December 06, 2016

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भारत में मध्य वर्ग का उदय मुख्य रूप से औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के दौरान हुआ।

Author November 10, 2016 03:47 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

ज्योति सिडाना

भारत में मध्य वर्ग का उदय मुख्य रूप से औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के दौरान हुआ। इसमें ऐसे अनेक बदलाव देखे जा सकते हैं, जिन्हें जाने बिना मध्यवर्गीय जीवन शैली को समझा नहीं जा सकता। सामान्य तौर पर इस मध्य वर्ग में नवीन पेशेवर समूह, सरकार द्वारा नियंत्रित सार्वजनिक क्षेत्रों और विभागों के विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारी और अधिकारी, संगठित निजी क्षेत्रों में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी, स्वरोजगार प्राप्त लोग आदि को मुख्य रूप से सम्मिलित किया जाता है। इस मध्यवर्गीय संरचना में अधिकतर प्रतिनिधित्व उच्च और मध्य जातियों का है। इसके बाद महिलाएं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समूहों के लोग सम्मिलित होते हैं। यह मध्य वर्ग भारत के जीडीपी में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है और उत्पादन, वितरण और सेवा क्षेत्रों को गति देता है।

हाल में जयपुर यात्रा के दौरान लेखक ने एक मध्यवर्गीय कॉलोनी में यह अनुभव किया कि मध्य जाति के एक मध्यवर्गीय परिवार ने अपने मकान के एक हिस्से को अनुसूचित जाति के एक मध्यवर्गीय परिवार को किराए पर देने से इनकार कर दिया। यह परिवार निर्धारित किराया मकान मालिक को देने के लिए तैयार था, लेकिन मकान मालिक ने उन्हें यह कह कर टाल दिया कि मुझे सोचने का मौका दीजिए। शायद मैं इस हिस्से में जल्दी ही कोई बदलाव करवाने की सोच रहा हूं। मेरे द्वारा यह पूछे जाने पर कि ऐसा क्यों किया गया तो उनका यह उत्तर था कि यह परिवार अनुसूचित जाति से संबद्ध है और हमारी संस्कृति से मेल नहीं खाता। इसके साथ ही उन्होंने कुछ पूर्वग्रहों का भी उल्लेख किया जो कि अनुसूचित जातियों के विषय में थे। लेखक यह जानती है कि बहुमंजिला फ्लैटों में इस प्रकार की स्थितियां कम हैं। मध्य वर्ग के अनेक अनुसूचित जातियों के परिवार इन परिसरों में निवास करते हैं। हां, इतना अवश्य है कि इन फ्लैटों के मालिक किराएदार के साथ उस हिस्से में निवास नहीं करते। यानी मकान या कोठी, स्वतंत्र विला और फ्लैटों के बीच इस स्थिति को जानने की जरूरत है। इस प्रकार की सामाजिक दूरी और भेदभाव मध्यवर्ग की जीवन शैली पर आधुनिकीकरण के प्रभाव पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। सवाल उठाया जा सकता है कि उन्होंने रहन-सहन के स्तर पर तो आधुनिक साजो-सामान से घर को लैस किया, नई तकनीकी पर अपनी निर्भरता बढ़ाई, लेकिन विचार में जो मूल्य अभी बने हुए हैं, उनमें वे कितना आधुनिक हुए! सवाल यह है कि आधुनिकता की प्रत्यक्ष चकाचौंध में जीते मध्य वर्ग के बीच मानवीयता और बराबरी पर आधारित आधुनिक जीवन-मूल्य कहां हैं!

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आमतौर पर आय संरचना और व्यवसाय या पेशे की प्रकृति से मध्य वर्ग में प्रतिष्ठा का निर्धारण होता है। माना यह गया था कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया मध्य वर्ग में धर्म और जाति जैसे सवालों को प्रतिष्ठा और अस्मिता के संदर्भ में उपेक्षित करेगी, यानी परंपरागत जड़ता और मानवीयता के लिहाज से प्रतिगामी मूल्यों को पीछे छोड़ कर बराबरी की भावना का विकास करेगी। लेकिन ऐसा शायद हो नहीं रहा। दूसरी ओर, सोशल मीडिया और प्रौद्योगिकी ने मध्य वर्ग में धर्म और जाति की चेतना को नए तरीके से उभारा है। यह उभार उस धारणा से भिन्न है, जिसमें प्रभुत्वशाली जाति अपने नियंत्रण को विभिन्न माध्यमों से स्थापित करती थी। नई धारणा में जाति की पहचान को मिथकों के साथ जोड़ कर समूचे देश में और देश के बाहर जाति की एकजुटता को स्थापित किया जाता है और फिर मीडिया का इस्तेमाल कर जातीय आंदोलनों की संभावनाओं को तलाशा जाता है। सक्षम तबकों के बीच के ऐसे उभारों में कभी जातिगत सवाल साफ दिखते हैं तो कई बार उन्हें दूसरे बहानों के पीछे रखा जाता है।

गुजरात और महाराष्ट्र में पाटीदारों या पटेल और मराठाओं के बड़े आंदोलन इसके उदाहरण हैं। इन आंदोलनों में पाटीदारों की तरह चमत्कारिक नेतृत्व युवाओं के बीच से उभार लेता है या फिर मराठा आंदोलन की नेतृत्व-विहीनता भी विशेषता बन जाती है। ये आंदोलन भारत जैसे लोकतांत्रिक समाज में अस्मिताओं के सवालों को नए संदर्भों के साथ उभारते हैं। एक तरफ निर्भया आंदोलन के समय जो युवा स्त्री-पुरुष के बीच समानता और न्याय के सवाल मध्यवर्गीय मानसिकता के आधार पर सुरक्षा और कठोर दंड के संदर्भ में उठाते हैं, वहीं वे पटेल और मराठाओं के संदर्भ में आरक्षण से जुड़ जाते हैं। चेतना के ये दोनों स्वरूप कहीं न कहीं ‘संकीर्णता’ और ‘कानून के परे कठोर दंड’ के रूप में मध्य वर्ग की आधुनिकता विरोधी चेतना के परिचायक हैं। यही मध्य वर्ग में पनप रही जागरण विरोधी विचार की व्यवस्था है जो भविष्य में लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए चुनौती बन सकती है।

 

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First Published on November 10, 2016 3:46 am

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