December 06, 2016

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दुनिया मेरे आगे: भजन के भाव

जिंदगी की राह पर चलना उसी दिन शुरू हो जाता है, जब मां की कोख से पहली बार इंसान बाहर आता है।

Author November 23, 2016 03:57 am
साहित्य

उमेश चतुर्वेदी

जिंदगी की राह पर चलना उसी दिन शुरू हो जाता है, जब मां की कोख से पहली बार इंसान बाहर आता है। शुरुआती कुछ साल तक अनुभवों का अवचेतन पर कुछ ज्यादा ही प्रभाव पड़ता है। बाद के दिनों में जब मेधा का विकास होना शुरू होता है, तब अपना वातावरण कुछ न कुछ असर डालने लगता है। करीब चालीस साल पुराना अपना बचपन याद आता है। तब सबके घर में रेडियो नहीं होता था। लेकिन अड़ोस-पड़ोस तक सुबह रेडियो से भजनों की आवाज गूंजती रहती थी। उन दिनों पुरुषोत्तम दास जलोटा, हरिओम शरण और अनूप जलोटा समेत कई नए-पुराने गायकों के सुर में भजनों की स्वर लहरियां माहौल को रेशमी अहसास देती थीं। तब की सुबहें धार्मिकता से ओतप्रोत रहती थीं। देश के पहले सूचना और प्रसारण मंत्री सरदार पटेल ने रेडियो में भारतीयता की गंध को ओतप्रोत करने की योजना बनाई थी, जिसे बाद के दिनों के सूचना और प्रसारण मंत्री केसकर और रेडियो के महानिदेशक जगदीशचंद्र माथुर ने परवान चढ़ाया। रेडियो का आकाशवाणी नाम 1957 में रखा गया और जगदीशचंद्र माथुर भले ही आइसीएस अफसर थे, लेकिन उनका साहित्य और संस्कृति प्रेम जगजाहिर था। वे खुद भी हिंदी के जाने-माने नाटककार थे।

आज मीडियम और शॉर्ट वेब वाले आकाशवाणी के दिन बीत चुके हैं। अब फ्रीक्वेंसी मॉड्युलेशन यानी एफएम का जमाना है और भजनों और रामचरितमानस की चौपाइयां आकाशवाणी के सहोदर दूरदर्शन पर भी कम हुई है। इसके लिए डीडी भारती जरूर काम कर रहा है। आजादी के पहले वाली की पीढ़ी वाले बुजुर्ग जिंदा थे। उनकी नजरों में सिनेमा सामाजिक और सांस्कृतिक गिरावट का माध्यम था। ऐसे माहौल में भक्ति से सराबोर गीत-संगीत की सामाजिक पूछ-परख ज्यादा थी। तब पुराने ग्रामोफोन की तर्ज पर तवे जैसा रिकॉर्ड होता था। बाद में टेपरिकॉर्डर और प्लेयर का जमाना आया। लाउडस्पीकर की जगह साउंड बॉक्स और सिस्टम ने ले ली। टेप से भी दुनिया आगे बढ़ी और सीडी की आई। अब पेन ड्राइव का जमाना है।

बेशक दुनिया आगे बढ़ी है। लेकिन यह सामाजिक सिद्धांत है कि जब रोटी का संघर्ष बड़ा होता है, तब भी धर्म याद आता है। लेकिन यह संघर्ष जैसे मद्धम पड़ता है तो मानव की आवश्यकता आमोद-प्रमोद के दूसरे संसाधनों को जुटाने की तरफ बढ़ जाती है। लेकिन जैसे ही रोटी और दूसरी सहूलियतों का संघर्ष कम होता है, वैसे ही फिर सांस्कृतिक पुनरुत्थान की कोशिश बढ़ती है, धार्मिकता की तरफ लोग बढ़ते हैं। भारतीय संदर्भ में धार्मिकता का उभार धार्मिक बाबाओं और आध्यात्मिक गुरुओं के चलते बढ़ा है और पुराने के साथ नए बाबाओं और आध्यात्मिक माताओं के सुरीले भजन भी गूंजने लगे हैं। टीवी पर अध्यात्मिक और धार्मिक चैनलों के जरिए यह प्रक्रिया चल रही है।वाराणसी के ज्ञानमंडल द्वारा प्रकाशित हिंदी साहित्य कोश के मुताबिक भजन सुगम संगीत की एक शैली है, जिसमें देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है। भजन को संस्कृत के मंत्रों, श्लोकों, स्तुतियों और स्तवन का लोकरंजक रूप या शैली माना जा सकता है। भारतीय संगीत को शास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत के तौर पर बांटा गया है।

दिलचस्प यह है कि सिर्फ सुगम और लोकसंगीत में ही होता है। इसलिए इस पर छंद और मात्रा का अनुशासन लागू नहीं होता। हां, लयात्मकता जरूर रहती है। भारत ज्ञानकोश के मुताबिक भारतीय उपासना की तमाम पद्धतियों में भजन का प्रचलन है। आमतौर पर अच्छे भजन की खासियत राग-ताल नियमों से स्वतंत्र भावानुकूल शब्दों से परिपूर्ण लुभावनी रचनाएं होती हैं।इसके बावजूद यह देखने में आया है कि ज्यादातर भजन दादरा और कहरवा ताल में होते हैं। हिंदी साहित्य का मध्यकाल भक्ति आंदोलन के रूप में जाना जाता है। इस दौरान निर्गुण और सगुण- भक्ति की दोनों धाराएं विकसित हुर्इं। चूंकि भजनों में ईश्वर, देवी और देवताओं के तमाम रूपों की प्रशंसा होती है, इसलिए माना जा सकता है कि सगुण उपासना पद्धति ने भजनों के विस्तार में अप्रतिम योगदान दिया। दिलचस्प यह है कि न सिर्फ हिंदू उपासना पद्धति, बल्कि बाद के दौर में बौद्ध और जैन ने भजन पद्धति को उपासना के माध्यम के तौर पर स्वीकार किया। निर्गुण भक्ति धारा में भी भजन पद दिखते हैं।

साहित्यकोश के मुताबिक दसवीं सदी के कवि यमुनाचार्य ने लक्ष्मी और विष्णु की स्तुति में रचनाएं की थीं। माना जाता है कि हिंदी में भजनों की शुरुआत यहीं से होती है। बाद के दौर में उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को स्वामी रामानंद की कोशिशों के कारण गति मिली। कीर्तन के बारे में मान्यता है कि इसका विकास कृष्ण भक्ति धारा के बल्लभ संप्रदाय के चलते हुआ। यहां एक बात ध्यान देने की है कि कीर्तन में सामाजिकता और सामूहिकता पर जोर रहता है, जबकि भजन में वैयक्तिकता प्रमुख होती है। यह सच है कि धर्मगुरुओं के जरिए लोकरंजन उपासक गेय पदों भजनों की तरफ आकर्षण बढ़ रहा है। लेकिन यह भी तय है कि पचास-साठ साल पहले जैसी भजनों की रेशमी लोकप्रियता आज के दौर में संभव नहीं है।

 

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First Published on November 23, 2016 3:56 am

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