June 23, 2017

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दुनिया मेरे आगे: कविताओं का कारवां…

जब हम जिंदगी से जूझ रहे थे, तब कौन-सी कविता थी जिसने हाथ थाम कर हौसला दिया था! तपती दोपहरी में किस कविता ने अपनी छांव का आंचल सिर पर रख दिया था!

Author April 19, 2017 12:43 pm
प्रतीकात्मक तस्वीर।

 प्रतिभा कटियार

जब हम जिंदगी से जूझ रहे थे, तब कौन-सी कविता थी जिसने हाथ थाम कर हौसला दिया था! तपती दोपहरी में किस कविता ने अपनी छांव का आंचल सिर पर रख दिया था! प्रेम की आड़ी-टेढ़ी गलियों से गुजरते हुए कभी लड़खड़ा कर गिरते, कभी खुद ही संभल कर उठते वक्त कौन-सी कविता थी साथ-साथ! कभी दुख की काली रात से हाथ पकड़ कर गुजारते हुए, कभी उम्मीदों की सुबह उगाते हुए कौन-सी कविताएं सच्चे हमसफर की तरह साथ ही रहीं! जब समय से, व्यवस्थाओं से लड़ते हुए रगों के खून की रफ्तार दोगुनी हो जाती थी और सब्र का बांध टूटने को होता था, तब कौन-सी कविता थी जो आक्रोश से भरी आंखों पर मरहम और बंद मुट्ठियों की ऊर्जा बनती थी!

जब दुनियादारी और समझदारी का गणित समूचे वजूद को निगलने को था, तब कौन-सी कविता झकझोर के जगा कर कहती थी कि ‘जिंदा होना और बात है और जीना और बात। इसलिए उठो और जियो।’ ये कविताएं कब और कैसे बिसरा बैठे हम! दफ्तर के लिए भागते हुए, घर के खर्चों का हिसाब लगाते हुए, बच्चे की फीस के लिए लाइन में लगते हुए, बेरोजगारी के धक्के खाते हुए…! मानो हम इन कविताओं से दूर आने लगे। हालांकि कविताएं थीं हमारे भीतर। फिर लगा कि कविताएं तो कवियों की ही कोई चीज है। सो कविता का पाठक होना यानी कविता का लेखक होने में तब्दील होने लगा। बहुत सारे कविता के लेखक भी कविता के पाठक होने से दूर होने लगे। ‘क’ से कविता ने उस पाठक के मन को समझा, उसका हाथ थामा और एक शाम उस पाठक मन से पूछा कि बोलो तो, तुम्हें कौन-सी कविता पसंद है। जैसे यह सवाल नहीं था, कोई यात्रा थी भीतर की! बरसों बाद मानो किसी ने पाठक मन को आवाज दी थी। उसके बाद तो कितनी ही कविताएं उमड़ने लगीं! एक खूबसूरत शाम सजी, बहुत सारी कविताओं के साथ। फिर क्या था, इंतजार रहने लगा इन शामों का। इन शामों की खुशबू हवाओं में बिखरने लगी।

लेकिन इतना आसान भी नहीं था यह सफर कि अपनी कविता पढ़ने देने का इसरार कई बैठकों तक होता ही रहा। अब भी होता है कभी-कभार। कई बार तो इस तरह के इसरार इतने भावुक अंदाज में हुए कि मन किया कि चलो पढ़ ही लिया जाए अपनी भी! लेकिन फिर इस खयाल ने काम आसान किया कि एक ही तो बात है इस बैठक की, जो इसे बाकी जगहों से अलहदा करती है कि यहां अपने ‘मैं’ से मुक्त होने का प्रयास करना है। जिन्हें यह विचार समझने में वक्त लगेगा, उन्हें वक्त देंगे। किसी बात पर उनकी नाराजगी हमसे हो सकती है, हमारी किसी से कोई नाराजगी नहीं। कभी कोई बुजुर्ग नाराज होकर कहते थे- ‘क्या बेवकूफी है… ऐसा भी कोई कार्यक्रम होता है क्या कि कविता का कार्यक्रम है और अपनी कविता ही नहीं पढ़नी! क्यों आएगा कोई यहां अपनी शाम खराब करने!’ हम मुस्करा कर कहते- ‘हमारी तो शाम बन जाती है सर… जब हमारे इर्द-गिर्द फ़ैज़, ग़ालिब, साहिर, पाश, फिराक, सर्वेश्वर और न जाने कितने कवियों का संसार खुलता है। खैर, कुछ राजी और कुछ नाराजगी के साथ यह कारवां चलता रहा… बढ़ता रहा।

एक रोज मुड़ कर देखा तो पूरा उत्तराखंड इस विचार की धुन में झूमता मिला। उत्तरकाशी, हल्द्वानी, रुद्रपुर, श्रीनगर, टिहरी, खटीमा ने भी देहरादून में पनपे और जनमे इस विचार को प्यार से सहेजा। नजर का दायरा बढ़ा तो पाया कि उत्तराखंड की हदों के इंदौर, हैदराबाद, पुणे, दिल्ली, छिंदवाड़ा के अलावा अमेरिका में रिचमंड तक ‘क’ से कविता महकने लगी है।

पाठक जो साहित्य जगत में अब तक हाशिये पर था, अब वह केंद्र में आ चुका है। यह साहित्यिक अभिरुचि का जमावड़ा बना, लेकिन सिर्फ साहित्यकारों तक सिमटा नहीं रहा। इसकी हद में वे सब भी आए, जिन्हें लगता था कि ‘पोयट्री इज नॉट माय कप आॅफ टी’। वे आए, उन्होंने सुनीं कविताएं और पाया कि उनकी स्मृतियों में भी है कुछ साझा करने के लिए। और निकलने लगीं उनकी प्रिय कविताएं। सुंदर है ये कारवां। फेसबुक जैसे मंचों पर ‘क्लिक’ से ‘लाइक’ जताने वालों की बड़ी गिनती और तालियों के शोर से दूर अपनी पसंद की कविताओं को साझा करने का पाठकों का ठीहा, जहां लेखक भी पाठक ही है। कोई बड़ा कवि है, वह भी बात करता है उन कविताओं की, जो उसकी पसंद की हैं, उसकी लिखी नहीं। बस जरा-सी बात है ये… लेकिन इसने जीवन में आनंद घोल दिया है।

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First Published on April 19, 2017 4:54 am

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