार हुई मेरी विचारों की स्वादिष्ट खिचड़ी रात होते-होते जल-भुनकर कुछ लोगों की लापरवाही के कारण बेस्वाद होती जाती है। बाजार में घर है तो थोड़ा-बहुत तो सहन किया ही जा सकता है। सड़क पर अगर गाड़ियां दौड़ेंगी तो वायु और ध्वनि प्रदूषण होना भी स्वाभाविक है लेकिन गैरजिम्मेदारी और अक्खड़ता की भी कोई हद होती है।

 

 

 

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