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दुनिया मेरे आगे: सपने में देखा सपना

सोच में कुछ उलझनें तारी हुर्इं, कुछ ऐसा लगा मानो वह स्वयं में हो ही नहीं। न अपनी देह उसकी लग रही थी, न वह हवेली, न वह समय, न वह शहर और न वर्तमान।
Author नई दिल्ली | September 5, 2016 04:07 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

एक साथ कितना कुछ बदल जाता है, सब कुछ; जैसे कि वह बदला हुआ पहले से था- हमने देखा उसे बाद में। अपने को ही देखिए! दिन-ब-दिन ढलती देह, विस्मृत चेतना, थकते कदम रुकते नहीं क्षण भर भी, और एक दिन यह काया पराई हो जाती है। अगर विधाता ने अधिक आयु दी हो, तो बूढ़ा चेहरा ही हमारी पहचान बन फे्रम से झांकता है, वही उसकी पहचान का अंतिम सबूत बन जाता है।  वह जैसे फिर बड़बड़ाता है- मैं नहीं कहता कुछ। कहने वाला मैं हूं ही कौन। जो सच है उसे झूठ मानने वाला मैं कौन हूं? विशाल बरगद की लटकी जटाओं के बीच से साफ नजर आता वह बूढ़ा चांदनी रात में रवींद्रनाथ ठाकुर का समरूप लग रहा था। बरगद से सटे तालाब में भी वही आकृति झांकती प्रतीत होती। चारों तरफ पसरे सन्नाटे के बीच अचानक वह हंसा- हा हा हा और फिर उसकी हंसी कारुणिक रुदन में बदल गई। वह अकेला था, पास उसके कोई न था। चांदनी रात थी, बरगद का विशाल पेड़ था, जटाएं थीं उसकी, तालाब था, तालाब में उसकी आकृति थी- शेष कुछ न था।

सोच में कुछ उलझनें तारी हुर्इं, कुछ ऐसा लगा मानो वह स्वयं में हो ही नहीं। न अपनी देह उसकी लग रही थी, न वह हवेली, न वह समय, न वह शहर और न वर्तमान। तो क्या वह बूढ़ा सच कह रहा था! स्वप्न सच में तो नहीं होते, पर वे झूठ में भी कहां होते हैं- वह हैरान होता चला गया और रात उसके बैठे-बैठे ही बीत गई। एक अरसा हुआ जब वह यहां आया था। तब यहां आने वाली सड़क बरसात में कीचड़ से सन जाती थी। आसपास के पेड़ों की घनी कतारों से दिन में भी डर लगता था। बरसात शुरू होते ही हवेली एक टापू में बदल जाती। चारों तरफ विरानी। अब शहर को जाने वाली सड़क पक्की है। पेड़ कम हो गए हैं। हवेली से सट कर बस्तियां बस गर्इं, लोगों की चहल-पहल रहने लगी है। पर उसका सूनापन कभी जाता नहीं। कभी भी वह अपने आप में नहीं रहता, लगता जैसे वह इस बड़ी हवेली का कोई अदृश्य प्राणी है, जो यदा-कदा स्वयं को देख लेता है, पर कोई भी उसे नहीं देख पाता और न जान पाता है कि वह यहां रहता है। वह यहां क्यों रहता है? वह बार-बार इस प्रश्न पर विचार करता और फिर खामोशी ओढ़ कर बिस्तर पर पसर जाता।

वह अपने गांव से नौकरी की खोज में आया था। पता नहीं किस मनहूस घड़ी में उस औरत से टकरा गया, जिसने हवेली में रह कर उसकी देख-रेख करने की नौकरी दे दी। उसने जो मांगा, मिल गया। एक अविवाहित युवक को हवेली में रहने की नौकरी के एवज में वेतन मिला। उसे चाहिए भी और क्या! लेकिन यह एकांत उसे बेतरह परेशान करता। वह हवेली से बहुत दूर निकल जाता और कहीं बैठ कर सोचने लगता। वह सोचता जीवन के बारे में, उसके रहस्यों के बारे में- उसे कुछ मिलता नजर नहीं आता और फिर गहरी नींद में सो जाता, देर तक सोया रहता। धीरे-धीरे वह यहां से ऊबने लगा। इस ऊब में उसे सब कुछ अच्छा लगने लगा। पेड़-पौधे, तालाब, पक्षी, आकाश, धरती, मेघ, बारिश- और उसमें लालसा घर करने लगी। सुख की लालसा, कुछ और पाने और पाते जाने की चाह इतनी प्रबल हो उठी कि वह घबरा उठा। अचानक उसे स्वप्न में देखे हुए बूढ़े की याद आई और उसके बड़बड़ाने की भी। उसे महसूस हुआ कि उसमें जीवन है, सांस उसकी चल रही है और जब सांसें हैं तो उम्मीदें भी हैं और उम्मीदें हैं तो जिये जाने का सुख भी है। मगर सुख क्या है, वह समझ नहीं पाता। उसे दुख भी तो नहीं कोई। वह हैरान होता हुआ स्वयं को निहारने लगा। अजीब कशमकश के बीच जब चेतना लौटी तो पाया कि वह स्वप्न में ही था।

अब जागृत और सुप्त अवस्था का भेद मिट गया था। इक्कीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध ने उसमें जीवन-मृत्यु के बोध को मिटा डाला था। देश-काल, भाषा, संस्कृति, वासना, आकांक्षा, देह, परिवार, संबंध, वस्तुएं, सुख, लालसा-सब व्यर्थ। वह एक शरीर था और उसमें चलती सांसें थीं बस। इतना तो वह अब भी सोच पाता है। बोल पाता है खुद से। उसकी कथा सुनने के बाद मुझे लगा, जैसे मैं स्वयं नहीं रहा। अब कुछ भी तो शेष नहीं जैसे जीवन का रह जाना अशेष। मेरी तंद्रा टूटी। यह मुझे क्या हो गया। मैं तो कोई स्वप्न देख रहा था। मैंने अपने को टटोला। मैं तो था। रात बीत चुकी थी। शायद सुबह का स्वप्न था- सच ही होता है यह अक्सर। मेरा दिल डूबने लगा और डूबता चला गया।

 

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